Yogdarshanam (Hindi–Sanskrit) – by Swami Satyapati Parivrajak | Patanjali Yoga Sutras Commentary

Product details
योगदर्शनम् (Yogdarshanam), विख्यात् वैदिक scholar एवं योग-साधक स्वामी सत्यपति परिव्राजक द्वारा रचित यह 374 पृष्ठीय हिन्दी-संस्कृत महाग्रंथ, महर्षि पतंजलि के ‘योगसूत्र’ का scholarly किन्तु sympathetic विवेचन है। दर्शन योग धर्मार्थ ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति, भारतीय षड्-दर्शनों में से एक — योग-दर्शन — का systematic exposition प्रस्तुत करती है, जो scholarly authenticity एवं practical sadhana-orientation का अनुपम संगम है।
महर्षि पतंजलि का ‘योगसूत्र’ — संस्कृत-दर्शन-साहित्य के सर्वाधिक प्रतिष्ठित ग्रंथों में से एक — चार पादों (समाधि-पाद, साधन-पाद, विभूति-पाद, कैवल्य-पाद) में विभक्त 196 सूत्रों में योग-शास्त्र का comprehensive exposition प्रस्तुत करता है। यह ग्रंथ सहस्राब्दियों से योग-साधना का shastric foundation रहा है, और स्वामी सत्यपति परिव्राजक का यह विवेचन इसी classical परम्परा का continuation है।
स्वामी सत्यपति परिव्राजक — परिव्राजक संन्यासी एवं वैदिक scholar — ने इस ग्रंथ में मूल संस्कृत सूत्रों का प्रामाणिक प्रस्तुतीकरण, devanagari में मुद्रण, प्रत्येक सूत्र का पद-च्छेद, अन्वय, हिन्दी अनुवाद, एवं scholarly व्याख्या-सहित विश्लेषण — यह त्रिविध संरचना अपनाई है। यह संरचना ग्रंथ को संस्कृत-ज्ञानी विद्वान् एवं हिन्दी-माध्यम साधक — दोनों के लिए सुलभ बनाती है।
प्रथम पाद ‘समाधि-पाद’ का scholarly exposition — योग की मूल परिभाषा एवं उसके स्वरूप-निरूपण से। ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः’ (योगसूत्र 1.2) — चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है। यह foundational सूत्र की systematic व्याख्या; पंच-वृत्तियों (प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, स्मृति) का विवेचन; क्लिष्ट एवं अक्लिष्ट वृत्तियों का भेद; अभ्यास एवं वैराग्य की द्विविध पद्धति; ईश्वर-प्रणिधान का सर्वोच्च मार्ग — यह सब scholarly गहराई से विवेचित।
ईश्वर-तत्त्व-निरूपण ग्रंथ का दार्शनिक केन्द्र है। ‘क्लेश-कर्म-विपाक-आशयैरपरामृष्टः पुरुष-विशेष ईश्वरः’ (योगसूत्र 1.24) — ईश्वर एक विशेष पुरुष है, जो क्लेशों, कर्मों, उनके विपाक, एवं आशयों से अपरामृष्ट है। यह scholarly definition पतंजलि के दर्शन की unique विशेषता है। ईश्वर-प्रणिधान का साधना-पथ, ‘ईश्वर-प्रणिधानाद्वा’ (1.23) — ईश्वर-समर्पण से समाधि की प्राप्ति।
समाधि के प्रकार का scholarly वर्गीकरण भी अनुपम है। सम्प्रज्ञात समाधि के चार भेद — सवितर्क, निर्वितर्क, सविचार, निर्विचार; असम्प्रज्ञात समाधि; सबीज एवं निर्बीज समाधि — इन सबका systematic exposition।
द्वितीय पाद ‘साधन-पाद’ अष्टांग योग का foundational exposition प्रस्तुत करता है। यह पाद ग्रंथ का सर्वाधिक practical-oriented खण्ड है। क्रिया-योग के तीन घटक — तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान; पंच-क्लेश — अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश — का विवेचन; कर्म-फल-सिद्धान्त; दुःख का हेतु एवं निवारण; अष्टांग योग का परिचय।
यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह) एवं नियम (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान) — योग के दश foundational principles का scholarly विवेचन। प्रत्येक यम-नियम का philosophical आधार, साधना-विधि, सिद्धि के लक्षण — यह सब authentic तरीके से प्रस्तुत।
यम-सिद्धि के अद्भुत effects का systematic exposition ग्रंथ का एक scholarly आयाम है। ‘अहिंसा-प्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैर-त्यागः’ (2.35) — अहिंसा की दृढ़ प्रतिष्ठा होने पर साधक के सान्निध्य में सहज वैर-त्याग होता है; ‘सत्य-प्रतिष्ठायां क्रिया-फलाश्रयत्वम्’ (2.36) — सत्य की दृढ़ प्रतिष्ठा होने पर क्रिया एवं फल का अनुसरण होता है — यह सब scholarly साधना-संकेत हैं।
आसन एवं प्राणायाम का scholarly exposition अनुपम है। ‘स्थिर-सुखमासनम्’ (2.46) — आसन की मूल परिभाषा। प्राणायाम के तीन घटक — श्वास का बाह्य-वृत्ति-प्रच्छेदन, आभ्यन्तर-वृत्ति-प्रच्छेदन, स्तम्भ-वृत्ति। प्राणायाम का caturth (चौथा) रूप जो उन तीनों से अतिक्रान्त है। यह scholarly exposition classical hatha-yoga से distinct पतंजलि-योग का foundation है।
प्रत्याहार — इन्द्रियों का बाह्य विषयों से प्रत्यावर्तन — का scholarly विवेचन। यह योग-साधना की एक निर्णायक चरण है, जो बहिर्मुख चित्त को अन्तर्मुख की दिशा में मोड़ती है।
तृतीय पाद ‘विभूति-पाद’ — योग-साधना के परिणाम-स्वरूप उत्पन्न होने वाली विभूतियों (psychic powers) का scholarly exposition — एक रोचक खण्ड है। संयम (धारणा-ध्यान-समाधि का संयुक्त अभ्यास), विविध संयमों के परिणाम, अष्ट-सिद्धियाँ (अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व) — यह सब विवेचित।
स्वामीजी ने यह scholarly clarification भी प्रस्तुत किया है कि विभूतियाँ साधना का परिणाम हैं, किन्तु लक्ष्य नहीं। वास्तविक लक्ष्य कैवल्य अथवा मोक्ष है। ‘विभूति-वैराग्य’ का सिद्धान्त — विभूतियों के प्रति भी वैराग्य — योग-साधना का सर्वोच्च आदर्श है।
चतुर्थ पाद ‘कैवल्य-पाद’ — मुक्ति-तत्त्व का scholarly exposition। कैवल्य का स्वरूप, इसकी प्राप्ति का अंतिम मार्ग, पुरुष एवं प्रकृति का अंतिम विवेक-ख्याति, धर्म-मेघ समाधि, चित्त की समस्त कर्म-वासनाओं का चरम विलयन।
स्वामीजी की एक scholarly विशेषता यह है कि उन्होंने आर्य समाज परम्परा एवं classical योग-दर्शन का scholarly समन्वय प्रस्तुत किया है। आर्य समाज का वैदिक एकेश्वरवाद किस प्रकार पतंजलि के ईश्वर-तत्त्व के अनुरूप है, क्रिया-योग एवं अष्टांग योग किस प्रकार वैदिक सत्संग एवं स्वाध्याय परम्परा से जुड़े हैं — यह सब scholarly तरीके से प्रकाशित।
Shipping and Returns
Shipping cost is based on weight. Just add products to your cart and use the Shipping Calculator to see the shipping price.
We want you to be 100% satisfied with your purchase. Items can be returned or exchanged within 30 days of delivery.
Darshan Yog Dharmarth Trust| Vedickarts
There are no question found.







Rating & Review
There are no reviews yet.