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Rigvedadi Bhashya Bhoomika (Hindi–Sanskrit) – by Swami Dayanand Saraswati | Foundational Veda Commentary

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ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका (Rigvedadi Bhashya Bhoomika), महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा रचित यह 455 पृष्ठीय हिन्दी-संस्कृत महाग्रंथ, वेद-भाष्य-परम्परा की एक revolutionary एवं civilisational कृति है। गोविन्द राम हसानन्द द्वारा प्रकाशित यह ग्रंथ महर्षि के सम्पूर्ण वेद-व्याख्यान-तंत्र का manifesto है — एक ऐसा scholarly दस्तावेज़ जिसने उन्नीसवीं शताब्दी में वेदाध्ययन की पारम्परिक पद्धति को मूल रूप से redefined किया।

‘भूमिका’ का शाब्दिक अर्थ है — प्रस्तावना, foundational ground। महर्षि ने अपने विशाल ऋग्वेद-यजुर्वेद-भाष्य-कार्य के लिए यह ‘भूमिका’ रची, जिसमें उन्होंने अपनी interpretative methodology का systematic exposition प्रस्तुत किया। यह भूमिका न केवल ऋग्वेद के लिए है, अपितु समस्त वैदिक साहित्य के लिए मूलभूत reading-framework प्रदान करती है — इसी कारण इसका नाम ‘ऋग्वेदादि’ (अर्थात् ऋग्वेद आदि — चारों वेद) भाष्य भूमिका रखा गया।

ग्रंथ का प्रथम खण्ड वेदों के स्वरूप-निरूपण को समर्पित है। ‘वेद’ शब्द का व्युत्पत्ति-विश्लेषण — ‘विद्’ (ज्ञान-धातु) + ‘घञ्’ प्रत्यय; वेदों की अपौरुषेयता का scholarly तर्क; उनकी प्राचीनता का shastric एवं linguistic प्रमाण; उनका अधिकार-वाद (‘वेदोऽखिलो धर्ममूलम्’) — यह सब scholarly evidence-आधारित विवेचन के साथ प्रस्तुत है।

वेदों की सृष्टि-तुलनात्मक प्राचीनता का scholarly विश्लेषण ग्रंथ का एक विशेष आयाम है। महर्षि ने यह स्थापित किया है कि वेद सृष्टि-काल में ही, समस्त मानव सभ्यता के मूल में, ईश्वर-कृत श्रुति-स्वरूप उत्पन्न हुए। उनकी काल-गणना के अनुसार वर्तमान सृष्टि-काल लगभग 1.96 अरब वर्ष पुराना है, और वेद इसी सृष्टि-प्रारम्भ-काल से अखण्ड परम्परा में संरक्षित हैं।

ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद् — वेदों के द्वितीय-स्तर के साहित्य — का systematic परिचय भी प्रस्तुत है। यह स्पष्ट किया गया है कि ब्राह्मण-ग्रंथ वेद-मन्त्रों के अर्थ-विवेचन एवं यज्ञ-कर्म-व्याख्यान के लिए प्रसिद्ध हैं; आरण्यक तपोवन-साधना से सम्बद्ध हैं; उपनिषद् ज्ञान-काण्ड का चरम विकास हैं। इन सबका वेद-मन्त्रों के अर्थ-निर्धारण में क्या scholarly भूमिका है — यह विवेचित है।

वेदाङ्गों — शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष — का systematic परिचय एवं उनकी इन्द्रियातीत scholarly भूमिका का परीक्षण ग्रंथ का एक मूल्यवान अंग है। प्रत्येक वेदाङ्ग का वेद-व्याख्यान में विशिष्ट योगदान कैसे है, यह scholarly तरीके से दर्शाया गया है।

महर्षि की interpretative methodology का scholarly exposition ग्रंथ का दार्शनिक केन्द्र है। उनकी निरुक्त-आधारित यौगिक-अर्थ-पद्धति — जिसके अनुसार वेद-शब्दों के पारम्परिक देव-वाचक अर्थों के बजाय, उनके मूल यौगिक (etymological) अर्थों को primary माना जाना चाहिए। ‘इन्द्र’ का अर्थ — परमात्मा का एक नाम (न कि विशिष्ट देवता); ‘अग्नि’ का अर्थ — परम-तत्त्व का एक रूप (न कि अग्नि-देवता); ‘सूर्य’ का अर्थ — चेतन सत्ता (न कि सूर्य-देवता) — यह interpretive shift वेद-व्याख्यान की एक नई दिशा थी।

सायण-भाष्य से उनके मतभेदों का scholarly विवेचन है। महर्षि का मत है कि सायण की कुछ व्याख्याओं में historical एवं cultural biases reflect होते हैं, जो वेद-मन्त्रों के मूल आध्यात्मिक intent को अस्पष्ट करते हैं। उन्होंने evidence-based तर्क के साथ अपना alternative प्रस्तुत किया है।

ईश्वर-तत्त्व-निरूपण ग्रंथ का दार्शनिक climax है। महर्षि का एकेश्वरवाद वैदिक है — एक सच्चिदानन्द-स्वरूप, निराकार, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, सर्वव्यापी ईश्वर। यह न तो अद्वैत-वेदान्त का सर्वव्यापी ब्रह्म है, न ही pauranic अवतारवाद; अपितु एक मौलिक वैदिक एकेश्वरवाद। ‘एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति’ — यह सूत्र इसका scholarly आधार है।

जीव-तत्त्व का विवेचन भी मौलिक है। ईश्वर एवं जीव की अनादिता, दोनों की पृथक् सत्ता, जीव की नैतिक स्वतंत्रता, कर्म-फल-सिद्धान्त, मोक्ष-स्वरूप — यह सब त्रैत-वाद (ईश्वर-जीव-प्रकृति की अनादि त्रिविधता) के framework में systematically presented है।

प्रकृति-तत्त्व एवं सृष्टि-प्रक्रिया का scholarly विवेचन — सांख्य-दर्शन के प्रकृति-पुरुष-सिद्धान्त के साथ समन्वय; प्रकृति का तीन गुणों (सत्त्व-रजस्-तमस्) से युक्त मूल कारण होना; सृष्टि-प्रक्रिया में महत्तत्त्व, अहंकार, पञ्च-तन्मात्र, इन्द्रियाँ, पञ्च-महाभूत — इन सबकी क्रमिक उत्पत्ति।

वेद-मन्त्रों के बहु-स्तरीय अर्थ — आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक — का scholarly विश्लेषण भी ग्रंथ का अंग है। एक ही मन्त्र को विविध परिप्रेक्ष्यों से कैसे समझा जा सकता है, इसके illustrative उदाहरण।

ग्रंथ का historical impact विश्वव्यापी है। यह कृति न केवल आर्य समाज परम्परा का foundational दस्तावेज़ है, अपितु आधुनिक vedic studies, Indology, comparative religion — इन सब क्षेत्रों में reference-ग्रंथ रही है। पाश्चात्य Indologists — Max Müller, Whitney — से लेकर भारतीय scholars तक — सभी ने इसका scholarly अध्ययन किया है।

ग्रंथ की भाषा scholarly हिन्दी-संस्कृत है। 455 पृष्ठीय यह कृति विषय की philosophical depth के अनुरूप एक comprehensive scope प्रस्तुत करती है।

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