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Vedo Me Ayurved (Hindi–Sanskrit) – by Pandit Kapil Dev Dwivedi | Vedic Roots of Ayurveda

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वेदों में आयुर्वेद (Vedo Me Ayurved), विद्वान् पंडित कपिल देव द्विवेदी द्वारा रचित यह 360 पृष्ठीय हिन्दी-संस्कृत ग्रंथ, वैदिक साहित्य में निहित आयुर्वेदीय ज्ञान की civilisational गहराई का एक scholarly किन्तु व्यावहारिक विवेचन है। भारती अनुसंधान परिषद् द्वारा प्रकाशित यह कृति इस मौलिक सत्य को scholarly तरीके से प्रस्थापित करती है कि आयुर्वेद कोई स्वतंत्र शास्त्र नहीं — यह वेदों का ही एक अनिवार्य अंग है, जिसकी जड़ें ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं विशेष रूप से अथर्ववेद में गहरी हैं।

पारम्परिक मान्यता के अनुसार, आयुर्वेद को ‘पञ्चम वेद’ अथवा ‘अथर्ववेद का उपवेद’ कहा जाता है। ‘आयुष: वेद इति आयुर्वेदः’ — आयु (जीवन) का वेद ही आयुर्वेद है। पंडित कपिल देव द्विवेदी ने अपने scholarly research में यह systematically दर्शाया है कि आयुर्वेद की समस्त मूल अवधारणाएँ — त्रिदोष-सिद्धान्त, सप्त-धातु, ओज-तेज-प्राण, अग्नि-व्यवस्था, चिकित्सा-पद्धतियाँ, औषधि-योग — इन सबके संकेत वेदों में पूर्व से उपस्थित हैं।

ग्रंथ का प्रथम खण्ड वैदिक चिकित्सा-परम्परा का scholarly परिचय प्रस्तुत करता है। ऋग्वेद में अश्विनी कुमारों — देवों के चिकित्सक-दम्पति — का प्रसिद्ध उल्लेख, उनके अनेक miraculous उपचारों का mention, धन्वन्तरि-परम्परा का foundational connection, आत्रेय-पुनर्वसु एवं आचार्य कश्यप के early references — यह सब scholarly evidence-आधारित विवेचन के साथ प्रस्तुत है।

ऋग्वेद में निहित चिकित्सा-संबंधी मन्त्रों का scholarly संकलन ग्रंथ का एक मूल्यवान अंग है। बिना सूर्य-स्तुति में ‘भिषक्’ (चिकित्सक) का सम्बोधन, अश्विनी कुमारों की प्रशंसा में सहस्र-संख्यक ऋचाएँ, सोम-स्तुति में सोम-रस के therapeutic गुण, मरुत-स्तुति में पवन के medicinal प्रभाव, आदित्य-स्तुति में सूर्य-चिकित्सा (helio-therapy) के संकेत — यह सब classical scholarship के साथ प्रस्तुत है।

अथर्ववेद का scholarly exposition ग्रंथ का सर्वाधिक comprehensive खण्ड है। अथर्ववेद को परम्परागत रूप से ‘भिषक्-वेद’ कहा जाता है, क्योंकि इसमें सहस्रों मन्त्र विभिन्न रोगों के उपचार-सम्बन्धी हैं। ज्वर (fever), यक्ष्मा (tuberculosis), कुष्ठ (skin diseases), उन्माद (mental illness), विष-प्रभाव (poisoning), क्षत-व्रण (wounds), संतान-प्राप्ति-सम्बन्धी अनुष्ठान, ब्रह्मचर्य-संरक्षण, स्वास्थ्य-संवर्धन — इन सब विषयों के मन्त्र अथर्ववेद में systematic रूप से उपलब्ध हैं।

