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Shukla Yajurvediya Kanva Samhita (Sanskrit, Rare) – by Shripad Damodar Satvalekar | Yajurveda Edition

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शुक्ल यजुर्वेदीय काण्व संहिता (Shukla Yajurvediya Kanva Samhita), विख्यात् वैदिक विद्वान् श्री पद्म दामोदर सातवलेकर द्वारा सम्पादित-प्रस्तुत यह 216 पृष्ठीय दुर्लभ संस्कृत ग्रंथ, वेदाध्ययन की परम्परा का एक अमूल्य रत्न है। अमर स्वामी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह कृति शुक्ल यजुर्वेद की काण्व शाखा को उसके मूल संस्कृत स्वरूप में, scholarly सम्पादन एवं प्रामाणिक प्रस्तुति के साथ उपलब्ध कराती है।

यजुर्वेद चारों वेदों में से एक है, जिसका विशेष महत्त्व यज्ञ-कर्म, अनुष्ठान एवं कर्मकाण्ड से सम्बन्धित मन्त्रों के संग्रह के रूप में है। यजुर्वेद की दो प्रमुख शाखाएँ हैं — शुक्ल यजुर्वेद एवं कृष्ण यजुर्वेद। शुक्ल यजुर्वेद की दो उप-शाखाएँ — माध्यन्दिन एवं काण्व — आज भी उपलब्ध हैं, जिनमें से काण्व शाखा अपेक्षाकृत कम प्रचलित किन्तु अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यह ग्रंथ इसी काण्व शाखा का वैज्ञानिक प्रस्तुतीकरण है।

श्री पद्म दामोदर सातवलेकर (1867-1968) — वेदाध्ययन के पुनरुत्थान के लिए समर्पित एक civilisational व्यक्तित्व — के सम्पादन की विशेषता यह है कि उन्होंने शास्त्रीय authenticity को बनाए रखते हुए text को आधुनिक scholar-साधक की पहुँच में लाया। उनके ‘स्वाध्याय मण्डल’ (पारडी, गुजरात) के माध्यम से जो वैदिक संरक्षण-कार्य हुआ, वह वैदिक विद्या के पुनर्जागरण की एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। प्रस्तुत संहिता उसी अकादमिक परम्परा से प्रसूत है।

संहिता मूल संस्कृत में है, देवनागरी लिपि में मुद्रित। प्रत्येक मन्त्र का प्रामाणिक पाठ, स्वराङ्कन (vedic accent marks), तथा structural संगठन सावधानीपूर्वक संरक्षित है। काण्व संहिता के 40 अध्याय (माध्यन्दिन की भाँति), उनमें वर्णित विभिन्न यज्ञों — दर्श-पूर्णमास, चातुर्मास्य, अग्निष्टोम, वाजपेय, राजसूय, अश्वमेध, पुरुष-मेध — से सम्बन्धित मन्त्रों का सम्पूर्ण संग्रह यहाँ उपलब्ध है।

विशेष रूप से प्रसिद्ध ‘ईशावास्य उपनिषद्’ — जो शुक्ल यजुर्वेद का चालीसवाँ अध्याय है — एवं ‘रुद्राध्याय’ (शतरुद्रिय, अध्याय 16), ‘पुरुषसूक्त’ एवं अन्य प्रमुख स्तोत्रात्मक अंश इस संहिता का अनुपम वैभव हैं। यजुर्वेद के ‘त्र्यम्बकं यजामहे’ (महामृत्युञ्जय मन्त्र) जैसे world-famous मन्त्र भी इसी संहिता से उद्धृत हैं।

माध्यन्दिन एवं काण्व शाखाओं के बीच पाठ-भेद, स्वर-भेद एवं structural विभिन्नताएँ वैदिक textual scholarship की एक रोचक एवं significant चर्चा का विषय हैं। काण्व शाखा अनेक स्थानों पर प्राचीनतर पाठ संरक्षित रखती है, और इस कारण comparative Vedic studies में उसका विशेष महत्त्व है।

यह संहिता संस्कृत में है, अतः इसका प्रत्यक्ष अध्ययन उन्हीं विद्यार्थियों के लिए सम्भव है जिन्हें संस्कृत भाषा का पर्याप्त ज्ञान है। तथापि, मन्त्रों का स्वाध्याय एवं पारायण उन सभी के लिए लाभदायक है जो वैदिक संस्कृति के प्रति आदर रखते हैं। प्रत्येक मन्त्र अपनी ध्वनि-शक्ति, छन्द-सौन्दर्य एवं भाव-गाम्भीर्य से युक्त है।

यज्ञानुष्ठान के दृष्टिकोण से यह संहिता एक अनिवार्य संदर्भ-ग्रंथ है। आर्य समाज के यज्ञ-अनुष्ठानों, गृह्य-संस्कारों, श्रौत यज्ञों एवं पारम्परिक वैदिक कर्मकाण्डों में काण्व शाखा के मन्त्रों का प्रयोग होता है। पुरोहितों, कर्मकाण्डियों, यज्ञ-संचालकों एवं वेद-पाठियों के लिए यह संहिता दैनिक आवश्यकता का ग्रंथ है।

scholarly दृष्टि से यह कृति वेद-विद्या (Vedic studies) के researchers के लिए अमूल्य है। comparative Vedic textual scholarship, यजुर्वेद की शाखा-परम्परा का अध्ययन, वैदिक स्वरांकन-प्रणाली का परीक्षण, यज्ञ-शास्त्र (yajna-shastra) के researchers — इन सभी के लिए यह primary source है।

‘rare book’ के रूप में चिह्नित होना ग्रंथ की दुर्लभता का सूचक है। काण्व संहिता के संस्करण आज सर्वत्र उपलब्ध नहीं हैं, अत: यह edition एक collector’s item एवं scholar’s reference — दोनों है। प्रकाशकीय गुणवत्ता विषय की वैदिक गरिमा के अनुरूप है।

संहिता-पाठ की पारम्परिक पद्धति का संरक्षण भी ध्यातव्य है। पद-पाठ, क्रम-पाठ, जटा-पाठ — इन विशिष्ट वेद-पाठ-पद्धतियों के लिए यह संहिता एक authentic आधार-ग्रंथ है।

संस्कृत के विद्यार्थियों, वेद-शास्त्र के researchers, वैदिक pandit-गणों, आर्य समाज के साधकों, पुरोहित-वर्ग, यज्ञ-अनुष्ठानकर्ताओं, एवं प्रत्येक उस सुधी जिज्ञासु के लिए जो वैदिक मूल पाठ तक प्रत्यक्ष पहुँच चाहता है — शुक्ल यजुर्वेदीय काण्व संहिता एक अनिवार्य ग्रंथ है। यह केवल पुस्तक नहीं — यह सहस्राब्दियों की अखण्ड वैदिक श्रुति-परम्परा का एक मूर्त रूप है, जिसका प्रत्येक मन्त्र एक मन्त्र-द्रष्टा ऋषि की चेतना से प्रकट हुआ था।

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