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Upanishad Prakash (Hindi–Sanskrit) – by Satyavrat Siddhantalankar | Principal Upanishads Exposition

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उपनिषद् प्रकाश (Upnishad Prakash), विद्वान् श्री सत्यव्रत सिद्धान्तालङ्कार द्वारा रचित यह 520 पृष्ठीय हिन्दी-संस्कृत महाग्रंथ, उपनिषदीय परम्परा के gahn आध्यात्मिक एवं दार्शनिक प्रकाश का scholarly किन्तु sympathetic विवेचन है। सत्यव्रत प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह कृति प्रमुख उपनिषदों के अमर मन्त्रों का systematic exposition प्रस्तुत करती है।

उपनिषद् — वेदों के ज्ञान-काण्ड का सर्वोच्च विकास — मानव सभ्यता के सर्वाधिक प्रतिष्ठित आध्यात्मिक ग्रंथ हैं। ‘उप’ (समीप) + ‘नि’ (निश्चय से) + ‘षद्’ (बैठना) — गुरु के समीप विश्वास के साथ बैठ कर ज्ञान प्राप्त करना — यह उपनिषद् का व्युत्पत्ति-अर्थ है। पारम्परिक रूप से 108 उपनिषद् माने जाते हैं, जिनमें से 11 — ईशावास्य, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक, श्वेताश्वतर — को ‘मुख्य उपनिषद्’ के रूप में मान्यता प्राप्त है।

ग्रंथ का प्रथम खण्ड उपनिषदीय परम्परा का scholarly परिचय प्रस्तुत करता है। उपनिषदों का काल-निर्धारण, उनकी सम्बन्धित शाखाओं (ब्राह्मण-आरण्यक) से connections, उनकी मुख्य philosophical themes, उनकी interpretation के विविध दृष्टिकोण (शंकर, रामानुज, मध्व, आधुनिक) — यह सब scholarly तरीके से प्रस्तुत है।

ईशावास्य उपनिषद् — समस्त उपनिषदों का सार-सूत्र — का systematic exposition ग्रंथ का एक खण्ड है। 18 मन्त्रों का यह संक्षिप्त किन्तु अनुपम उपनिषद् ‘ईशावास्यमिदं सर्वम्’ (समस्त जगत् ईश्वर से व्याप्त है) से प्रारम्भ होकर ‘अग्ने नय सुपथा राये’ (हे प्रभु! हमें श्रेय-मार्ग पर ले चलो) के final मन्त्र तक एक comprehensive spiritual journey प्रस्तुत करता है।

केनोपनिषद् — साम-वेद का यह उपनिषद् ‘केन ईषितं पतति प्रेषितं मनः’ (किस के द्वारा प्रेरित हो कर मन गति करता है?) — के मूल प्रश्न से प्रारम्भ होता है। यह ब्रह्म एवं इन्द्रियों के संबंध का scholarly विवेचन प्रस्तुत करता है। सत्यव्रतजी ने इसके चार खण्डों — सिद्धान्त-काण्ड, उपासना-काण्ड, ज्ञान-काण्ड, अध्यात्म-काण्ड — का systematic विवेचन किया है।

कठोपनिषद् का scholarly विवेचन ग्रंथ का एक प्रमुख आयाम है। यम एवं नचिकेता का प्रसिद्ध संवाद — मानव civilisation का सर्वाधिक प्रतिष्ठित दार्शनिक dialogue। नचिकेता की त्रिविध varas, यम का प्रारम्भिक hesitation, अंततः ब्रह्म-विद्या का परम-गोपनीय उपदेश — यह सब scholarly गहराई से विवेचित है। ‘श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः’ — यम-नचिकेता-संवाद की मूल भूमि।

प्रश्नोपनिषद् — पिप्पलाद ऋषि एवं छह जिज्ञासुओं के बीच के dialogues — का scholarly exposition भी अनुपम है। प्राण-विद्या, वाक्-विद्या, पुरुष-विद्या, इन्द्रिय-विद्या, ओंकार-उपासना, पुरुषोत्तम-दर्शन — इन सब विषयों का systematic विवेचन।