औषधि-विज्ञान का अध्याय विशेष रूप से प्रकाशमान है। वेदों में उल्लिखित सहस्रों medicinal plants — सोम, अश्वगन्धा, ब्राह्मी, शतावरी, पिप्पली, कुटज, हरिद्रा, गुग्गुलु, गिलोय, आँवला, हरीतकी, बहेड़ा (त्रिफला के तीन घटक), तुलसी — इन सबके वैदिक references एवं उनके therapeutic applications का scholarly विवेचन है। यह दर्शाता है कि वैदिक काल का herbal pharmacopoeia अत्यन्त rich एवं sophisticated था।

पंच-महाभूत-सिद्धान्त एवं त्रिदोष-तत्त्व का वैदिक आधार ग्रंथ का दार्शनिक केन्द्र है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश — पंच-महाभूत — का वैदिक references; इन पंच-भूतों के संयोग से वात, पित्त, कफ — त्रिदोष — की व्युत्पत्ति; प्रत्येक दोष के स्थान, गुण, कर्म, लक्षण — यह सब वैदिक एवं आयुर्वेदीय परम्परा के parallel exposition में प्रस्तुत है।

सप्त-धातु-सिद्धान्त — रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र — इन सात शरीर-धातुओं की वैदिक संकेत; ओज, तेज, प्राण — के foundational concepts; अग्नि-व्यवस्था (पाचन-तंत्र) के विविध आयाम — यह सब scholarly तरीके से विवेचित।

स्वास्थ्य-संरक्षण के वैदिक सिद्धान्त — दिनचर्या, ऋतुचर्या, आहार-नियम, ब्रह्मचर्य-संयम, प्राणायाम, ध्यान — यह सब के वैदिक references। ‘जीवेम शरदः शतम्’ — हम सौ शरद् तक जीवित रहें — यह वैदिक प्रार्थना मात्र longevity की कामना नहीं, अपितु quality life की वैज्ञानिक aspiration है।

रोग-निवारण की वैदिक methodology का systematic exposition भी मूल्यवान है। मन्त्र-चिकित्सा, धातु-चिकित्सा, भेषज्य-चिकित्सा, यज्ञ-चिकित्सा (हवन-धूम के प्रभाव), सत्संग-चिकित्सा — इन सब classical methods का scholarly विवेचन।

मन एवं मानसिक स्वास्थ्य पर भी विशेष विचार है। ‘मनस्तत्त्व’ का वैदिक स्वरूप-निरूपण, मनोरोगों के वैदिक references, मानसिक तनाव के निवारण-उपाय, आत्म-साधना का mental health से connection — यह सब scholarly विवेचन।

स्त्री-स्वास्थ्य एवं प्रजनन-संबंधी अध्याय भी ग्रंथ में हैं। गर्भाधान, गर्भ-संरक्षण, प्रसूति-कर्म, स्तनपान, बाल-स्वास्थ्य — इन सब पर वैदिक मन्त्रों एवं उनकी आयुर्वेदीय applications का systematic विवेचन।

विषचिकित्सा (toxicology) के अध्याय भी मूल्यवान हैं। सर्प-विष, वृश्चिक-विष, स्थावर-विष, जंगम-विष — इन सब के वैदिक references एवं उनके उपचार के पारम्परिक methods।

पंडित कपिल देव द्विवेदी की scholarly methodology यह है कि उन्होंने वैदिक मन्त्रों के मूल पाठ, उनका हिन्दी अनुवाद, scholarly व्याख्या, एवं आधुनिक scientific correlations — यह सब integrated तरीके से प्रस्तुत किया है। यह comprehensive approach ग्रंथ को scholar एवं practitioner — दोनों के लिए उपयोगी बनाता है।

ग्रंथ का civilisational महत्त्व यह है कि यह आयुर्वेद को apparent recent development के रूप में नहीं, अपितु एक continuous वैदिक परम्परा के रूप में present करता है। यह historical perspective आयुर्वेद के scholarly understanding के लिए अनिवार्य है।

ग्रंथ की भाषा scholarly हिन्दी-संस्कृत है।

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