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Vishnusahasranamastotram – Set of 4 Books (Sanskrit–Hindi) – by Pt. Yudhishthir Mimansak | Vishnu Sahasranama

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विष्णुसहस्रनामस्तोत्रम् (4 भागों का समुच्चय) — Vishnusahasranamastotram, पंडित युधिष्ठिर मीमांसक द्वारा सम्पादित यह 1645 पृष्ठीय Sanskrit-Hindi द्वि-भाषी विशाल ग्रंथ-समुच्चय, महाभारत में निहित प्रसिद्ध ‘विष्णुसहस्रनाम’ स्तोत्र का एक comprehensive scholarly, etymological, एवं आध्यात्मिक विवेचन प्रस्तुत करता है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह monumental कृति भारतीय भक्ति-दार्शनिक साहित्य के सर्वाधिक प्रतिष्ठित ग्रंथों में से एक का scholarly deep-dive प्रस्तुत करती है।

**’विष्णुसहस्रनाम’** — महाभारत के अनुशासन-पर्व में भीष्म पितामह द्वारा युधिष्ठिर को उपदिष्ट — परमात्मा के 1000 नामों का एक अनुपम स्तोत्र है। यह स्तोत्र भारतीय भक्ति-परम्परा में सर्वाधिक व्यापक रूप से पठित एवं आदरणीय है, तथा यह ईश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव को उसके सहस्र नामों के माध्यम से व्यक्त करता है।

पंडित युधिष्ठिर मीमांसक ने इस 4-भागीय comprehensive संस्करण में इस स्तोत्र का बहु-आयामी scholarly विवेचन प्रस्तुत किया है, जो पारम्परिक भक्ति-भावना एवं rigorous scholarly-etymological analysis का सुन्दर संगम है।

**प्रथम भाग** — स्तोत्र का प्रामाणिक Sanskrit पाठ, इसकी historical एवं textual पृष्ठभूमि, महाभारत में इसका context (भीष्म-युधिष्ठिर-संवाद), तथा इसकी civilisational महत्ता का scholarly परिचय।

**द्वितीय भाग** — प्रत्येक नाम का detailed etymological exposition। सहस्र नामों में से प्रत्येक का — जैसे ‘विश्वं’, ‘विष्णुः’, ‘वषट्कारः’, ‘भूतभव्यभवत्प्रभुः’ — मूल Sanskrit derivation, इसका अर्थ, इसका philosophical significance — यह सब systematic scholarly विवेचन।

आर्य समाज परम्परा के अनुरूप, लेखक ने यह scholarly clarification भी प्रस्तुत की है कि यह 1000 नाम विभिन्न देवताओं के नाम नहीं, अपितु एक ही सर्वव्यापी ईश्वर के विविध गुण-वाचक नाम हैं — ‘एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति’ — यह वैदिक सिद्धान्त इस स्तोत्र की सही interpretive-key है।

**तृतीय भाग** — विभिन्न classical commentators — आदि शंकराचार्य, पराशर भट्ट, वेदान्त देशिक — के भाष्यों का comparative scholarly विवेचन। यह विभिन्न दार्शनिक परम्पराओं (अद्वैत, विशिष्टाद्वैत) के दृष्टिकोण से इस स्तोत्र की व्याख्या कैसे भिन्न होती है, इसका rigorous तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है।

**चतुर्थ भाग** — स्तोत्र का upasana-methodology (उपासना-पद्धति), जप-विधि, इसके पाठ के आध्यात्मिक एवं मनोवैज्ञानिक लाभ, तथा दैनिक जीवन में इसका practical अनुप्रयोग।

नामों के thematic clusters का scholarly विश्लेषण भी ग्रंथ का एक मूल्यवान अंश है — कुछ नाम ईश्वर के सृष्टि-कर्तृत्व को दर्शाते हैं, कुछ उसकी संरक्षण-शक्ति को, कुछ उसकी संहार-शक्ति को, कुछ उसकी transcendent nature को — यह categorical विश्लेषण स्तोत्र की systematic theological संरचना को उजागर करता है।

Sanskrit भाषा-वैज्ञानिक दृष्टि से भी यह स्तोत्र अत्यंत समृद्ध है — विभिन्न व्याकरणिक structures, समास-प्रयोग, तथा rhetorical devices का प्रयोग, जिसका scholarly विश्लेषण भाषा-प्रेमी पाठकों के लिए विशेष रूप से रुचिकर है।

पंडित युधिष्ठिर मीमांसक की scholarly-cum-devotional writing-शैली इस स्तोत्र की गूढ़ आध्यात्मिक गहराई एवं इसकी linguistic sophistication — दोनों को समान न्याय प्रदान करती है।

1645 पृष्ठीय विशाल आयाम, 4-भागीय संरचना — यह ग्रंथ-समुच्चय विष्णुसहस्रनाम-अध्ययन के लिए एक comprehensive, अद्वितीय ultimate scholarly संसाधन प्रस्तुत करता है।

भक्ति-परम्परा के साधकों, संस्कृत के विद्यार्थियों, वेदान्त-दर्शन के अध्येताओं, comparative religion के researchers, नित्य पाठकों जो इस स्तोत्र का गहन अर्थ समझना चाहते हैं, आर्य समाज के साधकों, तथा प्रत्येक उस सुधी पाठक के लिए जो विष्णुसहस्रनाम की सम्पूर्ण scholarly एवं आध्यात्मिक गहराई का व्यापक परिचय चाहता है — विष्णुसहस्रनामस्तोत्रम् (4 भाग) एक indispensable ultimate scholarly संसाधन है।

ग्रंथ के अंत में पंडित मीमांसक ने यह भी उल्लेखनीय scholarly नोट प्रस्तुत किया है कि विष्णुसहस्रनाम के नियमित पाठ का मनोवैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक प्रभाव आधुनिक meditation-research के निष्कर्षों से भी resonate करता है — नाम-जप की repetitive, rhythmic प्रकृति mindfulness एवं mental-focus को बढ़ाती है। यह interdisciplinary connection ग्रंथ को पारम्परिक भक्ति-अध्ययन से आगे आधुनिक contemplative-science के साथ भी एक meaningful संवाद में लाता है।

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