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Yog Asano Ke Chamatkar (Hindi) – by Shripad Damodar Satvalekar | Yoga Asanas & Pranayama

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योग आसनों के चमत्कार (Yog Asano Ke Chamatkar), विख्यात् वैदिक scholar एवं योग-साधक श्री पद्म दामोदर सातवलेकर द्वारा रचित यह 344 पृष्ठीय हिन्दी ग्रंथ, योगासनों की चमत्कारिक स्वास्थ्य-शक्ति एवं उनकी आध्यात्मिक उपयोगिता का एक scholarly किन्तु व्यावहारिक संकलन है। अमर स्वामी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह कृति योग-विद्या के एक अनुपम संरक्षक की लेखनी से प्रसूत है, जिनका जीवन भारतीय शास्त्रीय परम्पराओं — विशेषतः वेद, संस्कृत एवं योग — के पुनर्जागरण के लिए समर्पित था।

श्री पद्म दामोदर सातवलेकर (1867-1968) — स्वाध्याय मण्डल (पारडी, गुजरात) के संस्थापक — एक civilisational व्यक्तित्व थे, जिनकी विद्वत्ता वेदाध्ययन के साथ-साथ योग-शास्त्र में भी गहरी थी। उनकी एक विशेषता थी — शास्त्र-निष्ठा एवं व्यावहारिक उपयोगिता का scholarly संतुलन। यह ग्रंथ इसी संतुलन का एक उत्कृष्ट उदाहरण है — जहाँ पारम्परिक योग-शास्त्र की authenticity को बनाए रखते हुए आधुनिक गृहस्थ-साधक के लिए practical guidance प्रस्तुत है।

ग्रंथ का प्रथम खण्ड योग-शास्त्र की आधारभूत जानकारी प्रदान करता है। योग का अर्थ क्या है? पतंजलि के अष्टांग योग का परिचय, हठयोग एवं राजयोग का अन्तर, आसनों का योग में स्थान, आसन-साधना के पूर्व की तैयारी — इन सब विषयों पर शास्त्र-सम्मत किन्तु सरल विवेचन है। ‘स्थिर सुखमासनम्’ (पतंजलि योगसूत्र 2.46) — यह आसन की मूल परिभाषा है, जिस पर लेखक ने scholarly विचार प्रस्तुत किया है।

मुख्य खण्ड में लगभग 50 से 70 प्रमुख योगासनों का systematic विवेचन है। प्रत्येक आसन के लिए — संस्कृत नाम, हिन्दी समान-नाम, English equivalent जहाँ उपलब्ध हो, करने की विधि (step-by-step), समय एवं अवधि, श्वास-समन्वय (pranayama coordination), विशेष लाभ, सावधानियाँ, contraindications (किन्हें यह आसन नहीं करना चाहिए), तथा रोग-विशिष्ट उपयोगिता — यह comprehensive structure ग्रंथ को एक practical योग-कोश बनाती है।

प्रमुख आसनों के अध्याय इस प्रकार वर्गीकृत हैं — ध्यानात्मक आसन (पद्मासन, सिद्धासन, स्वस्तिकासन, सुखासन, वज्रासन); पीछे झुकने वाले आसन (भुजंगासन, धनुरासन, उष्ट्रासन, मत्स्यासन); आगे झुकने वाले आसन (पश्चिमोत्तानासन, हस्तपादासन, जानुशीर्षासन); उल्टे आसन (शीर्षासन, सर्वांगासन, हलासन); twisting आसन (अर्धमत्स्येन्द्रासन, वक्रासन); संतुलन आसन (वृक्षासन, मयूरासन, बकासन, गरुडासन); विश्राम आसन (शवासन, मकरासन)। प्रत्येक वर्ग के आसनों की systematic प्रस्तुति।

