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Vidur Neeti (Hindi–Sanskrit) – by Swami Jagdeeshwaranand Saraswati | Mahabharata Niti Shastra

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विदुर नीति (Vidur Neeti), विद्वान् स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती द्वारा सम्पादित-व्याख्यात यह 223 पृष्ठीय हिन्दी-संस्कृत ग्रंथ, महाभारत के उद्योग-पर्व में निहित विदुर-नीति के अमर सूत्रों का scholarly संकलन एवं विवेचन है। गोविन्द राम हसानन्द द्वारा प्रकाशित यह कृति महात्मा विदुर — महाभारत के सर्वाधिक प्रज्ञ एवं dharmic चरित्रों में से एक — के जीवन-दर्शन एवं नीति-शास्त्रीय wisdom का प्रामाणिक प्रस्तुतीकरण है।

महात्मा विदुर — कुरुवंशी राज्य-सभा के प्रधान-मंत्री एवं धर्म-पालक — महाभारत के एक अनुपम चरित्र हैं। ब्राह्मण ऋषि व्यास से रानी पाराशरी की दासी से जन्में, अपनी जन्म-स्थिति की limitations के बावजूद, अपनी विद्वत्ता, dharmic-निष्ठा एवं scholarly गुणों के कारण कुरु-राज्य के सर्वोच्च परामर्शदाता बने। पारम्परिक मान्यता के अनुसार वे यम-धर्म के अवतार थे, जिनका जन्म एक ऋषि-शाप के परिणाम-स्वरूप मानव-रूप में हुआ था।

‘विदुर नीति’ महाभारत के उद्योग-पर्व (अध्याय 33-40) में निहित आठ-अध्यायों का संग्रह है, जहाँ राजा धृतराष्ट्र अपने प्रिय सलाहकार विदुर से political-ethical-philosophical परामर्श प्राप्त करते हैं। यह संवाद युद्ध-काल के निर्णायक क्षणों में हुआ — जब पाण्डवों एवं कौरवों के बीच कुरुक्षेत्र-युद्ध अनिवार्य प्रतीत हो रहा था। धृतराष्ट्र की अनिद्रा एवं चिन्ता को शान्त करने हेतु विदुर ने जो scholarly सूत्र प्रस्तुत किए, वही ‘विदुर नीति’ है।

स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती ने अपने scholarly सम्पादन में मूल संस्कृत श्लोकों का प्रामाणिक प्रस्तुतीकरण, devanagari में मुद्रण, प्रत्येक श्लोक का पद-च्छेद, हिन्दी अनुवाद, एवं scholarly व्याख्या — यह त्रिविध संरचना अपनाई है। यह संरचना ग्रंथ को संस्कृत-ज्ञानी एवं हिन्दी-माध्यम पाठक — दोनों के लिए सुलभ बनाती है।

प्रथम अध्याय में विदुर ने ‘जागृति’ एवं ‘निद्रा’ के दार्शनिक अर्थ पर विचार प्रस्तुत किए हैं। ‘अयम् लोकः परो लोको लोको लोकश्च त्वयोः’ — कौन-सा व्यक्ति सच्चा ‘जागृत’ है? वह जो अपने धर्म-कर्तव्यों के प्रति सतर्क है, जो विवेक-वान है, जो धर्म-संगत निर्णय लेने में समर्थ है। ‘चिन्ता-कुल’ व्यक्ति को कैसे शान्ति प्राप्त हो — इसका scholarly समाधान।

प्रज्ञ-पुरुष के लक्षण विदुर-नीति का scholarly केन्द्र है। ‘क्षमा-वान् मित्रवान् दानी ऋज्ज्व-वाक् अनसूयकः’ — क्षमावान्, मित्रवान्, दानी, सरल-वाक्, ईर्ष्या-रहित — यह विदुर-निर्दिष्ट प्रज्ञ-पुरुष के लक्षण हैं। प्रत्येक लक्षण का scholarly विवेचन ग्रंथ में उपलब्ध है।

मूर्ख-पुरुष की पहचान भी विदुर ने की है। जो व्यक्ति बिना तर्क के बोलता है, क्रोधी है, अहंकारी है, दूसरों का अनादर करता है, धर्म-विरुद्ध आचरण करता है — वह मूर्ख है। ‘मूर्खाणां पण्डितमानिता’ — स्वयं को पंडित मानने वाले मूर्ख — का तीक्ष्ण विवेचन है।

राजनीति-शास्त्र के सूत्र विदुर-नीति का सर्वाधिक प्रतिष्ठित खण्ड हैं। राजा के आचरण-नियम, मंत्रियों की चयन-पद्धति, कोष-नीति, सेना-संगठन, राज्य-संरक्षण, सन्धि-विग्रह की नीति — यह सब scholarly तरीके से प्रस्तुत है। ‘सर्वारंभे च मध्यस्थः’ — राजा को सर्व-कार्यों में मध्यस्थ रहना चाहिए; ‘धर्मेण राज्यम् अनुपालयेत्’ — धर्म से राज्य-पालन।

दान, धर्म एवं तप का scholarly विवेचन ग्रंथ में है। दान का सम्यक् स्वरूप, उत्तम-मध्यम-कनिष्ठ-दान का भेद, धर्म-संगत आचरण के मानदण्ड, तप का foundational principle — यह सब classical परम्परा के अनुरूप विवेचित है।

वाणी की मर्यादा एवं संयम पर भी विशेष विचार है। ‘वाक्संयमो हि दुष्करो विदुषामिति श्रुतिः’ — विद्वानों के लिए भी वाक्-संयम कठिन है। सत्य-वचन, प्रिय-वचन, हित-वचन — इन तीनों के संगम का महत्त्व; मधुर वाणी का व्यावहारिक प्रभाव — यह सब विशेष रूप से प्रकाशमान है।

मित्रता, शत्रुता एवं सामाजिक संबंधों के सूत्र अनुपम हैं। सच्चे मित्र की पहचान, पक्षी-मित्र (बहिर्मुख) एवं दीपक-मित्र (अंतर्मुख) का भेद, शत्रु-निवारण की नीति, सामाजिक संगठन के foundational principles — यह सब practical wisdom है।

व्यापार-नीति एवं अर्थ-शास्त्र के सूत्र भी मूल्यवान हैं। धन-अर्जन के योग्य मार्ग, बचत का महत्त्व, ऋण-व्यवहार के नियम, व्यवसाय में नीति, दान का सम्यक् स्वरूप — यह सब practical financial wisdom है।

विदुर के सूत्र की एक विशेषता है उनकी universal-applicability। वे केवल राजा के लिए नहीं, अपितु प्रत्येक civic-conscious व्यक्ति के लिए relevant हैं। आधुनिक काल में corporate leadership, civil services, public administration, family management — सभी क्षेत्रों में विदुर-नीति का application सम्भव है।

स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती की scholarly व्याख्याएँ ग्रंथ को contemporary-relevant बनाती हैं। उन्होंने प्रत्येक सूत्र के पीछे का philosophical context, उसकी historical applicability, उसका आधुनिक-काल में significance — यह सब evidence-आधारित तरीके से प्रस्तुत किया है।

ग्रंथ की भाषा प्रांजल हिन्दी है। 223 पृष्ठीय compact आकार ग्रंथ को दैनिक स्वाध्याय हेतु सुगम बनाता है।

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