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Satyarth-Bhaskar Part 1 & 2 (Hindi) – by Pt. Yudhishthir Mimansak | Satyarth Prakash Commentary

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सत्यार्थ-भास्कर (भाग 1 और 2) — Satyarth-Bhaskar, पंडित युधिष्ठिर मीमांसक द्वारा रचित यह विशाल 1901 पृष्ठीय हिन्दी scholarly ग्रंथ-समुच्चय, महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती की magnum opus ‘सत्यार्थ प्रकाश’ का एक comprehensive, अत्यंत विस्तृत scholarly व्याख्या-भाष्य प्रस्तुत करता है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह monumental कृति आर्य समाज साहित्य की सर्वाधिक विशाल एवं comprehensive commentary-works में से एक है।

**’सत्यार्थ-भास्कर’** — ‘सत्यार्थ’ (सत्य + प्रकाश) + ‘भास्कर’ (सूर्य, illuminator) — यह शीर्षक इंगित करता है कि यह ग्रंथ महर्षि की मूल कृति को सूर्य के समान प्रकाशित करने वाली — अर्थात् उसकी गहन एवं विस्तृत scholarly explanation प्रस्तुत करने वाली — कृति है।

**’सत्यार्थ प्रकाश’** — महर्षि दयानन्द की सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं प्रभावशाली कृति — 14 समुल्लासों में विभक्त, आर्य समाज के dharmic-philosophical-social सिद्धान्तों का एक comprehensive manifesto है। यद्यपि यह कृति स्वयं में सुव्यवस्थित एवं systematic है, इसकी सघन शैली, अनेक historical-cultural references, तथा 19वीं शताब्दी के specific context के कारण, आधुनिक पाठकों के लिए इसका पूर्ण अर्थ समझने हेतु एक detailed scholarly commentary की आवश्यकता महसूस की गई।

पंडित युधिष्ठिर मीमांसक ने अपने इस 2-भागीय विशाल भाष्य में सत्यार्थ प्रकाश के प्रत्येक समुल्लास का line-by-line, अत्यंत विस्तृत scholarly विवेचन प्रस्तुत किया है — प्रत्येक कथन का shastric आधार, historical context, तथा contemporary relevance को elaborate करते हुए।

**प्रथम भाग** में समुल्लास 1-8 का विस्तृत विवेचन है — ईश्वर-स्तवन एवं उपासना-पद्धति (समुल्लास 1-2), शिक्षा-पद्धति एवं गुरुकुल-व्यवस्था (समुल्लास 3), विवाह-व्यवस्था एवं गृहस्थ-धर्म (समुल्लास 4), वानप्रस्थ-संन्यास (समुल्लास 5), राज-धर्म एवं शासन-व्यवस्था (समुल्लास 6), वेद-विषय (समुल्लास 7), तथा सृष्टि-विषय (समुल्लास 8)।

**द्वितीय भाग** में समुल्लास 9-14 का विस्तृत विवेचन है — यह ग्रंथ के सर्वाधिक polemical अंश हैं, जहाँ महर्षि ने विभिन्न पारम्परिक हिन्दू सम्प्रदायों (समुल्लास 9-11), जैन-बौद्ध (समुल्लास 12), तथा ईसाई-इस्लाम (समुल्लास 13-14) की मान्यताओं की scholarly समीक्षा प्रस्तुत की है।

पंडित मीमांसक की scholarly methodology प्रत्येक controversial अथवा complex कथन के लिए extensive contextual explanation प्रदान करती है — क्यों महर्षि ने यह specific आलोचना की, इसका ऐतिहासिक-सांस्कृतिक context क्या था, तथा आज के pluralistic संदर्भ में इसकी क्या प्रासंगिकता अथवा limitations हैं।

**Balanced scholarly approach** — यद्यपि यह भाष्य महर्षि के प्रति गहन श्रद्धा से प्रेरित है, पंडित मीमांसक ने कहीं-कहीं scholarly objectivity भी बनाए रखी है, जहाँ आवश्यक हो कुछ कथनों के historical-contextual limitations को भी acknowledge किया है।

**अतिरिक्त shastric evidence** का व्यापक उपयोग ग्रंथ की एक विशेषता है — महर्षि के प्रत्येक तर्क को अतिरिक्त वेद-उपनिषद्-उद्धरणों, तथा classical Sanskrit texts से समर्थित किया गया है, जो मूल सत्यार्थ प्रकाश की तुलना में एक अधिक comprehensive shastric foundation प्रस्तुत करता है।

1901 पृष्ठीय अत्यंत विशाल आयाम, 2-भागीय संरचना — यह ग्रंथ-समुच्चय सत्यार्थ प्रकाश के comprehensive scholarly अध्ययन के लिए सर्वाधिक authoritative एवं detailed संसाधन है, जो आर्य समाज साहित्य में एक central reference-work का दर्जा रखता है।

आर्य समाज के साधकों, सत्यार्थ प्रकाश के गम्भीर अध्येताओं, comparative religion के researchers, आधुनिक भारतीय धार्मिक इतिहास के विद्यार्थियों, तथा प्रत्येक उस serious जिज्ञासु के लिए जो महर्षि दयानन्द की magnum opus को उसकी सम्पूर्ण गहराई एवं विस्तार में समझना चाहता है — सत्यार्थ-भास्कर (2 भाग) एक indispensable ultimate scholarly संसाधन है।

पंडित मीमांसक ने ग्रंथ के अंत में एक comprehensive cross-reference-index भी प्रदान की है, जो सत्यार्थ प्रकाश के प्रत्येक विषय को उसके सम्बन्धित वेद-मन्त्रों, उपनिषद्-वाक्यों, तथा अन्य shastric sources से जोड़ती है। यह scholarly apparatus researchers के लिए अत्यंत मूल्यवान है, जो महर्षि के तर्कों के पूर्ण shastric आधार को समझना चाहते हैं।

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