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Srishti Ka Itihas (Hindi) – by Dharmveer Pandit Lekhram | Vedic Cosmology & Arya Samaj Darshan

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सृष्टि का इतिहास (Srishti Ka Itihas), धर्मवीर पंडित लेखराम द्वारा रचित यह 184 पृष्ठीय हिन्दी ग्रंथ, सृष्टि-विज्ञान एवं इतिहास के वैदिक दृष्टिकोण का एक मौलिक एवं scholarly विवेचन है। अमर स्वामी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह कृति आर्य समाज के अमर शहीद, दार्शनिक एवं तर्कशास्त्री पंडित लेखराम (1858-1897) की लेखनी से प्रसूत है — जिन्हें ‘धर्मवीर’ की उपाधि उनकी अद्वितीय शास्त्र-निष्ठा एवं अंतिम बलिदान के लिए प्रदान की गई।

पंडित लेखराम — जिन्हें महर्षि दयानन्द सरस्वती के सर्वाधिक प्रखर शिष्यों में गिना जाता है — ने अपने अल्पकालीन किन्तु तीव्रता-पूर्ण जीवन में आर्य धर्म की रक्षा एवं प्रचार के लिए अद्वितीय कार्य किया। ‘सृष्टि का इतिहास’ उनकी प्रमुख कृतियों में से एक है, जो वैदिक सृष्टि-विज्ञान को scholarly तर्क-पद्धति एवं प्रामाणिक shastric उद्धरणों के साथ प्रस्तुत करती है।

ग्रंथ का मूल प्रश्न मौलिक दार्शनिक है — सृष्टि की उत्पत्ति कैसे हुई? सृष्टि-कर्ता कौन है? सृष्टि-प्रक्रिया का स्वरूप क्या है? सृष्टि का इतिहास कब प्रारम्भ हुआ? वर्तमान सृष्टि-काल कितना है? इन सभी प्रश्नों के समाधान वैदिक एवं विशेषतः आर्य समाज दृष्टिकोण से प्रस्तुत किए गए हैं।

सृष्टि-कर्ता ईश्वर का स्वरूप-निरूपण ग्रंथ का दार्शनिक केन्द्र है। पंडित लेखराम ने यह स्थापित किया है कि सृष्टि-निर्माता ईश्वर एक, सच्चिदानन्द-स्वरूप, निराकार, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी एवं सर्वव्यापक है। उन्होंने वेद-मन्त्रों, उपनिषद्-वाक्यों एवं तर्कसंगत प्रमाणों के आधार पर एकेश्वरवाद का सशक्त प्रतिपादन किया है — साथ ही polytheism, अवतारवाद, मूर्ति-पूजा, एवं अन्य sectarian मान्यताओं की reasoned समीक्षा प्रस्तुत की है।

सृष्टि-प्रक्रिया का scholarly विवेचन ग्रंथ का एक प्रमुख आयाम है। वैदिक एवं सांख्य-दर्शन के आधार पर ईश्वर, जीव एवं प्रकृति की त्रिविध अनादिता का सिद्धान्त, प्रकृति का तीन गुणों (सत्त्व-रजस्-तमस्) से युक्त मूल कारण होना, ईश्वरीय इच्छा-शक्ति से सृष्टि-प्रक्रिया का प्रारम्भ, महत्तत्त्व, अहंकार, पञ्च-तन्मात्र, इन्द्रियाँ, पञ्च-महाभूत — इन सबकी क्रमिक उत्पत्ति का scholarly विश्लेषण है।

सृष्टि-संवत् का प्रश्न ग्रंथ का एक उल्लेखनीय खण्ड है। आर्य समाज की मान्यता के अनुसार वर्तमान सृष्टि-काल लगभग 1.96 अरब वर्ष पुराना है। पंडित लेखराम ने इस काल-गणना का scholarly आधार — मनु-स्मृति, सूर्य-सिद्धान्त, ज्योतिष-शास्त्र, एवं पौराणिक कालगणना — से प्रस्तुत किया है। यह काल-गणना आधुनिक geological एवं cosmological अनुमानों के साथ कैसे संगत है, इस पर भी विचार है।

ईसाई एवं इस्लामी सृष्टि-सिद्धान्तों — जो सृष्टि को मात्र छह दिनों में अथवा कुछ सहस्र वर्ष पूर्व मानते हैं — की तर्क-संगत समीक्षा भी ग्रंथ का अंग है। पंडित लेखराम — जिन्होंने अपने जीवन काल में अनेक polemical works रचे — ने इन विषयों पर शास्त्रार्थ-शैली में विचार प्रस्तुत किए हैं। उनकी तर्क-पद्धति न तो आक्रामक है, न ही दुर्बल; अपितु scholarly evidence एवं reasoned argumentation पर अधिष्ठित है।

मानव-उत्पत्ति का अध्याय भी मौलिक है। वैदिक मान्यता अनुसार मानव-सृष्टि तिब्बत के पठारी क्षेत्र (त्रिविष्टप) से प्रारम्भ हुई, तत्पश्चात विभिन्न दिशाओं में जन-प्रसार हुआ। आर्य-निवास का मूल स्थान, संस्कृत भाषा की प्राचीनता, वैदिक संस्कृति का वैश्विक प्रसार — इन सब विषयों पर scholarly विचार है। यह दृष्टि ‘आर्य-आक्रमण’ सिद्धान्त की reasoned समीक्षा भी प्रस्तुत करती है।

सृष्टि का प्रलय (विघटन) एवं पुनःसृष्टि का चक्रीय सिद्धान्त भी ग्रंथ में निरूपित है। काल की चक्रीयता, चार युगों का क्रम, ब्रह्मा का दिन एवं रात्रि, महाप्रलय एवं नित्य-प्रलय — यह सम्पूर्ण cosmological framework वैदिक दर्शन की एक मौलिक उपलब्धि है, जिसका scholarly विवरण ग्रंथ में प्राप्त है।

विज्ञान एवं वेद के बीच कोई अनिवार्य विरोध नहीं — यह पंडित लेखराम का स्पष्ट मत है। आधुनिक scientific खोजें — जैसे प्रकाश की गति, ग्रह-गति, तत्त्व-संरचना — कैसे वैदिक एवं उपनिषदीय सूत्रों से संगत हैं, इस पर रोचक विचार प्रस्तुत हैं।

ग्रंथ की भाषा scholarly हिन्दी है, जिसमें संस्कृत shastric शब्दावली का सटीक प्रयोग है। तर्क-प्रवाह स्पष्ट एवं प्रमाण-पुष्ट है। 184 पृष्ठीय यह कृति विषय की complexity के अनुरूप एक सुगठित scope प्रस्तुत करती है।

आर्य समाज के साधकों, वैदिक दर्शन के विद्यार्थियों, सृष्टि-विज्ञान के जिज्ञासुओं, comparative religion के researchers, एवं प्रत्येक उस सुधी पाठक के लिए जो भारतीय परम्परा की cosmological दृष्टि को scholarly तरीके से समझना चाहता है — सृष्टि का इतिहास एक मूल्यवान ग्रंथ है। यह कृति धर्मवीर पंडित लेखराम के intellectual विरासत का एक स्थायी प्रतीक है — जो उनकी अल्पकालीन किन्तु civilisational महत्त्व वाली scholarship का जीवन्त साक्ष्य प्रस्तुत करता है।

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