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Sanskarvidhi (Hindi) – by Maharshi Dayanand Saraswati | Vedic Sixteen Sanskars

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संस्कारविधि (Sanskarvidhi), महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा रचित यह विशाल 356 पृष्ठीय हिन्दी महाग्रंथ, वैदिक संस्कार-व्यवस्था — गर्भाधान से अन्त्येष्टि तक के षोडश-संस्कारों — का महर्षि की स्वयं रचित मूल, foundational, तथा authoritative कृति है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह ग्रंथ आर्य समाज परम्परा की सर्वाधिक प्रतिष्ठित एवं व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली ritual-manual है।

‘संस्कारविधि’ — महर्षि दयानन्द की उन core कृतियों में से एक है जो सत्यार्थ प्रकाश एवं ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के साथ आर्य समाज साहित्य का त्रिविध आधार-स्तम्भ बनाती है। इस ग्रंथ का उद्देश्य वैदिक संस्कार-परम्परा को उसके शुद्ध, अपौरुषेय-वेद-आधारित रूप में पुनर्स्थापित करना था, जो समय के साथ अनेक pauranic अथवा sectarian additions से मिश्रित हो गई थी।

ग्रंथ की संरचना 16 प्रमुख संस्कारों के अनुरूप है — **गर्भाधान** (सन्तान-प्राप्ति हेतु प्रारम्भिक संस्कार), **पुंसवन** (गर्भ-रक्षा), **सीमन्तोन्नयन** (गर्भवती की मंगल-कामना), **जातकर्म** (जन्म-संस्कार), **नामकरण** (नाम-निर्धारण), **निष्क्रमण** (प्रथम बाह्य-दर्शन), **अन्नप्राशन** (प्रथम अन्न-सेवन), **चूडाकर्म** (मुण्डन), **कर्णवेध** (कर्ण-छेदन), **उपनयन** (विद्यारम्भ एवं यज्ञोपवीत), **वेदारम्भ**, **समावर्तन** (शिक्षा-समापन), **विवाह**, **वानप्रस्थ**, **संन्यास**, तथा **अन्त्येष्टि** (अंतिम संस्कार)।

प्रत्येक संस्कार के लिए महर्षि ने मूल Sanskrit मन्त्र (वेदों से उद्धृत), उनका पद-च्छेद, हिन्दी अनुवाद, तथा उनके पीछे का shastric-दार्शनिक rationale प्रस्तुत किया है। यह comprehensive संरचना ग्रंथ को केवल एक ritual-guide से आगे एक profound philosophical-educational treatise बनाती है।

**उपनयन-संस्कार** का विशेष विस्तृत विवेचन — यज्ञोपवीत-धारण की सम्यक् विधि, वेदारम्भ की प्रक्रिया, गुरु-दक्षिणा का shastric आधार — यह महर्षि के इस ग्रंथ का सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं व्यापक रूप से referenced अंश है।

**विवाह-संस्कार** का detailed exposition — वाग्दान से सप्तपदी तक की complete Vedic विधि, जो आज भी अनेक आर्य समाज परिवारों में conducted होती है।

महर्षि की एक क्रांतिकारी विशेषता यह थी कि उन्होंने कन्याओं के लिए भी उपनयन-संस्कार का shastric समर्थन प्रस्तुत किया — गार्गी, मैत्रेयी जैसी वैदिक विदुषी स्त्रियों के उदाहरणों के साथ, जो स्त्री-शिक्षा के प्रति उनकी reformist दृष्टि को दर्शाता है।

**Historical impact** — यह ग्रंथ 19वीं शताब्दी से आज तक लाखों आर्य समाज परिवारों के जीवन-चक्र-संस्कारों का authoritative आधार रहा है, तथा इसका प्रभाव व्यापक हिन्दू समाज-सुधार-आंदोलन पर भी पड़ा है।

356 पृष्ठीय विशाल आयाम इस foundational ग्रंथ की comprehensiveness एवं इसकी civilisational महत्ता के अनुरूप है।

आर्य समाज के प्रत्येक परिवार, purohitों, संस्कार-कर्ता-आचार्यों, वैदिक gurukulas के acharyas, धार्मिक इतिहास के researchers, तथा प्रत्येक उस dharmic गृहस्थ के लिए जो अपने जीवन के प्रत्येक महत्त्वपूर्ण चरण को authentic वैदिक संस्कार के साथ सम्पन्न करना चाहता है — संस्कारविधि एक अनिवार्य, foundational, तथा कालातीत मार्गदर्शक है।

ग्रंथ की एक विशेष scholarly विशेषता यह है कि महर्षि ने प्रत्येक संस्कार के लिए pौराणिक अथवा sectarian additions को हटा कर, केवल वेद-मूलक, authentic मन्त्रों का उपयोग किया है। यह rigorous shastric-purity-approach ग्रंथ को अन्य समकालीन संस्कार-मैनुअलों से भिन्न बनाती है, तथा यह आर्य समाज के core ‘वेद वापस चलो’ (Back to the Vedas) आन्दोलन का एक ठोस व्यावहारिक अभिव्यक्ति है। यही कारण है कि यह ग्रंथ डेढ़ शताब्दी से अधिक समय से आर्य समाज के जीवन-चक्र-अनुष्ठानों का अपरिवर्तित आधार बना हुआ है।

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