Maharshi Dayanand (Hindi) – by Indra Vidyavachaspati | Concise Dayanand Saraswati Biography

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महर्षि दयानन्द (Maharshi Dayanand), विद्वान् श्री इन्द्र विद्यावाचस्पति द्वारा रचित यह 168 पृष्ठीय हिन्दी ग्रंथ, महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती की जीवन-यात्रा एवं उनके civilisational कार्य का एक compact किन्तु scholarly perspective प्रस्तुत करती है। परोपकारिणी सभा द्वारा प्रकाशित यह कृति — महर्षि द्वारा स्वयं संस्थापित आर्य समाज की मूल institutional body — से प्रसूत है, और इसी कारण इसकी scholarly authenticity एवं dharmic gravitas विशेष रूप से प्रकाशमान है।
श्री इन्द्र विद्यावाचस्पति — आर्य समाज परम्परा से सम्बद्ध एक प्रखर scholar — ने अपनी इस कृति में महर्षि के व्यक्तित्व का comprehensive किन्तु concise चित्रण प्रस्तुत किया है। 168 पृष्ठीय compact आकार के बावजूद, ग्रंथ महर्षि के जीवन के सभी मुख्य आयामों — जन्म-बाल्यकाल, गृह-त्याग, गुरु-शिक्षा, प्रचार-कार्य, संगठन-निर्माण, कृति-रचना, अंतिम काल — को systematic scholarly तरीके से cover करता है।
ग्रंथ का प्रथम खण्ड महर्षि के बाल्यकाल पर समर्पित है। 1824 में काठियावाड़ (गुजरात) के टंकारा गाँव में उनके जन्म, अम्बाशंकर तिवारी के घर में पारिवारिक संस्कार, बाल्यकाल की प्रारम्भिक शिक्षा, यौवनारम्भ की निर्णायक घटनाएँ — यह सब प्रामाणिक scholarly विवरण के साथ प्रस्तुत है।
शिवरात्रि-रात्रि का प्रसिद्ध ‘मूषक प्रसंग’ — जिसने बालक मूलशंकर के मन में मूर्ति-पूजा के विरुद्ध मौलिक प्रश्न उत्पन्न किए — का sympathetic विवेचन है। उस रात्रि शिव-मन्दिर में जागरण के दौरान, जब मूषक शिव-लिंग पर चढ़ते देखे, तो बालक मूलशंकर के मन में यह scholarly प्रश्न उठा कि क्या यह ‘देवता’ स्वयं को मूषकों से नहीं बचा सकता तो वह मानवों की रक्षा कैसे कर सकेगा? यह childhood epiphany ने उनके भविष्य की scholarly direction तय की।
गृह-त्याग एवं संन्यास-यात्रा के अध्याय भी scholarly तरीके से चिह्नित हैं। 22 वर्ष की आयु में गृह-त्याग, अनेक स्थानों पर भ्रमण, विभिन्न साधु-संतों एवं pandits से शिक्षा, अंततः मथुरा में स्वामी विरजानन्द से वैदिक-व्याकरण-शिक्षा प्राप्ति — यह सम्पूर्ण साधना-यात्रा। स्वामी विरजानन्द का प्रभाव — जिन्हें महर्षि अपना दार्शनिक गुरु मानते थे — का विशेष महत्त्व विवेचित है।
स्वामी विरजानन्द से ‘गुरु-दक्षिणा’ का प्रसंग ग्रंथ के एक central moment के रूप में प्रस्तुत है। जब महर्षि शिक्षा-काल पूर्ण कर गुरु-दक्षिणा के लिए उपस्थित हुए, तो स्वामी विरजानन्द ने कोई धन-ध्यान न लेकर महर्षि से एक scholarly संकल्प माँगा — कि वे अपने जीवन को मूल वैदिक धर्म के पुनर्जागरण के लिए समर्पित करें। यह वचन ही महर्षि के life-mission का foundational moment था।
प्रचार-यात्राओं का scholarly chronicling ग्रंथ का एक मूल्यवान खण्ड है। महर्षि की भारत-व्यापी travels — काशी, कोलकाता, मुम्बई, अहमदाबाद, राजकोट, पुणे, उदयपुर, जयपुर, आगरा, मेरठ, लाहौर, मुजफ्फरनगर — इन सब स्थानों पर उनके प्रवचन, scholarly debates, सामाजिक सुधार-कार्य।
प्रसिद्ध शास्त्रार्थों का संक्षिप्त किन्तु scholarly chronicling है। काशी का 1869 का शास्त्रार्थ, चांदापुर मेला 1877, अनेक ईसाई-मुस्लिम विद्वानों के साथ संवाद — इन सबका विवरण।
आर्य समाज की स्थापना (10 अप्रैल 1875, मुम्बई) का historical विवरण ग्रंथ का एक central अध्याय है। संगठन के मूल सिद्धान्त, संस्थापक-काल के सहयोगियों के नाम, प्रारम्भिक prinicipal-rules, बाद में 10-सिद्धान्तों का अंतिम स्वरूप — यह सब chronologically presented है।
प्रमुख कृतियों का scholarly परिचय भी ग्रंथ का अंग है। सत्यार्थ प्रकाश का comprehensive overview — इसके 14 समुल्लासों की विषय-वस्तु, इसकी रचना-पृष्ठभूमि, इसका historical impact। ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका का scholarly significance। अन्य रचनाएँ — संस्कारविधि, आर्याभिविनय, ऋग्वेद-भाष्य, यजुर्वेद-भाष्य — का संक्षिप्त परिचय।
समाज-सुधार के क्षेत्र में महर्षि के योगदान का systematic chronicling है। बाल-विवाह विरोध, स्त्री-शिक्षा का प्रबल समर्थन, विधवा-विवाह की स्वीकृति, अस्पृश्यता का खण्डन, जाति-व्यवस्था की कर्म-गुण-आधारित मौलिक व्याख्या, हिन्दी भाषा का प्रोत्साहन — इन सब reformist पहलों का chronicling।
प्रसिद्ध शिष्यों एवं सहयोगियों के साथ संबंध — पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी, स्वामी श्रद्धानन्द, लाला हंसराज, पंडित लेखराम, स्वामी दर्शनानन्द — इन सबके योगदान।
अंतिम अध्याय अत्यन्त मार्मिक है — महर्षि की अजमेर में दीपावली 1883 की रात्रि का देहावसान। उनके मृत्यु-संबंधी विवादास्पद परिस्थितियाँ, उनके अंतिम क्षणों की प्रामाणिक descriptions — यह सब scholarly तरीके से प्रस्तुत है।
लेखक की scholarly methodology objectivity एवं श्रद्धा का संगम है। यह ग्रंथ scholarly readers के लिए एक accessible entry-point प्रदान करता है, जो महर्षि के जीवन की complete picture के लिए larger biographical works की ओर ले जा सकता है।
ग्रंथ की भाषा प्रांजल हिन्दी है। 168 पृष्ठीय compact आकार ग्रंथ को त्वरित अध्ययन हेतु ideal बनाता है। 100 रुपए मूल्य अत्यन्त affordable है।
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