विशेष रूप से उल्लेखनीय ‘चमत्कार’ का तत्त्व ग्रंथ में सर्वत्र दृष्टिगोचर होता है। ये चमत्कार किसी अलौकिक सिद्धि के नहीं — अपितु वैज्ञानिक रूप से सिद्ध होने वाले स्वास्थ्य-लाभ के हैं। मधुमेह में मण्डूकासन, हृदय-रोग में शवासन, उच्च रक्तचाप में अनुलोम-विलोम, अनिद्रा में शीर्षासन एवं ब्रह्मरी, थायरॉइड में सर्वांगासन एवं हलासन, पीठ-दर्द में मकरासन एवं भुजंगासन, मोटापा में सूर्य-नमस्कार एवं कपालभाति — इन सबका scholarly किन्तु व्यावहारिक मार्गदर्शन है।

सूर्य-नमस्कार पर एक विशेष विस्तृत अध्याय है। 12 चरणों की पारम्परिक सूर्य-नमस्कार-विधि, प्रत्येक चरण का संस्कृत मन्त्र, श्वास-समन्वय, समस्त शरीर पर इसका प्रभाव — यह सम्पूर्ण विवेचन सूर्य-नमस्कार को ‘योग का सम्पूर्ण व्यायाम’ सिद्ध करता है।

स्त्री-स्वास्थ्य का अध्याय भी मूल्यवान है। मासिक धर्म, गर्भावस्था, प्रसूति-काल, रजोनिवृत्ति — इन विभिन्न जीवन-चरणों में कौन से आसन उपयुक्त हैं, कौन से वर्जित — इसका सावधानीपूर्ण मार्गदर्शन। बाल-स्वास्थ्य के लिए भी अलग अनुभाग है।

प्राणायाम के अध्याय आसनों के पूरक के रूप में आते हैं। नाड़ी-शोधन (अनुलोम-विलोम), उज्जायी, भ्रामरी, कपालभाति, भस्त्रिका, शीतली, सीत्कारी — इन प्रमुख प्राणायामों की scholarly व्याख्या एवं व्यावहारिक practice-मार्गदर्शन है। प्रत्येक प्राणायाम के लाभ, कौन-सा कब करें, मात्रा, सावधानियाँ — सब विवेचित।

बन्ध एवं मुद्रा का संक्षिप्त परिचय भी ग्रंथ में है — मूलबन्ध, उद्डियानबन्ध, जालन्धरबन्ध, महामुद्रा, अश्विनी मुद्रा। ये उन्नत साधना के अंग हैं, जिनका विवरण सावधानीपूर्ण है।

ग्रंथ का एक scholarly आयाम यह भी है कि लेखक ने आसनों के पीछे की anatomical एवं physiological व्याख्या भी प्रस्तुत की है। कौन-सा आसन कौन-से अंग पर प्रभाव डालता है, कौन-सी ग्रन्थियाँ activate होती हैं, blood circulation कैसे प्रभावित होती है — यह scientific perspective ग्रंथ को आधुनिक पाठक के लिए अधिक accessible बनाता है।

आहार-विहार एवं जीवन-शैली पर भी एक खण्ड है। योग-साधना के साथ कैसा आहार उपयुक्त है, दैनिक दिनचर्या कैसी हो, साधना के लिए उपयुक्त समय एवं स्थान — इन सब practical विषयों पर मार्गदर्शन है।

विशेष रोगों के लिए अलग chapters हैं — मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय-रोग, अस्थमा, आर्थराइटिस, मोटापा, मानसिक तनाव, अवसाद, अनिद्रा। प्रत्येक रोग के लिए suggested आसन-prograam, प्राणायाम, पथ्य-अपथ्य — यह सब प्रस्तुत है।

लेखक की भाषा प्रांजल हिन्दी है, जिसमें संस्कृत योग-शब्दावली का सटीक प्रयोग है। पारम्परिक shastric उद्धरण — पतंजलि योगसूत्र, हठयोग प्रदीपिका, घेरण्ड संहिता, गोरक्ष शतक — का सम्यक् सन्दर्भ है।

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