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Janm-Jeevan-Mrityu (Hindi) – by Swami Vidyanand Saraswati | Vedic Birth Life Death Philosophy

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जन्म-जीवन-मृत्यु (Janm-Jeevan-Mrityu), स्वामी विद्यानन्द सरस्वती द्वारा रचित यह 87 पृष्ठीय हिन्दी ग्रंथ, मानव-अस्तित्व के तीन fundamental चरणों — जन्म, जीवन, एवं मृत्यु — का वैदिक दार्शनिक दृष्टिकोण से एक scholarly किन्तु गहन आध्यात्मिक विवेचन प्रस्तुत करता है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति मानव-जीवन के सर्वाधिक profound existential प्रश्नों को वैदिक ज्ञान के आलोक में explore करती है।

‘जन्म-जीवन-मृत्यु’ — यह त्रिविध cycle प्रत्येक मानव के अस्तित्व का सर्वाधिक निश्चित एवं universal अनुभव है, फिर भी इसकी गहराई शायद ही कभी पूर्णतया समझी जाती है। स्वामी विद्यानन्द सरस्वती ने वैदिक एवं वेदान्तिक दृष्टिकोण से इन तीनों अवस्थाओं का scholarly विवेचन प्रस्तुत किया है।

ग्रंथ का प्रथम खण्ड ‘जन्म’ के दार्शनिक स्वरूप पर केन्द्रित है। जन्म क्या है — केवल शारीरिक घटना, अथवा आत्मा की एक नई यात्रा का आरम्भ? वैदिक पुनर्जन्म-सिद्धान्त का scholarly विवेचन — कैसे आत्मा पूर्व-कर्मों के अनुसार एक नए शरीर में प्रवेश करती है, यह कर्म-सिद्धान्त के साथ integrated framework में समझाया गया है।

‘जीवन’ — मध्यवर्ती एवं सबसे विस्तृत खण्ड — जीवन के purposeful jeena की वैदिक दृष्टि प्रस्तुत करता है। चतुर्विध पुरुषार्थ — धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष — का framework; चतुर्विध आश्रम-व्यवस्था — ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास — जीवन के विभिन्न चरणों की dharmic responsibilities। यह जीवन को एक अराजक श्रृंखला के रूप में नहीं, अपितु एक systematic, meaningful यात्रा के रूप में प्रस्तुत करता है।

जीवन के व्यावहारिक आयामों पर भी scholarly विचार है — कैसे स्वास्थ्य बनाए रखें, कैसे नैतिक आचरण अपनाएँ, कैसे सामाजिक जिम्मेदारियाँ निभाएँ, कैसे आध्यात्मिक साधना को दैनिक जीवन में integrate करें — यह practical wisdom ग्रंथ का एक मूल्यवान अंश है।

‘मृत्यु’ — तृतीय एवं दार्शनिक रूप से सर्वाधिक गहन खण्ड — मृत्यु के भय एवं रहस्य को वैदिक ज्ञान के आलोक में सम्बोधित करता है। ‘न जायते म्रियते वा कदाचित्’ (गीता 2.20) — आत्मा न जन्म लेती है न मरती है — यह foundational सूत्र इस खण्ड का दार्शनिक आधार है। मृत्यु केवल शरीर का त्याग है, आत्मा का अंत नहीं — यह समझ मृत्यु-भय को कम करने में सहायक है।

अन्त्येष्टि-संस्कार का scholarly एवं आध्यात्मिक महत्त्व भी विवेचित है — कैसे उचित रीति से किया गया अन्त्येष्टि-कर्म मृत आत्मा एवं शोकाकुल परिवार दोनों के लिए dharmic रूप से सहायक है।

मोक्ष — जन्म-मृत्यु-चक्र से अंतिम मुक्ति — का दार्शनिक विवेचन ग्रंथ का climactic अंश है। कैसे निरन्तर आध्यात्मिक साधना, ज्ञान, एवं dharmic जीवन-शैली अंततः इस चक्र से मुक्ति की ओर ले जाती है।

लेखक की भाषा गहन किन्तु सुलभ हिन्दी है, जो existential प्रश्नों को बिना भयाक्रान्त किए, एक शान्त एवं आश्वस्तिदायक scholarly दृष्टिकोण से सम्बोधित करती है। 87 पृष्ठीय compact आयाम इसे एक focused किन्तु comprehensive treatise बनाता है।

आध्यात्मिक जिज्ञासुओं, मृत्यु-भय से जूझ रहे पाठकों, वैदिक दर्शन के विद्यार्थियों, वृद्धजनों जो जीवन के अंतिम चरण के बारे में सोच रहे हैं, शोक-संतप्त परिवारों, तथा प्रत्येक उस सुधी पाठक के लिए जो जीवन के तीन महानतम रहस्यों को वैदिक ज्ञान के आलोक में समझना चाहता है — जन्म-जीवन-मृत्यु एक शान्तिप्रद एवं ज्ञानवर्धक scholarly संसाधन है।

ग्रंथ के अंतिम अध्याय में स्वामी विद्यानन्द सरस्वती ने कुछ practical अभ्यास भी सुझाए हैं, जो पाठक को मृत्यु-चिन्तन (memento mori) के माध्यम से जीवन को अधिक सजगता एवं कृतज्ञता के साथ जीने में सहायक हैं। यह contemplative practice पश्चिमी stoic परम्परा के ‘memento mori’ concept से भी resonate करती है, जिससे ग्रंथ को cross-cultural philosophical relevance भी प्राप्त होती है। अंततः लेखक यह स्थापित करते हैं कि मृत्यु का सजग स्मरण जीवन को अधिक meaningful एवं purposeful बनाने का एक शक्तिशाली उपकरण है। यह गहन किन्तु सुलभ विवेचन प्रत्येक आयु-वर्ग के पाठकों के लिए समान रूप से प्रासंगिक एवं सान्त्वनादायक सिद्ध होता है।

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