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Maharshi Dayanand Charit (Hindi) – by Babu Devendra Nath Mukhopadhyay | Definitive Dayanand Saraswati Biography

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महर्षि दयानन्द चरित (Maharshi Dayanand Charit), विद्वान् बाबू श्री देवेन्द्र नाथ मुखोपाध्याय द्वारा रचित यह 684 पृष्ठीय हिन्दी ग्रंथ, महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती की जीवन-गाथा का सर्वाधिक comprehensive एवं scholarly जीवनी-ग्रंथों में से एक है। गोविन्द राम हसानन्द द्वारा प्रकाशित यह कृति आर्य समाज के संस्थापक — उन्नीसवीं शताब्दी के सर्वाधिक consequential वैदिक सुधारक — के व्यक्तित्व, विचार एवं कार्य का scholarly किन्तु sympathetic दर्शन प्रस्तुत करती है।

बाबू देवेन्द्र नाथ मुखोपाध्याय — बंगाली-भाषी आर्य समाज विद्वान् एवं इतिहासकार, जिनका जीवन महर्षि के जीवनकाल से कुछ अंशों में overlap करता है — ने इस ग्रंथ की रचना में primary sources, तत्कालीन witnesses के साक्ष्य, एवं scholarly evidence — इन सब का व्यापक उपयोग किया है। 684 पृष्ठीय यह विशाल कृति महर्षि के जीवन के लगभग प्रत्येक significant अध्याय का प्रामाणिक chronicling प्रस्तुत करती है।

ग्रंथ का प्रथम खण्ड महर्षि के बाल्यकाल पर समर्पित है। काठियावाड़ (गुजरात) के टंकारा गाँव में 1824 में जन्म, उनके पिता अम्बाशंकर तिवारी का परिवार-परिवेश, बाल्यकाल की शिक्षा, परिवार के धार्मिक संस्कार, उनके यौवनोदय की निर्णायक घटनाएँ — यह सब scholarly विवरण के साथ प्रस्तुत है।

शिवरात्रि-रात्रि का प्रसिद्ध ‘मूषक प्रसंग’ — जिसने बालक मूलशंकर के मन में मूर्ति-पूजा के विरुद्ध मौलिक प्रश्न उत्पन्न किए — का sympathetic विवेचन ग्रंथ का एक लोकप्रिय खण्ड है। इस घटना के मनोवैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक implications का scholarly विश्लेषण है।

गृह-त्याग एवं संन्यास-दीक्षा के अध्याय अत्यन्त मार्मिक हैं। 22 वर्ष की आयु में गृह-त्याग, अनेक स्थानों पर भ्रमण, विभिन्न साधु-संतों एवं पंडितों से शिक्षा, अंततः मथुरा में स्वामी विरजानन्द से वैदिक-व्याकरण-शिक्षा प्राप्ति — यह सम्पूर्ण साधना-यात्रा scholarly तरीके से चिह्नित है। स्वामी विरजानन्द के साथ शिक्षा-काल के तीन वर्ष — जो महर्षि की scholarly transformation का period थे — का विशेष महत्त्व है।

स्वामी विरजानन्द से ‘गुरु-दक्षिणा’ का प्रसिद्ध प्रसंग — जब गुरु ने महर्षि से वैदिक धर्म के पुनर्जागरण का संकल्प माँगा — का scholarly विवरण है। यह प्रसंग महर्षि के life-mission का defining moment था।

प्रचार-यात्राओं के अध्याय में महर्षि की भारत-व्यापी यात्राओं का systematic chronicling है। काशी, कोलकाता, मुम्बई, अहमदाबाद, राजकोट, पुणे, उदयपुर, जयपुर, आगरा, मेरठ, लाहौर — इन सब स्थानों पर उनके प्रवचन, शास्त्रार्थ, सामाजिक सुधार-कार्य, एवं dharmic-संगठन-निर्माण की activities का प्रामाणिक विवरण है।

प्रसिद्ध शास्त्रार्थों का scholarly संकलन ग्रंथ की एक उपलब्धि है। काशी का शास्त्रार्थ (1869) — जब महर्षि ने 30 से अधिक pandits के विरुद्ध मूर्ति-पूजा एवं वेद-पुराण-अधिकार के प्रश्न पर शास्त्रार्थ किया; वाराणसी, चांदापुर, मेला (1873), विभिन्न ईसाई-मुस्लिम विद्वानों के साथ धार्मिक संवाद — इन सबका विवरण scholarly तरीके से उपलब्ध है।

आर्य समाज की स्थापना (10 अप्रैल 1875, मुम्बई) का historical विवरण ग्रंथ का एक central अध्याय है। संगठन के मूल सिद्धान्त, प्रारम्भिक 28 सिद्धान्त, बाद में 10 सिद्धान्तों का अंतिम स्वरूप, सत्यार्थ प्रकाश की रचना-पृष्ठभूमि, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका का प्रकाशन — यह सब chronologically presented है।

प्रमुख कृतियों — सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय, ऋग्वेद-भाष्य, यजुर्वेद-भाष्य — का scholarly परिचय एवं उनकी रचना-पृष्ठभूमि भी विवेचित है।

समाज-सुधार के क्षेत्र में महर्षि के योगदान का comprehensive विवेचन है। बाल-विवाह विरोध, स्त्री-शिक्षा का प्रबल समर्थन, विधवा-विवाह की स्वीकृति, अस्पृश्यता का खण्डन, जाति-व्यवस्था की कर्म-गुण-आधारित मौलिक व्याख्या, हिन्दी भाषा का प्रोत्साहन, गुरुकुलीय शिक्षा-प्रणाली का पुनर्जागरण — इन सब पहलों का chronicling।

प्रसिद्ध शिष्यों-सहयोगियों के साथ संबंध — पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी, स्वामी श्रद्धानन्द, लाला हंसराज, पंडित लेखराम, स्वामी दर्शनानन्द — इन सबके योगदान एवं महर्षि के साथ उनके relationships का scholarly विवरण है।

अंतिम अध्याय अत्यन्त मार्मिक हैं — महर्षि की अजमेर में दीपावली 1883 की रात्रि का देहावसान, उनके मृत्यु-संबंधी विवादास्पद परिस्थितियाँ (अकस्मात् बीमारी, संदिग्ध परिस्थितियाँ), उनके अंतिम क्षणों के साक्षात् विवरण, एवं उनके निधन के पश्चात् आर्य समाज की क्रमिक प्रगति।

बाबू मुखोपाध्याय की scholarly methodology objectivity एवं श्रद्धा का संगम है। उन्होंने न केवल हagiographic विवरण प्रस्तुत किया है, अपितु scholarly evidence-based critical assessment भी प्रस्तुत किया है। 684 पृष्ठीय यह विशाल आयाम विषय की महत्ता एवं depth के अनुरूप है।

आर्य समाज के साधकों, आधुनिक भारतीय इतिहास के researchers, धार्मिक सुधार-इतिहास के अध्येताओं, biographical literature के पाठकों, संस्कृत-वेद-शास्त्र के विद्यार्थियों, एवं प्रत्येक उस सुधी पाठक के लिए जो आधुनिक भारतीय religious renaissance के सर्वोच्च व्यक्तित्व का comprehensive scholarly परिचय चाहता है — महर्षि दयानन्द चरित एक indispensable ग्रंथ है।

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