Chanakya Neeti Darpan (Hindi–Sanskrit) – by Swami Jagdeeshwaranand Saraswati | Niti Shastra Treatise

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चाणक्य नीति दर्पण (Chanakya Neeti Darpan), विद्वान् स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती द्वारा रचित-व्याख्यात यह 280 पृष्ठीय हिन्दी-संस्कृत ग्रंथ, आचार्य चाणक्य की कालजयी नीति-शास्त्रीय विरासत का scholarly किन्तु आत्मीय विवेचन है। गोविन्द राम हसानन्द द्वारा प्रकाशित यह कृति ‘चाणक्य नीति’ के मूल सूत्रों को वैदिक एवं आर्य समाज दृष्टिकोण के आलोक में आधुनिक पाठक के सम्मुख प्रस्तुत करती है।
आचार्य चाणक्य — जिन्हें कौटिल्य, विष्णुगुप्त एवं चन्द्रगुप्त के गुरु के रूप में भी जाना जाता है — भारतीय civilisational इतिहास के सर्वाधिक प्रखर political-economic-ethical चिन्तक थे। चौथी शताब्दी ईसा-पूर्व में जन्म लेकर उन्होंने मगध साम्राज्य की पुनर्स्थापना, मौर्य वंश की प्रतिष्ठा एवं भारत की पहली comprehensive arthashastra की रचना — यह त्रिविध civilisational कार्य सम्पन्न किया। ‘चाणक्य नीति’ उनकी एक popularised कृति है, जिसमें 17 अध्यायों एवं लगभग 350 श्लोकों में जीवन के विविध आयामों — परिवार, मित्रता, शत्रुता, धन, विद्या, राजनीति, धर्म — से सम्बन्धित practical wisdom संगृहीत है।
स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती ने अपने scholarly सम्पादन में एक sympathetic किन्तु critical दृष्टिकोण अपनाया है। उन्होंने मूल संस्कृत श्लोकों का प्रामाणिक प्रस्तुतीकरण, devanagari में मुद्रण, प्रत्येक श्लोक का पद-च्छेद, हिन्दी अनुवाद, एवं scholarly व्याख्या — यह त्रिविध संरचना अपनाई है। यह संरचना ग्रंथ को संस्कृत-ज्ञानी एवं हिन्दी-माध्यम पाठक — दोनों के लिए सुलभ बनाती है।
प्रथम अध्यायों में जीवन के foundational principles प्रस्तुत हैं — सच्चा मित्र कौन है, कौन-सा साथी त्याज्य है, परिवार में सद्भाव कैसे रखें, स्वस्थ जीवन के सिद्धान्त, धन का सम्यक् उपयोग। ‘दुर्जनः परिहर्तव्यः’ — दुर्जन का परित्याग; ‘विद्या ददाति विनयम्’ — विद्या से विनय; ‘अर्थस्य पुरुषो दासः’ — धन का दास पुरुष — यह सूत्र चाणक्य की civilisational दृष्टि के मूल हैं।
स्त्री-समाज एवं परिवार-धर्म पर विशेष विचार है। चाणक्य के अनेक श्लोक स्त्रियों के विषय में हैं, जिनकी कुछ व्याख्याएँ आधुनिक context में controversial भी हो सकती हैं। स्वामीजी ने scholarly objectivity के साथ इन सूत्रों का historical context में परीक्षण किया है, साथ ही प्रासंगिक adjustments सुझाए हैं। उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि चाणक्य का मूल intent स्त्री-अनादर नहीं था; उनकी कुछ टिप्पणियाँ तत्कालीन सामाजिक संदर्भ की उपज थीं।
राजनीति-शास्त्र के सूत्र ग्रंथ का scholarly केन्द्र हैं। राजा के आचरण-नियम, मंत्रियों के चयन के मानदण्ड, प्रजा-पालन की विधि, शत्रु-निवारण के उपाय, सन्धि-विग्रह की नीति — यह सब आधुनिक political theory के साथ comparable scholarly framework प्रस्तुत करता है। ‘दुष्ट-निग्रह-शिष्ट-संरक्षण’ — दुष्टों का दण्डन एवं सज्जनों का संरक्षण — राजनीति का मूल सूत्र है।
अर्थ-नीति के अध्याय भी मूल्यवान हैं। धनोपार्जन के योग्य मार्ग, बचत का महत्त्व, अनावश्यक व्यय का परिहार, ऋण से बचाव, व्यापार में नीति, दान का सम्यक् स्वरूप — यह सब practical financial wisdom है, जो आधुनिक काल में भी प्रासंगिक है। ‘न संचयं कार्यम्’ — अति-संचय निषेध; ‘धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष’ — चतुर्विध पुरुषार्थ का संतुलन।
विद्या एवं शिक्षा के सिद्धान्त अनुपम हैं। ‘विद्या नाम नरस्य रूपमधिकम्’ — विद्या ही पुरुष का सर्वोच्च अलंकार है। शिक्षा का स्वरूप क्या होना चाहिए, गुरु-शिष्य-संबंध, अध्ययन का अनुशासन, ज्ञान का सम्यक् उपयोग — यह सब scholarly तरीके से विवेचित है।
मित्रता एवं शत्रुता के सूत्र मानव-संबंधों की civilisational समझ प्रदान करते हैं। ‘आपदर्थे धनं रक्षेत्’ — विपत्ति-काल हेतु धन-संरक्षण; ‘दारैरपि धनैरपि’ — स्त्री एवं धन का सम्यक् उपयोग। ‘सत्संग’ का scholarly महत्त्व, दुर्जन-त्याग की आवश्यकता, सच्चे मित्र की पहचान — यह सब विशेष रूप से प्रकाशमान है।
स्वास्थ्य एवं नैतिक जीवन के सूत्र भी ग्रंथ में हैं। आहार-विहार-नियम, शयन-जागरण के नियम, ब्रह्मचर्य-संयम, सद्आचरण के मानदण्ड — यह सब वैदिक-आयुर्वेदीय परम्परा के अनुरूप practical guidance है।
स्वामीजी की scholarly contribution यह है कि उन्होंने चाणक्य की दृष्टि का आर्य समाज एवं वैदिक परम्परा के साथ scholarly संगति प्रस्थापित की है। चाणक्य का धर्म-केन्द्रित जीवन-दर्शन, उनका वैदिक-यज्ञ-संस्कृति के प्रति आदर, उनका ब्राह्मणत्व का मौलिक अर्थ — यह सब आर्य समाज के foundational principles के अनुरूप है।
ग्रंथ की भाषा प्रांजल हिन्दी है, जिसमें संस्कृत classical शब्दावली का सटीक प्रयोग है। 280 पृष्ठीय compact आकार ग्रंथ को दैनिक स्वाध्याय हेतु सुगम बनाता है।
राजनीति-विज्ञान के विद्यार्थियों, civil services के अभ्यर्थियों, business-leadership के professionals, dharmic-गृहस्थों, संस्कृत-नीति-साहित्य के researchers, आर्य समाज के साधकों, एवं प्रत्येक उस सुधी पाठक के लिए जो आचार्य चाणक्य की कालजयी practical wisdom से प्रत्यक्ष लाभान्वित होना चाहता है — चाणक्य नीति दर्पण एक trustworthy मार्गदर्शक है।
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Govind Ram Hasanand| Vedickarts
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