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Tvashtari-Saranyu Ke Aakhyano Ka Vastavik Swaroop (Hindi) – by Pt. Yudhishthir Mimansak | Rigveda Reinterpretation

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त्वाष्ट्री-सरण्यू के आख्यानों का यथार्थ स्वरूप (Tvashtari-Saranyu Ke Aakhyano Ka Vastavik Swaroop), पंडित युधिष्ठिर मीमांसक द्वारा रचित यह हिन्दी scholarly ग्रंथ, ऋग्वेद में उल्लिखित त्वष्टा (त्वाष्ट्री) एवं सरण्यू सम्बन्धी आख्यानों की एक rigorous scholarly पुनर्व्याख्या प्रस्तुत करता है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति आर्य समाज परम्परा के Vedic-hermeneutics-methodology का एक focused case-study है, जो देवापि-शान्तनु आख्यान अध्ययन की परम्परा में एक और महत्त्वपूर्ण योगदान प्रस्तुत करती है।

ऋग्वेद में ‘त्वष्टा’ (सृष्टि के शिल्पी-देवता) एवं ‘सरण्यू’ (त्वष्टा की पुत्री) से सम्बद्ध कुछ आख्यान मिलते हैं, जिन्हें परवर्ती पौराणिक साहित्य में विस्तृत mythological narratives के रूप में elaborate किया गया — सरण्यू का विवाह, उसका छिपना, उसकी छाया-प्रतिकृति (छाया) का निर्माण, तथा अश्विनी कुमारों की उत्पत्ति से सम्बन्धित कथाएँ।

पंडित युधिष्ठिर मीमांसक ने अपने इस scholarly अध्ययन में यह प्रश्न उठाया है — क्या यह elaborate pौराणिक कथा मूल वैदिक मन्त्रों का authentic अर्थ है, अथवा यह परवर्ती काल की काल्पनिक अभिवृद्धि है? यह textual-critical प्रश्न आर्य समाज की Vedic-hermeneutics-परम्परा का एक central concern है, जो महर्षि दयानन्द की methodology पर आधारित है।

**Etymological analysis का application** — ‘त्वष्टा’ — ‘त्वक्ष्’ (to fashion/shape) धातु से व्युत्पन्न — ‘सृष्टि का शिल्पकार/निर्माता’ का अर्थ प्रस्तुत करता है, जो एक cosmological-creative तत्त्व को इंगित करता है, न कि किसी व्यक्ति-विशेष देवता को। ‘सरण्यू’ का यौगिक अर्थ भी गति/प्रवाह से सम्बद्ध प्राकृतिक तत्त्व की ओर इंगित करता है।

**Comparative mythology का context** — यह भी उल्लेखनीय है कि ‘सरण्यू’ कथा की कुछ similarities Greek mythology की ‘Erinyes’ अथवा अन्य Indo-European myths से देखी गई हैं, जिसका brief comparative scholarly विवेचन भी ग्रंथ में है, यद्यपि लेखक इन pौराणिक parallels के बजाय वैदिक यौगिक-अर्थ को प्राथमिकता देते हैं।

**Cosmological पुनर्व्याख्या** — यह तर्क कि यह मन्त्र मूलतः सृष्टि-प्रक्रिया के प्राकृतिक-आध्यात्मिक aspects को describe कर रहे हैं, न कि किसी historical व्यक्ति-विशेष की कथा।

**पौराणिक elaboration की उत्पत्ति** — कैसे समय के साथ मूल अमूर्त वैदिक मन्त्रों को concrete narrative-form दे दी गई, यह Vedic-interpretation-history का एक व्यापक pattern है, जिसका यह ग्रंथ एक और focused case-study प्रस्तुत करता है।

पंडित मीमांसक की rigorous scholarly methodology — मूल मन्त्रों का प्रामाणिक पाठ, उनका पद-च्छेद-अन्वय, यौगिक-अर्थ-विश्लेषण, तथा pौराणिक-versus-वैदिक व्याख्याओं का comparative विवेचन — इस focused अध्ययन को rigorous scholarly authority प्रदान करती है।

आर्य समाज के साधकों, Vedic-hermeneutics के researchers, comparative mythology के अध्येताओं, ऋग्वेद के विद्यार्थियों, तथा प्रत्येक उस सुधी पाठक के लिए जो वैदिक आख्यानों की महर्षि दयानन्द-प्रणीत scholarly पुनर्व्याख्या को समझना चाहता है — यह ग्रंथ एक मूल्यवान specialized scholarly संसाधन है।

पंडित मीमांसक ने ग्रंथ के समापन में यह भी scholarly तर्क प्रस्तुत किया है कि इस प्रकार की reinterpretation-methodology न केवल त्वष्टा-सरण्यू आख्यान पर, अपितु ऋग्वेद के अन्य अनेक apparently mythological आख्यानों पर भी systematically लागू की जा सकती है, जो अन्य researchers के लिए भी एक उपयोगी methodological template प्रस्तुत करता है, तथा वैदिक textual-studies के व्यापक framework में एक सुसंगत scholarly योगदान देता है।

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