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Manavta Ki Aur (Hindi) – by Shanti Devi Arya | Universal Human Values

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मानवता की ओर (Manavta Ki Aur), विदुषी शान्ति देवी आर्य द्वारा रचित यह 112 पृष्ठीय हिन्दी ग्रंथ, वैदिक जीवन-दर्शन के आधार पर एक सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों की ओर उन्मुख जीवन-शैली का scholarly किन्तु आत्मीय विवेचन प्रस्तुत करता है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति वैदिक ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की civilisational दृष्टि को आधुनिक सन्दर्भ में एक व्यावहारिक जीवन-मार्गदर्शिका के रूप में प्रस्तुत करती है।

‘मानवता की ओर’ — यह शीर्षक स्वयं एक directional aspiration को इंगित करता है — मानव-जीवन का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत उन्नति नहीं, अपितु सम्पूर्ण मानवता के कल्याण की दिशा में निरन्तर अग्रसर होना है। शान्ति देवी आर्य ने इसी वैदिक civilisational vision को अपने ग्रंथ का central theme बनाया है।

ग्रंथ का प्रथम खण्ड ‘मानवता’ के vedic-philosophical foundations का विवेचन प्रस्तुत करता है — ‘अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्, उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्’ — यह अपना-पराया की संकीर्ण गणना लघु-चित्त लोगों की है, उदार-हृदय व्यक्तियों के लिए समस्त धरा एक परिवार है — यह सूत्र ग्रंथ का दार्शनिक आधार है।

सार्वभौम मानवीय मूल्यों — करुणा, सत्य, अहिंसा, न्याय, समानता — का scholarly विवेचन ग्रंथ का central content है, तथा कैसे यह values वैदिक धर्म-सिद्धान्त से organically emerge होते हैं।

**जातिगत एवं सामाजिक भेदभाव का विरोध** — लेखिका ने वैदिक वर्ण-व्यवस्था के मूल कर्म-गुण-आधारित सिद्धान्त को रेखांकित करते हुए, जन्म-आधारित जातिगत भेदभाव की scholarly समीक्षा प्रस्तुत की है, जो आर्य समाज के core reformist agenda के अनुरूप है।

**स्त्री-पुरुष-समानता** पर भी विशेष बल है — वैदिक काल में स्त्रियों की गरिमामय स्थिति, गार्गी-मैत्रेयी जैसी विदुषी स्त्रियों के उदाहरण, तथा आधुनिक काल में स्त्री-सशक्तिकरण के लिए वैदिक आधार।

**सामाजिक सेवा एवं करुणा** — कैसे व्यक्तिगत आध्यात्मिक साधना को सामाजिक सेवा-कार्य के साथ integrate किया जाए, यह practical guidance ग्रंथ का एक मूल्यवान अंश है।

**अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सद्भाव** — वैदिक ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के आदर्श को आधुनिक global context में कैसे लागू किया जाए, इस पर scholarly किन्तु प्रेरणादायक विचार।

**पर्यावरणीय चेतना** भी ग्रंथ का एक अंश है — वैदिक प्रकृति-आदर की परम्परा, तथा आधुनिक sustainability-challenges के लिए उसकी प्रासंगिकता।

लेखिका की भाषा आत्मीय, प्रेरणादायक हिन्दी है, जो व्यापक मानवीय concerns को वैदिक wisdom के साथ जोड़ती है। 112 पृष्ठीय आयाम इसे comprehensive किन्तु accessible बनाता है।

मानवाधिकार एवं सामाजिक न्याय में रुचि रखने वाले पाठकों, आर्य समाज के साधकों, समाज-सुधार-कार्यकर्ताओं, महिला-सशक्तिकरण के समर्थकों, तथा प्रत्येक उस सुधी पाठक के लिए जो वैदिक जीवन-दर्शन के आधार पर एक अधिक करुणामय, समतामूलक, तथा मानवीय विश्व की कल्पना करना चाहता है — मानवता की ओर एक प्रेरणादायक एवं मूल्यवान संसाधन है।

ग्रंथ के अंतिम अध्याय में शान्ति देवी आर्य ने कुछ practical सुझाव भी दिए हैं कि कैसे व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में — पड़ोसियों के साथ, कार्यक्षेत्र में, तथा व्यापक समाज में — इन सार्वभौम मानवीय मूल्यों को concrete रूप में अभिव्यक्त कर सकता है। यह actionable guidance ग्रंथ को केवल एक philosophical treatise से आगे एक genuinely transformative जीवन-मार्गदर्शक बनाती है, जो पाठक को न केवल सोचने अपितु करने के लिए भी प्रेरित करती है। अंततः लेखिका यह स्थापित करती हैं कि सच्ची मानवता की यात्रा घर से, अपने निकटतम सम्बन्धों से आरम्भ हो कर धीरे-धीरे सम्पूर्ण विश्व तक विस्तृत होती है। यह सरल किन्तु गहन सन्देश ग्रंथ की सबसे बड़ी शक्ति है।

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