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Siddhant-Shatakam (Hindi–Sanskrit) – by Swami Tulsi Ram | Vedanta Hundred Verses

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सिद्धान्त-शतकम् (Siddhant-Shatakam), स्वामी तुलसी राम द्वारा रचित यह 64 पृष्ठीय Hindi-Sanskrit द्वि-भाषी काव्य-ग्रंथ, वैदिक-वेदान्तिक दर्शन के 100 (शत) foundational सिद्धान्तों का एक संक्षिप्त, स्मरणीय, तथा काव्यात्मक विवेचन प्रस्तुत करता है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति classical ‘शतक’ काव्य-genre (भर्तृहरि के नीति-शतक, वैराग्य-शतक जैसी परम्परा) में वैदिक दार्शनिक wisdom को concentrated रूप में प्रस्तुत करने वाली एक अनुपम रचना है।

‘शतक’ — 100 श्लोकों का एक classical काव्य-संग्रह — Sanskrit साहित्य की एक प्रतिष्ठित genre है, जिसमें एक central theme पर केन्द्रित संक्षिप्त, गहन, तथा स्मरणीय श्लोक होते हैं। स्वामी तुलसी राम ने इसी classical परम्परा का अनुसरण करते हुए, वैदिक-वेदान्तिक सिद्धान्तों को 100 श्लोकों में संक्षिप्त किया है।

ग्रंथ के श्लोक विभिन्न दार्शनिक विषयों को cover करते हैं — ईश्वर-तत्त्व (सच्चिदानन्द-स्वरूप, निराकारत्व, सर्वव्यापकत्व), आत्म-तत्त्व (नित्यता, साक्षी-चेतना), कर्म-सिद्धान्त (कर्म-फल-व्यवस्था, पुनर्जन्म), मोक्ष-स्वरूप (जन्म-मृत्यु-चक्र से मुक्ति), तथा dharmic जीवन-शैली (यम-नियम, सत्संग, स्वाध्याय)।

प्रत्येक श्लोक मूल Sanskrit में classical मीटर (अनुष्टुप् प्रमुखतः) में रचा गया है, साथ ही हिन्दी अनुवाद एवं संक्षिप्त व्याख्या के साथ।

**संक्षिप्तता की शक्ति** — स्वामी तुलसी राम की काव्य-रचना-शैली की एक विशेषता यह है कि प्रत्येक श्लोक एक complete, self-contained दार्शनिक विचार प्रस्तुत करता है, जो अकेले भी चिन्तन एवं ध्यान का विषय बन सकता है, तथा पूरे संग्रह के साथ एक integrated दार्शनिक vision भी प्रस्तुत करता है।

**Memorization-friendly संरचना** — शतक-genre की classical विशेषता — इसकी metrical brevity एवं rhythmic quality — इसे कण्ठस्थ करने तथा दैनिक स्मरण-चिन्तन के लिए ideal बनाती है, जो पारम्परिक गुरुकुलीय शिक्षा-पद्धति के अनुरूप है।

**आर्य समाज परम्परा का प्रतिबिम्ब** — ग्रंथ के सिद्धान्त वैदिक एकेश्वरवाद, कर्म-सिद्धान्त, तथा dharmic जीवन-शैली के आर्य समाज core-values को reflect करते हैं, जो इसे उस परम्परा के साधकों के लिए विशेष रूप से resonant बनाता है।

Hindi-Sanskrit द्वि-भाषी प्रस्तुति ग्रंथ को Sanskrit-ज्ञानी विद्वानों एवं हिन्दी-माध्यम पाठकों — दोनों के लिए सुलभ बनाती है।

64 पृष्ठीय compact आयाम इसे दैनिक स्वाध्याय एवं चिन्तन के लिए एक ideal, portable साथी बनाता है, जिसे साधक नियमित रूप से अपने साथ रख सकते हैं।

आध्यात्मिक जिज्ञासुओं, वेदान्त-दर्शन के विद्यार्थियों, Sanskrit काव्य-प्रेमियों, आर्य समाज के साधकों, दैनिक स्वाध्याय में रुचि रखने वाले पाठकों, तथा प्रत्येक उस सुधी पाठक के लिए जो वैदिक दार्शनिक सिद्धान्तों को एक संक्षिप्त, स्मरणीय, तथा काव्यात्मक रूप में आत्मसात् करना चाहता है — सिद्धान्त-शतकम् एक अनुपम एवं मूल्यवान संसाधन है।

स्वामी तुलसी राम ने ग्रंथ के अंत में यह भी सुझाव दिया है कि साधक प्रतिदिन एक अथवा दो श्लोकों का चिन्तन-मनन करें, ताकि पूरे शतक का गहन आत्मसातीकरण एक systematic, sustainable गति से हो सके, न कि जल्दबाजी में। यह practical daily-practice-recommendation ग्रंथ को केवल एक one-time-read text से आगे, एक दीर्घकालीन आध्यात्मिक साधना-साथी बनाता है, जो वर्षों तक साधक के दैनिक चिन्तन का अभिन्न अंग बना रह सकता है। यह क्रमिक, धैर्यपूर्ण दृष्टिकोण ही सच्चे आत्मिक रूपान्तरण का मार्ग है, जैसा स्वामीजी बार-बार रेखांकित करते हैं।

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