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Sankhya Darshan (Paperback) by ब्रह्ममुनि परिवारराजकी

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Description

भारतीय दर्शन के छः प्रकारों में से सांख्य भी एक है जो प्राचीनकाल में अत्यंत लोकप्रिय तथा प्रथित हुआ था। सांख्य दर्शन का प्रवर्त्तक महर्षि कपिल को माना जाता है। इसका सबसे प्राचीन तथा प्रामाणिक ग्रंथ सांख्यकारिका है, जिसकी रचना ईश्वर कृष्ण ने की थी। संख्या शब्द ‘ख्या’ धातु में सम् उपसर्ग लगाकर व्युत्पन्न किया गया है सांख्य के दो अर्थ हैं – संख्या तथा सम्यक् ज्ञान। सांख्य दर्शन से तात्पर्य सम्यक् ज्ञान दर्शन से है। इसमें 25 तत्वों का विवरण मिलता है, अतः इसे संख्या का दर्शन भी कहा जा सकता है। ‘सांख्य’ का शाब्दिक अर्थ है – ‘संख्या सम्बंधी’ या विश्लेषण। इसकी सबसे प्रमुख धारणा सृष्टि के प्रकृति-पुरुष से बनी होने की है, यहाँ प्रकृति (यानि पंचमहाभूतों से बनी) जड़ है और पुरुष (यानि जीवात्मा) चेतन। भारतीय संस्कृति में किसी समय सांख्य दर्शन का अत्यंत ऊँचा स्थान था। देश के उदात्त मस्तिष्क सांख्य की विचार पद्धति से सोचते थे। महाभारतकार ने यहाँ तक कहा है कि ज्ञानं च लोके यदिहास्ति किंचित् सांख्यागतं तच्च महन्महात्मन् (शांति पर्व 301.109)।

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