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Vedic Satsang Rashmi (Hindi–Sanskrit) – by Ved Prakash Singh Tomar | Arya Samaj Satsang Guide

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वैदिक सत्संग रश्मि (Vedic Satsang Rashmi), विद्वान् लेखक श्री वेद प्रकाश सिंह तोमर द्वारा रचित यह 192 पृष्ठीय हिन्दी-संस्कृत ग्रंथ, वैदिक सत्संग की परम्परा एवं उसके आध्यात्मिक प्रकाश-किरणों का एक समर्पित संकलन है। अमर स्वामी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह कृति ‘सत्संग’ — सत् + संग, अर्थात् सत्य के साथ संग — की भारतीय परम्परा को वैदिक आधार पर scholarly तरीके से प्रस्तुत करती है।

सत्संग वैदिक एवं भारतीय संस्कृति का एक अनुपम तत्त्व है। उपनिषदों ने स्पष्ट कहा है — ‘सत्संगत्वे निःसंगत्वम्, निःसंगत्वे निर्मोहत्वम्’। सत्संग से निःसंगता, निःसंगता से निर्मोहता, निर्मोहता से निश्चलता, निश्चलता से जीवन्मुक्ति — यह आध्यात्मिक उन्नयन का क्रमिक पथ है। श्री तोमर ने इसी सत्संग-परम्परा के वैदिक आधार, ऐतिहासिक विकास एवं समकालीन प्रासंगिकता पर scholarly विचार प्रस्तुत किया है।

ग्रंथ के प्रथम खण्ड में सत्संग का दार्शनिक स्वरूप उद्घाटित किया गया है। ‘सत्संग’ का व्याख्यान-निरूपण, इसकी आवश्यकता क्यों है, इसके विभिन्न रूप कौन से हैं, इसके प्रत्यक्ष एवं परोक्ष लाभ क्या हैं — इन प्रश्नों के scholarly समाधान वैदिक एवं उपनिषदीय प्रमाणों के आधार पर प्रस्तुत हैं। ‘महद्भिर्यत्र संगस्तत्र सङ्गः सर्वथा त्याज्यः’ — महाजनों के साथ संग ही सत्संग है, अन्य संग त्याज्य है — इस वैदिक सिद्धान्त का scholarly विवेचन है।

ऋषि-परम्परा एवं सत्संग का historical विवरण ग्रंथ का एक मूल्यवान आयाम है। वैदिक काल के ऋषि-समाज, उनकी सत्संग-व्यवस्थाएँ, गुरुकुलों में सत्संग का स्थान, उपनिषदीय ‘पंक्ति-भोजन’ एवं ‘गोष्ठी’ की परम्परा, बौद्ध-संघ की सत्संग-दृष्टि, मध्यकालीन भक्ति-आन्दोलन में सत्संग का पुनर्जागरण, आर्य समाज के ‘सप्ताह-यज्ञ’ एवं ‘सत्संग-समारोह’ — यह सम्पूर्ण historical continuum scholarly तरीके से प्रस्तुत है।

ग्रंथ का एक प्रमुख खण्ड वैदिक मन्त्रों के सामूहिक पाठ एवं उनके आध्यात्मिक प्रभावों पर है। मन्त्रों की उच्चारण-विधि, स्वराङ्कन का महत्त्व, सामूहिक पाठ की vibrational शक्ति, गायत्री मन्त्र की scholarly व्याख्या एवं उसकी उपासना-पद्धति, महामृत्युञ्जय मन्त्र का साधना-पक्ष — इन सब विषयों पर authentic विवेचन है।

यज्ञ एवं सत्संग के अन्तर्संबंध पर एक विशेष अध्याय है। आर्य समाज की परम्परा में यज्ञ केवल कर्मकाण्ड नहीं, अपितु सामूहिक आध्यात्मिक उपक्रम है — जिसमें मन्त्र-पाठ, हवन, उपदेश, स्वाध्याय, सत्संग — सभी संयुक्त रूप से उपस्थित होते हैं। दैनिक यज्ञ, साप्ताहिक यज्ञ, विशेष यज्ञ — इन सबका सत्संग-परिप्रेक्ष्य से विवेचन है।

स्वाध्याय एवं सत्संग के अन्तर्संबंध पर भी scholarly विचार है। स्वाध्याय व्यक्तिगत है, सत्संग सामूहिक — किन्तु दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। स्वाध्याय द्वारा अर्जित ज्ञान सत्संग में परिपक्व होता है, सत्संग द्वारा प्राप्त inspiration स्वाध्याय में सघन होती है। यह द्विविध साधना-क्रम वैदिक जीवन-शैली का अंग है।

ग्रंथ में अनेक scholarly व्याख्यान-शैली के अध्याय हैं, जो प्रवचन-स्वरूप में प्रस्तुत किए गए हैं। ये अध्याय एक प्रकार से ‘lecture compilations’ हैं — जिन्हें पढ़ कर पाठक मानो स्वयं को एक वैदिक सत्संग में उपस्थित अनुभव कर सकता है। प्रत्येक अध्याय का एक central theme — वेद-महिमा, यज्ञ-तत्त्व, ईश्वर-स्वरूप, धर्म-दर्शन, व्यावहारिक नैतिकता, गृहस्थ-धर्म, संस्कार-व्यवस्था, स्त्री-गरिमा, युवा-धर्म — और उसका scholarly किन्तु accessible विवेचन।

सामाजिक एवं नैतिक आयाम पर भी विशेष बल है। सत्संग केवल आध्यात्मिक उन्नयन का साधन नहीं, अपितु सामाजिक संगठन एवं नैतिक जागरण का माध्यम भी है। नियमित सत्संग में जाने वाला परिवार, मोहल्ला, अथवा समुदाय कैसे क्रमशः अधिक सात्त्विक, सहयोगी एवं dharmic बनता है — इसके वास्तविक उदाहरण भी ग्रंथ में उपलब्ध हैं।

समकालीन प्रासंगिकता पर एक स्पष्ट खण्ड है। वर्तमान काल में जहाँ social media की virtual दुनिया मानवीय संबंधों को विस्थापित कर रही है, अकेलापन (loneliness) एक mental health epidemic बन रहा है, परिवारों में संवाद घट रहा है, मूल्य-संकट गहरा रहा है — ऐसे समय में नियमित सत्संग का संगठन कैसे एक civilisational antidote सिद्ध हो सकता है, इस पर scholarly किन्तु practical विचार है।

व्यावहारिक मार्गदर्शन के रूप में सत्संग के संचालन की विधि भी प्रस्तुत है। सत्संग कब, कहाँ, कैसे आयोजित किया जाए; उसकी प्रामाणिक संरचना क्या हो; मन्त्र-पाठ, उपदेश, स्वाध्याय, भजन — इनका क्रम क्या हो; प्रसाद-वितरण, सहभागिता, सामूहिक प्रार्थना — इन सबके practical aspects पर मार्गदर्शन है।

ग्रंथ की भाषा प्रांजल हिन्दी है, जिसमें संस्कृत वैदिक शब्दावली का सटीक प्रयोग है। प्रत्येक सिद्धान्त के समर्थन में वेद-उपनिषद् के मूल मन्त्र, उनका हिन्दी अनुवाद एवं विवेचन — यह संरचना ग्रंथ को scholarly एवं उपयोगी — दोनों बनाती है।

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