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Yajurveda Ka Swadhyay Tatha Pashu Yagya Samiksha (Hindi) – by Pt. Vishwanath Vidyalankar | Vedic Ahimsa Study

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यजुर्वेद का स्वाध्याय तथा पशु-यज्ञ समीक्षा (Yajurveda Ka Swadhyay Tatha Pashu Yagya Samiksha), पण्डित विश्वनाथ विद्यालंकार द्वारा रचित यह 204 पृष्ठीय हिन्दी scholarly ग्रंथ, यजुर्वेद के स्वाध्याय-मार्गदर्शन के साथ-साथ ‘पशु-यज्ञ’ (पशु-सम्बन्धी यज्ञ) की एक rigorous, critical, तथा scholarly समीक्षा प्रस्तुत करता है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति एक अत्यंत sensitive किन्तु महत्त्वपूर्ण Vedic-hermeneutics-विषय को सम्बोधित करती है।

ग्रंथ का प्रथम खण्ड यजुर्वेद के systematic स्वाध्याय-मार्गदर्शन को समर्पित है — कैसे एक साधक यजुर्वेद के विशाल मन्त्र-राशि का व्यवस्थित अध्ययन करे, किस क्रम में विभिन्न अध्यायों को approach करे, तथा प्रमुख उपनिषदों (ईशावास्य) एवं स्तोत्रों (शतरुद्रिय, पुरुष-सूक्त) पर विशेष ध्यान कैसे दे।

**’पशु-यज्ञ’ का central विषय** — वैदिक साहित्य में कुछ यज्ञों में पशु-सम्बन्धी references मिलते हैं, जिन्हें परवर्ती काल में literal पशु-बलि के रूप में interpreted किया गया। पण्डित विश्वनाथ विद्यालंकार ने इस विषय की rigorous scholarly समीक्षा प्रस्तुत की है, जो आर्य समाज की Vedic-hermeneutics-परम्परा के अनुरूप एक अलग व्याख्या प्रस्तुत करती है।

**महर्षि दयानन्द की methodology का application** — निरुक्त-आधारित यौगिक-अर्थ-पद्धति के माध्यम से यह scholarly तर्क कि ‘पशु’ शब्द वैदिक context में literal animal के बजाय एक व्यापक अर्थ (‘बन्धन में जकड़े हुए’, ‘इन्द्रिय-पशु’ आदि) रखता है, तथा ‘यज्ञ’ में इसका प्रयोग symbolic-spiritual sense में है, न कि literal पशु-हिंसा के अर्थ में।

**Textual evidence का scholarly विश्लेषण** — विभिन्न यजुर्वेदीय मन्त्रों का detailed etymological विश्लेषण, जो pौराणिक अथवा traditional-ritualistic interpretations की तुलना में एक भिन्न, अहिंसा-सुसंगत reading प्रस्तुत करता है।

**अहिंसा-सिद्धान्त के साथ सामंजस्य** — यह scholarly तर्क कि वेदों का मूल आध्यात्मिक सन्देश अहिंसा-केन्द्रित है, तथा literal पशु-बलि की व्याख्या वेदों की व्यापक ethical-spiritual vision से असंगत है।

**Comparative textual criticism** — विभिन्न classical commentators (सायण सहित) के पशु-यज्ञ-सम्बन्धी interpretations की scholarly समीक्षा, तथा उनसे महर्षि दयानन्द-परम्परा के मतभेद का rigorous विवेचन।

**Historical context** — यह भी विवेचित है कि कैसे कालांतर में कुछ शाब्दिक misinterpretations वैदिक कर्मकाण्ड में literal पशु-बलि की प्रथाओं को justify करने के लिए प्रयुक्त हुए, तथा यह मूल वैदिक भावना से एक विचलन था।

पण्डित विश्वनाथ विद्यालंकार की writing-शैली rigorous, evidence-based, तथा respectful-yet-firm है, जो इस sensitive विषय को scholarly gravity के साथ सम्बोधित करती है।

204 पृष्ठीय comprehensive आयाम विषय की dual-nature (स्वाध्याय-मार्गदर्शन एवं critical समीक्षा) के अनुरूप है।

आर्य समाज के साधकों, यजुर्वेद के विद्यार्थियों, Vedic-hermeneutics के researchers, अहिंसा-दर्शन में रुचि रखने वाले पाठकों, comparative religion के scholars, तथा प्रत्येक उस सुधी जिज्ञासु के लिए जो यजुर्वेद के systematic स्वाध्याय के साथ-साथ पशु-यज्ञ-सम्बन्धी विवादास्पद विषय की rigorous scholarly समीक्षा चाहता है — यह ग्रंथ एक महत्त्वपूर्ण scholarly संसाधन है।

पण्डित विश्वनाथ विद्यालंकार ने ग्रंथ के समापन में यह भी स्पष्ट किया है कि उनका उद्देश्य किसी परम्परा की निंदा करना नहीं, अपितु वैदिक मूल पाठ की rigorous, evidence-based scholarly पुनः-जाँच के माध्यम से वेदों की मूल अहिंसा-केन्द्रित civilisational भावना को पुनर्स्थापित करना है, जो उनके अनुसार समय के साथ कुछ misinterpretations से आच्छादित हो गई थी।

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