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Falo Se Arogya Prapti (Hindi) – by Omkar | Fruit Therapy & Ayurvedic Healing

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फलों से आरोग्य प्राप्ति (Falo Se Arogya Prapti), विद्वान् लेखक श्री ओंकार द्वारा रचित यह 90 पृष्ठीय हिन्दी पुस्तिका, फल-चिकित्सा (Fruit Therapy) की प्राचीन भारतीय परम्परा का एक सहज एवं व्यावहारिक संकलन है। अमर स्वामी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह संक्षिप्त किन्तु अत्यंत उपयोगी कृति इस सत्य को रेखांकित करती है कि प्रकृति ने मानव-स्वास्थ्य की रक्षा हेतु फलों के रूप में जो अमूल्य औषधि-भण्डार प्रदान किया है, उसका सम्यक् ज्ञान ही आरोग्य की कुंजी है।

आयुर्वेद की परम्परा में फलों को ‘फल वर्ग’ के अन्तर्गत विशेष महत्त्व प्रदान किया गया है। चरक, सुश्रुत एवं वाग्भट ने अपनी संहिताओं में अनेक फलों के medicinal गुणों, उनके दोष-शामक प्रभावों, उनकी उचित मात्रा एवं अनुपान का विस्तृत वर्णन किया है। श्री ओंकार ने इसी shastric ज्ञान को आधुनिक गृहस्थ की दैनिक आवश्यकता के अनुरूप सरल हिन्दी में प्रस्तुत किया है।

ग्रंथ में लगभग समस्त प्रचलित एवं सहज उपलब्ध फलों — आम, सेब, अनार, अंगूर, केला, संतरा, मुसम्मी, पपीता, अमरूद, चीकू, बेल, जामुन, अंजीर, खजूर, नारियल, अनानास, बेर, फालसा, आँवला, नींबू — इन सबके स्वास्थ्य-संबंधी गुणों का scholarly विवरण है। प्रत्येक फल के लिए उसका रस, गुण, वीर्य, विपाक, दोष-कर्म तथा specific roga-niवारक प्रभाव आयुर्वेदीय परिप्रेक्ष्य से वर्णित है।

आम — फलों का राजा — के बारे में लेखक ने यह दर्शाया है कि कैसे यह बल-वीर्य-वर्धक, ओज-कारक एवं सर्व-धातु-पोषक है। सेब के iron एवं fiber-संबंधी गुणों, अनार के रक्त-वर्धक एवं हृदय-रक्षक प्रभावों, पपीते के पाचन-सहायक गुणों, आँवले के rasayana एवं anti-aging प्रभावों — इन सबका सुगम विवेचन है।

रोग-विशिष्ट फल-उपचार ग्रंथ का सर्वाधिक व्यावहारिक खण्ड है। मधुमेह में जामुन, करेला एवं अमरूद का सेवन; उच्च रक्तचाप में अनार एवं तरबूज की उपयोगिता; अनिद्रा में केले एवं चेरी का प्रभाव; constipation में पपीता एवं अंजीर; अम्लता में नारियल पानी एवं केला; हृदय-रोग में सेब एवं अंगूर — इन common अस्वस्थताओं हेतु प्राकृतिक एवं सुलभ समाधान दिए गए हैं।

स्त्री-स्वास्थ्य का विशेष अध्याय है — गर्भावस्था में किन फलों का सेवन हितकर है, मासिक धर्म में कौन से फल लाभदायक हैं, स्तनपान-काल में कैसे फलाहार माता एवं शिशु — दोनों के लिए लाभकारी है। बाल-स्वास्थ्य के लिए भी एक अलग अनुभाग है, जहाँ बच्चों के मानसिक एवं शारीरिक विकास हेतु फलों का सेवन-क्रम प्रस्तुत है।

ऋतु-अनुसार फल-सेवन की वैदिक दृष्टि भी ग्रंथ में रेखांकित है। ग्रीष्म ऋतु में कौन से फल देहाग्नि को शान्त रखते हैं, वर्षा में किन फलों से बचना चाहिए, शरद ऋतु में किनका सेवन rasayana-कारक है, हेमन्त एवं शिशिर में कौन से फल बल-वर्धक हैं, वसन्त में dosha-शोधन हेतु कौन से फल उपयुक्त हैं — यह ऋतुचर्या-विवेचन ग्रंथ की एक विशेष उपलब्धि है।

लेखक ने fruit juice की scientific समझ भी प्रस्तुत की है — कब juice लाभकारी है, कब नहीं; ताज़ा juice एवं पैक्ड juice का अन्तर; juice fasting के लाभ एवं सावधानियाँ; mixed fruit combinations जो शरीर के लिए हितकर हैं तथा कौन से combinations virodhahi हैं। यह व्यावहारिक मार्गदर्शन आधुनिक स्वास्थ्य-चेतन पाठक के लिए विशेष उपयोगी है।

प्राकृतिक चिकित्सा (naturopathy) के दृष्टिकोण से भी कुछ अध्याय हैं। फलाहार पर आधारित mono-diet, fruit-fasting का systematic विधान, body detoxification हेतु फलों का सेवन — इन सबका सरल किन्तु scientific विवरण है।

ग्रंथ की भाषा प्रांजल हिन्दी है, जिसमें आवश्यकता पड़ने पर संस्कृत आयुर्वेदीय शब्दावली का सटीक प्रयोग है। 90 पृष्ठीय compact आकार इसे एक practical reference manual बनाता है, जिसे रसोई-घर अथवा अध्ययन-वेदी पर रख कर आवश्यकतानुसार प्रयोग किया जा सकता है।

स्वास्थ्य-चेतन गृहस्थों, आयुर्वेद के जिज्ञासु पाठकों, naturopathy के अभ्यासियों, माताओं एवं प्रत्येक उस व्यक्ति के लिए जो medicines पर निर्भरता कम कर प्राकृतिक एवं सात्त्विक मार्ग से आरोग्य की कामना रखता है — फलों से आरोग्य प्राप्ति एक मूल्यवान साथी है। यह पुस्तिका इस सत्य का स्मरण है कि स्वस्थ जीवन का सरलतम मार्ग प्रकृति के निकट है — और प्रकृति ने अपना सबसे मधुर औषधि-रूप फलों में सहेज रखा है।

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