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Atma-Parichay (Hindi) – by Yudhishthir Mimansak | Vedanta Self-Study

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आत्म-परिचय, विख्यात् व्याकरणाचार्य पंडित युधिष्ठिर मीमांसक द्वारा रचित यह हिन्दी scholarly ग्रंथ, आत्म-तत्त्व की गहन दार्शनिक विवेचना एवं आत्मज्ञान की परम्परागत साधना-पद्धति का scholarly किन्तु आत्मीय exposition प्रस्तुत करता है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति, वेदान्त की सर्वोच्च questions — ‘अहं कोऽस्मि?’ (मैं कौन हूँ?) — का systematic scholarly investigation प्रस्तुत करती है।

पंडित युधिष्ठिर मीमांसक — ‘संस्कृत व्याकरण-शास्त्र का इतिहास’ के रचयिता — का यह ग्रंथ केवल grammatical scholarship का प्रकटीकरण नहीं, अपितु आध्यात्मिक anveshan का साक्षी है। एक ऐसे pandit की लेखनी से प्रसूत, जिनकी scholarship की गहराई एवं spiritual depth — दोनों समान रूप से renowned हैं।

ग्रंथ का प्रस्थान-बिन्दु मानव जीवन का सर्वाधिक fundamental प्रश्न है — ‘मैं कौन हूँ?’ अधिकांश लोग अपनी identity को नाम, शरीर, family, profession — इन externalities से जोड़ते हैं। किन्तु यह सब temporary एवं superficial identifications हैं। वास्तविक ‘मैं’ कौन है? इसी प्रश्न के scholarly pursue से यह ग्रंथ प्रारम्भ होता है।

लेखक ने ‘आत्म-अनात्म-विवेक’ का scholarly exposition प्रस्तुत किया है — वेदान्तिक साधना का प्रथम एवं foundational step। ‘नित्यानित्य-वस्तु-विवेक’ — शरीर temporary है, मन transient है, buddhi limited है — किन्तु ‘साक्षी’ — जो इन सबका observer है — वह nitya एवं imperishable है।

तैत्तिरीय उपनिषद् का ‘पंच-कोश’ सिद्धान्त — अन्न-मय, प्राण-मय, मनो-मय, विज्ञान-मय, आनन्द-मय कोश — का systematic विवेचन प्रस्तुत है। साधक को क्रमशः इन कोशों से ‘dis-identify’ करना होता है, एवं अंत में ‘आनन्द-मय’ कोश से भी परे स्वयं आत्मा को realize करना होता है।

‘नेति नेति’ — बृहदारण्यक उपनिषद् की यह scholarly methodology — कि आत्मा क्या नहीं है, यह via negativa approach कैसे आत्मा के positive स्वरूप को uncover करती है, इसका शास्त्रीय विवेचन है। छान्दोग्य उपनिषद् के ‘तत्त्वमसि’ महावाक्य का प्रामाणिक विवेचन भी प्रस्तुत है — आत्मा एवं ब्रह्म की मूल abhedता।

आत्मा के foundational लक्षणों का classical exposition — सत् (existence), चित् (consciousness), आनन्द (bliss); नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, स्वप्रकाश, असंग — यह सब आत्मा के attributes का scholarly विवेचन। जीव-भाव एवं आत्म-भाव का scholarly भेद भी विवेचित है — जीव limited experiential entity, आत्मा unlimited transcendent witness-consciousness।

जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति की त्रिविध अवस्थाएँ, एवं तुरीय — यह चतुर्थ state जो इन तीनों का underlying substratum है — यह सब आत्म-anveshan के essential दृष्टिकोणों से explored हैं।

आत्म-ज्ञान की practical methodology भी विवेचित है — श्रवण, मनन, निदिध्यासन — यह वेदान्तिक त्रिविध साधना-क्रम। गुरु-शिष्य-परम्परा का महत्त्व, self-inquiry (आत्म-विचार) का method, ध्यान-practice, स्वाध्याय का role — यह सब practical guidance।

लेखक की एक scholarly विशेषता — व्याकरणाचार्य के रूप में उनकी linguistic precision। हर philosophical term की etymological analysis, हर shastric quote का सम्यक् grammatical parsing — यह उनकी व्याकरणीय scholarship का natural extension है। आधुनिक गृहस्थ-साधक के लिए contemporary applications का विशेष emphasis भी है — career, relationships, family में authentic आत्म-anveshan कैसे integrate किया जाए।

वेदान्त के विद्यार्थियों, आध्यात्मिक जिज्ञासुओं, spiritual practitioners, आर्य समाज के साधकों, संन्यास-आश्रम के साधकों, philosophy students, एवं प्रत्येक उस सुधी पाठक के लिए जो ‘मैं कौन हूँ?’ के foundational प्रश्न का scholarly-yet-experiential exploration चाहता है — आत्म-परिचय एक trustworthy मार्गदर्शक है।

ग्रंथ के अंतिम अध्यायों में पंडित मीमांसक ने आधुनिक psychological approaches के साथ classical Vedantic understanding के बीच एक scholarly संवाद भी प्रस्तुत किया है, जिससे contemporary readers को यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन आत्म-अन्वेषण की पद्धतियाँ आज के mental-wellbeing discourse से किस प्रकार resonate करती हैं। यह comparative approach ग्रंथ को न केवल पारम्परिक वेदान्तिक विद्यार्थियों, अपितु आधुनिक mindfulness एवं self-awareness में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए भी सुलभ बनाती है। इसके अतिरिक्त, पंडित मीमांसक ने ग्रंथ में गुरु-शिष्य-संवाद की classical शैली में कुछ काल्पनिक किन्तु illustrative dialogues भी रचे हैं, जो जटिल वेदान्तिक अवधारणाओं को सरल संवाद-रूप में प्रस्तुत करते हैं। यह literary technique ग्रंथ को केवल शुष्क philosophical treatise से आगे, एक engaging एवं accessible spiritual guide बनाती है, जो पाठक को स्वयं इन प्रश्नों के साथ संलग्न होने के लिए प्रेरित करती है।

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