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Dayanand Shastrartha Sangraha (Hindi) – by Kaviraj Raghunandan Singh Nirmal | Historic Arya Samaj Debates

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दयानन्द शास्त्रार्थ संग्रह (Dayanand Shastrartha Sangraha), विद्वान् कविराज रघुनन्दन सिंह ‘निर्मल’ द्वारा संकलित-सम्पादित यह 268 पृष्ठीय हिन्दी-संस्कृत ग्रंथ, महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा अपने जीवनकाल में किए गए ऐतिहासिक शास्त्रार्थों का scholarly संग्रह है। आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति, उन्नीसवीं शताब्दी के सर्वाधिक significant धार्मिक-दार्शनिक debates का प्रामाणिक chronicling प्रस्तुत करती है।

‘शास्त्रार्थ’ संस्कृत-परम्परा का एक civilisational institution है — जिसमें विभिन्न दार्शनिक या धार्मिक positions को मानने वाले pandits एक-दूसरे के सम्मुख scholarly arguments प्रस्तुत करते हैं, और evidence-आधारित तर्क-वितर्क के माध्यम से सत्य का निर्धारण किया जाता है। महर्षि दयानन्द ने इसी पारम्परिक methodology का प्रयोग करते हुए अपने जीवनकाल में अनेक ऐतिहासिक शास्त्रार्थ सम्पन्न किए — जिनमें वैदिक एकेश्वरवाद, मूर्ति-पूजा, अवतारवाद, ईसाई-इस्लामी सिद्धान्तों — जैसे विषयों पर विद्वत्तापूर्ण bahas हुई।

ग्रंथ में संकलित प्रमुख शास्त्रार्थ ऐतिहासिक रूप से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। **काशी शास्त्रार्थ (1869)** — जब महर्षि ने काशी (वाराणसी) में 30 से अधिक प्रतिष्ठित pandits के विरुद्ध मूर्ति-पूजा एवं वेद-पुराण-अधिकार के प्रश्न पर शास्त्रार्थ किया। यह शास्त्रार्थ आधुनिक भारतीय धार्मिक इतिहास का एक turning point था। महर्षि का प्रश्न था — ‘क्या वेदों में मूर्ति-पूजा का विधान है?’ इस प्रश्न के समाधान-स्वरूप जो scholarly exchange हुआ, उसका प्रामाणिक विवरण यहाँ है।

**चांदापुर मेला शास्त्रार्थ (1877)** — जहाँ महर्षि का सामना ईसाई एवं मुस्लिम विद्वानों से हुआ। ‘पादरी स्काट’ एवं ‘मौलवी मोहम्मद’ के साथ धार्मिक संवाद, ‘God of Christianity’, ‘Allah of Islam’, ‘Brahman of Vedanta’ की scholarly तुलना — यह सब का chronicling। यह शास्त्रार्थ comparative religion का एक early instance था।

**अहमदाबाद शास्त्रार्थ** — गुजराती pandits के साथ; **पुणे शास्त्रार्थ** — महाराष्ट्रीय brahmin समाज के साथ; **राजकोट शास्त्रार्थ** — काठियावाड़ क्षेत्र में; **बरेली शास्त्रार्थ** — आर्य समाजी एवं sectarian हिन्दू-ओं के बीच — इन सबका विवरण ग्रंथ में उपलब्ध है।

प्रत्येक शास्त्रार्थ के लिए ग्रंथ में systematic structure है — historical context, debate के मूल प्रश्न, विरोधी पक्ष की position, महर्षि के counter-arguments, evidence-based reasoning, अंतिम scholarly निष्कर्ष — यह सब प्रामाणिक तरीके से प्रस्तुत है।

मूर्ति-पूजा के प्रश्न पर महर्षि का scholarly stand ग्रंथ का एक central theme है। उनका तर्क था कि वेदों में मूर्ति-पूजा का कोई विधान नहीं है, अपितु निराकार ईश्वर की उपासना का सिद्धान्त है। ‘न तस्य प्रतिमा अस्ति’ — श्वेताश्वतर उपनिषद् का यह सूत्र; ‘अन्धन्तमः प्रविशन्ति ये असम्भूतिमुपासते’ — ईशावास्य उपनिषद् का यह सूत्र — इन सब evidence के आधार पर महर्षि ने अपना scholarly argument प्रस्तुत किया।

अवतारवाद के प्रश्न पर भी महर्षि का scholarly position था। उनका मत था कि वैदिक एकेश्वरवाद के अनुसार ईश्वर सर्वव्यापी, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान है, अतः उसे विशिष्ट मानव-शरीर में अवतार लेने की कोई आवश्यकता नहीं है। यह view पारम्परिक pauranic दृष्टिकोण से भिन्न था, और इस पर लम्बे scholarly debates हुए।

ईसाई धर्म के साथ संवाद ग्रंथ का एक उल्लेखनीय आयाम है। महर्षि ने Bible के कुछ passages पर scholarly questions उठाए — God की anthropomorphic descriptions, Original Sin का concept, Trinity का doctrine — इन सब पर उन्होंने reasoned objections प्रस्तुत किए। ईसाई missionaries के साथ यह संवाद respectful था, किन्तु scholarly rigorous भी था।

इस्लाम के साथ संवाद भी समान scholarly tone में हुआ। महर्षि ने Quran के कुछ aspects पर तर्क-संगत प्रश्न उठाए — जैसे polygamy, slavery का question, religious tolerance — इन सब पर उन्होंने evidence-based arguments प्रस्तुत किए। साथ ही, इस्लाम के एकेश्वरवादी core का उन्होंने scholarly सम्मान भी किया।

जैन एवं बौद्ध दर्शन के साथ भी महर्षि के संवाद हुए, जिनका scholarly chronicling ग्रंथ में है। वैदिक dualism एवं जैन-बौद्ध positions के बीच philosophical similarities एवं differences का scholarly assessment।

कविराज रघुनन्दन सिंह ‘निर्मल’ की scholarly methodology objectivity एवं श्रद्धा का संगम है। उन्होंने न केवल hagiographic विवरण प्रस्तुत किया है, अपितु scholarly evidence-based critical चित्रण भी प्रस्तुत किया है। प्रत्येक शास्त्रार्थ के दोनों पक्षों के arguments का fair representation है, ताकि पाठक स्वयं scholarly assessment कर सके।

ग्रंथ का historical महत्त्व आधुनिक भारतीय धार्मिक चेतना के विकास के परिप्रेक्ष्य में अनुपम है। यह कृति दर्शाती है कि उन्नीसवीं शताब्दी में जो religious renaissance हुआ, वह केवल भावना-आधारित नहीं था; अपितु scholarly debates, evidence-based reasoning, एवं dharmic-philosophical engagement का परिणाम था।

ग्रंथ की भाषा scholarly हिन्दी है। मूल संस्कृत-उद्धरणों के साथ हिन्दी अनुवाद एवं scholarly व्याख्या — यह त्रिविध संरचना अध्ययन को systematic बनाती है। 268 पृष्ठीय आयाम विषय की richness के अनुरूप है।

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