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Maharshi Dayanand Ka Darshnik Chintan (Hindi–Sanskrit) – by Dr. Ramesh Datt Mishra | Dayanand Saraswati Philosophy

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महर्षि दयानन्द का दार्शनिक चिन्तन (Maharshi Dayanand Ka Darshnik Chintan), विद्वान् आर्य विचारक डॉ. रमेश दत्त मिश्र द्वारा रचित यह 263 पृष्ठीय हिन्दी-संस्कृत ग्रंथ, उन्नीसवीं शताब्दी के सर्वाधिक consequential दार्शनिक एवं समाज-सुधारक — महर्षि दयानन्द सरस्वती — के विचार-तंत्र का एक scholarly अध्ययन है। अमर स्वामी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह कृति महर्षि के दार्शनिक योगदान को उसकी सम्पूर्ण गहराई एवं scholarly गरिमा के साथ प्रस्तुत करती है।

महर्षि दयानन्द (1824-1883) केवल एक धार्मिक सुधारक नहीं थे — वे एक मौलिक दार्शनिक चिन्तक, वेद-व्याख्याता एवं civilisational द्रष्टा थे जिन्होंने भारतीय समाज को मध्ययुगीन निद्रा से जागृत किया एवं उसे वैदिक आधार पर पुनः प्रतिष्ठित करने का ऐतिहासिक प्रयास किया। ‘सत्यार्थ प्रकाश’, ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’, ‘संस्कारविधि’, ‘आर्याभिविनय’ — इन कालजयी कृतियों के माध्यम से उन्होंने जो दार्शनिक भूमि निर्मित की, उसकी systematic exposition इस ग्रंथ का मूल विषय है।

डॉ. मिश्र ने महर्षि के दर्शन को कई आयामों में परीक्षित किया है। ईश्वर-तत्त्व-मीमांसा का खण्ड विशेष रूप से प्रकाशमान है। महर्षि का एकेश्वरवाद वैदिक है, यह न तो अद्वैत वेदान्त का सर्वव्यापी ब्रह्म है, न ही pauranic अवतारवाद; अपितु एक सच्चिदानन्द-स्वरूप, निराकार, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, न्यायकारी ईश्वर है — जो वेदों में ‘एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति’ के रूप में प्रकाशित है। इस ईश्वर-स्वरूप की scholarly व्याख्या ग्रंथ का दार्शनिक केन्द्र है।

जीव-तत्त्व का विवेचन भी महत्त्वपूर्ण है। महर्षि ने ईश्वर एवं जीव की अनादिता का सिद्धान्त प्रतिपादित किया, साथ ही दोनों की पृथक् सत्ता को स्वीकार किया। यह स्थिति शंकर के निर्विशेष अद्वैत से भिन्न है, तथा रामानुज के विशिष्टाद्वैत से भी कुछ हद तक पृथक्। डॉ. मिश्र ने इस त्रैत-वाद (ईश्वर-जीव-प्रकृति की त्रिविध अनादिता) का scholarly विश्लेषण प्रस्तुत किया है।

प्रकृति-तत्त्व एवं सृष्टि-विज्ञान पर भी महर्षि का चिन्तन मौलिक है। सांख्य-दर्शन के प्रकृति-पुरुष-सिद्धान्त के साथ-साथ वैदिक सृष्टि-प्रक्रिया का जो समन्वय महर्षि ने प्रस्तुत किया, वह आधुनिक scientific दृष्टि के साथ भी sympathetic dialogue कर सकता है। ‘स्वाभाविकी ज्ञान-बल-क्रिया च’ — श्वेताश्वतर उपनिषद् के इस सूत्र की महर्षि की व्याख्या एवं उसके वैज्ञानिक निहितार्थ — यह ग्रंथ का एक बौद्धिक रूप से उत्तेजक खण्ड है।

वेद-प्रामाण्य का सिद्धान्त महर्षि के समस्त दार्शनिक प्रासाद की आधारशिला है। डॉ. मिश्र ने यह स्पष्ट किया है कि महर्षि ने वेदों को केवल historical दस्तावेज़ नहीं माना, अपितु ईश्वर-कृत अपौरुषेय, सर्वकालीन सत्य का ग्रंथ माना। ‘वेदोऽखिलो धर्ममूलम्’ की मान्यता को उन्होंने rational एवं evidence-based तरीके से पुनः प्रतिष्ठित किया।

समाज-दर्शन के क्षेत्र में महर्षि का योगदान inclusive एवं reformist है। वर्ण-व्यवस्था की कर्म-गुण आधारित मौलिक व्याख्या, स्त्री-शिक्षा का प्रबल समर्थन, बाल-विवाह एवं अस्पृश्यता का खण्डन, विधवा-विवाह की स्वीकृति, मूर्ति-पूजा एवं sectarian रीतियों की समीक्षा — इन सब विषयों पर महर्षि के विचारों का scholarly विवेचन है।

ज्ञान-मीमांसा (epistemology) में महर्षि ने प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द — चारों प्रमाणों को स्वीकार किया, किन्तु शब्द-प्रमाण के अन्तर्गत वेद को सर्वोच्च स्थान प्रदान किया। उन्होंने ईश्वर-कृत वेद एवं मानव-कृत शास्त्रों के बीच का भेद स्पष्ट किया। यह epistemological framework महर्षि के समस्त चिन्तन की आधार-संरचना है।

लेखक ने कर्म-सिद्धान्त, मोक्ष-स्वरूप, बन्धन एवं मुक्ति, यज्ञ-संस्कृति का वैज्ञानिक आधार, भाषा-विज्ञान में महर्षि का योगदान, तथा शिक्षा-दर्शन में उनकी मौलिक दृष्टि — इन सब विषयों पर भी विस्तृत अध्याय रचे हैं।

ग्रंथ की भाषा scholarly हिन्दी है, जिसमें संस्कृत technical terminology का सटीक प्रयोग है। प्रत्येक सिद्धान्त के समर्थन में महर्षि की मूल कृतियों एवं वेद-उद्धरणों का प्रामाणिक उपयोग है।

आर्य समाज के साधकों, वेदान्त-दर्शन के विद्यार्थियों, धर्म-दर्शन के researchers, तथा प्रत्येक उस सुधी पाठक के लिए जो आधुनिक भारत के पुनर्जागरण के दार्शनिक आधार को गहराई से समझना चाहता है — यह ग्रंथ एक मूल्यवान संसाधन है। यह कृति महर्षि दयानन्द के विचार-वैभव का एक scholarly अभिवादन है।

ग्रंथ की एक scholarly विशेषता यह भी है कि लेखक ने महर्षि के दर्शन की तुलना अन्य भारतीय एवं पाश्चात्य दार्शनिक परम्पराओं से भी की है। शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त, रामानुज के विशिष्टाद्वैत, माध्व के द्वैत, सांख्य-दर्शन, कांट एवं हेगेल के पाश्चात्य विचारों के साथ comparative analysis के माध्यम से डॉ. मिश्र ने यह स्थापित किया है कि महर्षि का त्रैत-वाद किसी एक दर्शन की पुनरावृत्ति नहीं — यह वेद-आधारित एक मौलिक एवं स्वतंत्र दार्शनिक प्रणाली है। यह तुलनात्मक दृष्टिकोण ग्रंथ को आधुनिक scholarly discourse के लिए विशेष रूप से उपयोगी बनाता है।

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