मुण्डकोपनिषद् — ‘मुण्डन’ (शिर-मुण्डन-जैसा संकल्प-त्याग) से सम्बद्ध यह उपनिषद् — ‘पारा’ एवं ‘अपरा’ विद्या का scholarly भेद प्रस्तुत करता है। ‘सत्यमेव जयते’ — मुण्डक उपनिषद् का यह सूत्र भारत के राष्ट्रीय motto बना है, जिसका scholarly significance भी विवेचित है।

माण्डूक्य उपनिषद् — मात्र 12 मन्त्रों का यह उपनिषद् — ओंकार के चतुर्विध आयामों (अ-उ-म-अमात्र) का systematic exposition प्रस्तुत करता है। आत्मा की चतुर्विध स्थितियों — जागृत (वैश्वानर), स्वप्न (तैजस), सुषुप्ति (प्राज्ञ), तुरीय — का scholarly विवेचन।

तैत्तिरीयोपनिषद् — ‘शिक्षा-वल्ली’, ‘ब्रह्मानन्द-वल्ली’, ‘भृगु-वल्ली’ — इन तीन वल्लियों में विभक्त — का systematic exposition। ‘सत्यं वद, धर्मं चर’ — शिक्षा-वल्ली का यह सूत्र शिक्षा-दीक्षा का foundational principle है। ब्रह्मानन्द-वल्ली का ‘पंच-कोश’ सिद्धान्त — अन्न-मय, प्राण-मय, मनो-मय, विज्ञान-मय, आनन्द-मय कोश — का scholarly विवेचन ग्रंथ का एक उल्लेखनीय अंश है।

बृहदारण्यक उपनिषद् — सर्वाधिक विशाल एवं philosophically rich उपनिषद् — का systematic exposition ग्रंथ का सर्वाधिक scholarly खण्ड है। याज्ञवल्क्य-गार्गी-संवाद, याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी-संवाद, ‘नेति नेति’ का scholarly सूत्र, ‘अहं ब्रह्मास्मि’ का महावाक्य, आत्म-तत्त्व का गहन विवेचन — यह सब विशेष रूप से प्रकाशमान है।

छान्दोग्य उपनिषद् का scholarly विवेचन भी अनुपम है। उद्दालक-श्वेतकेतु-संवाद, ‘तत्त्वमसि’ का महावाक्य, सत्यकाम-जाबाल-कथा, सनत्कुमार-नारद-संवाद, अग्नि-विद्या एवं अनेक उपासना-पद्धतियाँ — यह सब scholarly गहराई से विवेचित।

श्वेताश्वतर उपनिषद् — एकेश्वरवादी bhakti-perspective का सशक्त exposition — का scholarly विवेचन। ‘न तस्य प्रतिमा अस्ति’ — परमेश्वर का कोई प्रतिमा नहीं — यह सूत्र की civilisational महत्ता।

लेखक की interpretive दृष्टि sympathetic किन्तु scholarly है। उन्होंने अद्वैत-वेदान्त, विशिष्टाद्वैत, द्वैत — विभिन्न परम्पराओं की उपनिषद्-व्याख्याओं का comparative विवेचन प्रस्तुत किया है। आर्य समाज परम्परा का प्रभाव sympathetic है, किन्तु अन्य darshanic schools का सम्मान भी है।

ग्रंथ की भाषा scholarly हिन्दी-संस्कृत है। 520 पृष्ठीय यह विशाल ग्रंथ विषय की philosophical depth के अनुरूप एक comprehensive scope प्रस्तुत करता है।

वेदान्त-दर्शन के विद्यार्थियों, उपनिषदीय परम्परा के researchers, आध्यात्मिक जिज्ञासुओं, संस्कृत-वेद-शास्त्र के अध्येताओं, एवं प्रत्येक उस सुधी पाठक के लिए जो उपनिषदों के अमर सन्देश का scholarly किन्तु प्रांजल परिचय चाहता है — उपनिषद् प्रकाश एक मूल्यवान संसाधन है।

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