Srimadbhagavadgita Bhashyam (Hindi–Sanskrit) – by Pandit Tulsiram | Arya Samaj Gita Commentary

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श्रीमद्भगवद्गीता भाष्यम् (Sri Madbhagwadgeeta Bhashyam), विद्वान् पंडित तुलसीराम द्वारा रचित यह 160 पृष्ठीय हिन्दी-संस्कृत ग्रंथ, गीता के अद्वितीय आध्यात्मिक-दार्शनिक ज्ञान का एक scholarly किन्तु प्रांजल भाष्य प्रस्तुत करता है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति श्रीमद्भगवद्गीता के मूल श्लोकों को आर्य समाज परम्परा एवं वैदिक दृष्टिकोण के आलोक में व्याख्यायित करती है।
श्रीमद्भगवद्गीता — महाभारत के भीष्म-पर्व में निहित अर्जुन एवं भगवान् श्रीकृष्ण के बीच का वह अमर संवाद — मानव सभ्यता का सर्वाधिक प्रतिष्ठित आध्यात्मिक ग्रंथ है। 18 अध्यायों एवं लगभग 700 श्लोकों में यह कर्म-योग, ज्ञान-योग, भक्ति-योग एवं ध्यान-योग — चतुर्विध मार्गों का scholarly किन्तु practical प्रस्तुतीकरण है। ‘सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः’ — समस्त उपनिषदों के सार-तत्त्व का दोहन कर श्रीकृष्ण ने जो दिव्य ज्ञान-दुग्ध प्रदान किया, वही गीता है।
पंडित तुलसीराम का भाष्य एक scholarly किन्तु sympathetic कार्य है। उन्होंने मूल श्लोकों का प्रामाणिक संस्कृत पाठ, devanagari में मुद्रण, प्रत्येक श्लोक का पद-च्छेद एवं अन्वय, सरल हिन्दी अनुवाद, तथा scholarly व्याख्या — यह पंचविध प्रस्तुति-संरचना अपनाई है। यह संरचना ग्रंथ को संस्कृत-ज्ञानी विद्वान् एवं हिन्दी-माध्यम पाठक — दोनों के लिए सुलभ बनाती है।
प्रथम अध्याय ‘अर्जुन-विषाद-योग’ के भाष्य में लेखक ने युद्ध-भूमि पर अर्जुन की मनोवैज्ञानिक स्थिति का scholarly विवेचन प्रस्तुत किया है। यह ‘विषाद’ केवल कायरता नहीं — यह एक ethical dilemma है, जो प्रत्येक विवेकशील व्यक्ति के जीवन में किसी-न-किसी रूप में आता है। अर्जुन का यह विषाद ही उसे श्रीकृष्ण के दिव्य उपदेश का पात्र बनाता है।
द्वितीय अध्याय ‘सांख्य-योग’ का भाष्य ग्रंथ का दार्शनिक केन्द्र है। आत्मा की अमरता का सिद्धान्त, शरीर एवं आत्मा का भेद, स्वधर्म का महत्त्व, स्थित-प्रज्ञ के लक्षण — इन सब विषयों का scholarly विवेचन है। ‘न जायते म्रियते वा कदाचित्’ — आत्मा का स्वरूप-निरूपण; ‘सुख-दुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ’ — समत्व-योग; ‘योगस्थः कुरु कर्माणि’ — कर्म-योग की मूल भूमि; ‘प्रजहाति यदा कामान्’ — स्थित-प्रज्ञ के लक्षण — यह सब एक integrated philosophical system निर्मित करते हैं।
कर्म-योग का सिद्धान्त (अध्याय 3-5) का भाष्य व्यावहारिक रूप से अत्यन्त मूल्यवान है। ‘न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्’ — अकर्मण्यता असम्भव है; ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ — कर्म पर अधिकार, फल पर नहीं; ‘समत्वं योग उच्यते’ — समत्व ही योग है; ‘योगः कर्मसु कौशलम्’ — कुशलता ही योग है। पंडित तुलसीरामजी ने इन सूत्रों की scholarly व्याख्या के साथ-साथ आधुनिक जीवन में उनकी practical applicability पर भी विचार प्रस्तुत किया है।
ध्यान-योग एवं अष्टांग-योग का अध्याय (षष्ठ अध्याय) का भाष्य पतंजलि के योग-दर्शन के साथ scholarly संगति में है। आहार-निद्रा का संयम, मन की एकाग्रता, ध्यान की systematic methodology, समाधि का स्वरूप — इन सब विषयों पर authentic विवेचन है।
ज्ञान-योग एवं ब्रह्म-तत्त्व-निरूपण (अध्याय 7-12) में लेखक ने श्रीकृष्ण के ‘अहं’ को scholarly तरीके से समझाया है। यह ‘अहं’ किसी individual personality का अहंकार नहीं — यह वैदिक ‘एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति’ का सार्वभौम ‘अहं’ है। ‘समोऽहं सर्वभूतेषु’ — सर्व-व्यापकता; ‘मय्यासक्तमनाः पार्थ’ — समर्पण-भक्ति; ‘मन्मना भव मद्भक्तो’ — पूर्ण भक्ति-तत्त्व — इन सबका dharmic विवेचन है।
विश्वरूप-दर्शन (एकादश अध्याय) का भाष्य अत्यन्त inspirational है। श्रीकृष्ण के विराट् रूप का अर्जुन को दर्शन — यह केवल mythological वर्णन नहीं, अपितु ब्रह्म-तत्त्व की cosmic vision है। पंडितजी ने इस अध्याय की scholarly गहराई एवं poetic sublime — दोनों को संरक्षित किया है।
अंतिम षट्क (अध्याय 13-18) में क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-भेद, त्रिगुण-विवेचन, पुरुषोत्तम-योग, दैवी-आसुरी-संपद्-विभाग, श्रद्धा-त्रय-विभाग, मोक्ष-संन्यास-योग — इन गहन दार्शनिक विषयों का scholarly विवेचन है। ‘सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज’ — चरम सूत्र की sympathetic व्याख्या ग्रंथ के समापन का सर्वोच्च बिन्दु है।
आर्य समाज परम्परा से प्रभावित होते हुए भी, लेखक ने अन्य भाष्यकारों — शंकराचार्य, रामानुज, मध्व, ज्ञानेश्वर, श्री अरविन्द — के मतों का सम्मानपूर्वक उल्लेख किया है। यह scholarly evenhandedness ग्रंथ की एक विशेषता है।
लेखक की भाषा scholarly हिन्दी है, जिसमें संस्कृत shastric शब्दावली का सटीक प्रयोग है। 160 पृष्ठीय compact आकार ग्रंथ को दैनिक स्वाध्याय हेतु सुगम बनाता है।
गीता-साधकों, वेदान्त-विद्यार्थियों, आर्य समाज के साधकों, संस्कृत के अध्येताओं, आध्यात्मिक जिज्ञासुओं, एवं प्रत्येक उस सुधी पाठक के लिए जो श्रीमद्भगवद्गीता के अमर सन्देश का scholarly किन्तु प्रांजल परिचय चाहता है — यह भाष्य एक मूल्यवान संसाधन है।
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