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Prachin Bharat Me Prajatantra Ka Swaroop Va Aaj Ka Sansad (Hindi) – by Pt. Bhagwan Dev | Vedic Democracy Study

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प्राचीन भारत में प्रजातन्त्र का स्वरूप व आज का संसद (Prachin Bharat Me Prajatantra Ka Swaroop Va Aaj Ka Sansad), पंडित भगवान् देव द्वारा रचित यह 110 पृष्ठीय हिन्दी ग्रंथ, प्राचीन वैदिक-भारतीय शासन-व्यवस्था में निहित लोकतांत्रिक तत्त्वों का एक scholarly विवेचन प्रस्तुत करता है, जिसकी तुलना आधुनिक भारतीय संसदीय प्रणाली से की गई है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति एक महत्त्वपूर्ण civilisational thesis प्रस्तुत करती है कि प्रजातन्त्र कोई विशुद्ध पाश्चात्य आयात नहीं, अपितु भारतीय सभ्यता की एक प्राचीन देन है।

पंडित भगवान् देव ने अपने scholarly अनुसन्धान में वैदिक साहित्य — ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद — से अनेक ऐसे उद्धरण एकत्रित किए हैं जो प्राचीन भारतीय समाज में सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया, जन-प्रतिनिधित्व, तथा शासन में जन-सहभागिता के प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। ‘सभा’ एवं ‘समिति’ — यह दो वैदिक संस्थाएँ ग्रंथ के केन्द्रीय विषय हैं।

ग्रंथ का प्रथम खण्ड ‘सभा’ एवं ‘समिति’ के वैदिक स्वरूप का scholarly विवेचन प्रस्तुत करता है। ऋग्वेद में इन दोनों संस्थाओं के अनेक उल्लेख मिलते हैं — ‘सभा’ एक प्रकार की न्यायिक-सलाहकार परिषद् थी, जबकि ‘समिति’ एक व्यापक जन-प्रतिनिधि सभा थी, जहाँ महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय निर्णय लिए जाते थे। ‘सभां च मा समितिं चावतां प्रजापतेर्दुहितरौ संविदाने’ (अथर्ववेद 7.12.1) — यह मन्त्र इन दोनों संस्थाओं की Vedic authenticity का प्रमाण है।

राजा के चुनाव एवं जन-सहमति की भूमिका पर भी scholarly विचार है — वैदिक काल में राजा absolute monarch नहीं था, अपितु उसे सभा-समिति की सहमति एवं सलाह से शासन करना होता था। ‘राजा’ शब्द की व्युत्पत्ति ही (‘राज्’ — to shine/rule with consent) इस consent-based governance को इंगित करती है।

लेखक ने प्राचीन गणराज्यों (republics) का भी scholarly विवेचन प्रस्तुत किया है — वैशाली, लिच्छवी, मल्ल जैसे प्राचीन भारतीय गणराज्य जो बौद्ध-काल तक भी अस्तित्व में रहे, यह प्रमाणित करते हैं कि collective/democratic governance की परम्परा भारत में गहराई से निहित थी।

आधुनिक भारतीय संसदीय प्रणाली के साथ इन प्राचीन संस्थाओं की तुलनात्मक विवेचना ग्रंथ का central scholarly contribution है। लोकसभा एवं राज्यसभा की द्विसदनीय व्यवस्था की तुलना ‘सभा’ एवं ‘समिति’ से; चुनाव-प्रक्रिया की तुलना प्राचीन जन-सहमति-पद्धति से; संसदीय बहस की तुलना वैदिक-कालीन सामूहिक विचार-विमर्श से — यह सब comparative scholarly framework।

लेखक ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह तुलना anachronistic नहीं है — यद्यपि वैदिक ‘प्रजातन्त्र’ आधुनिक universal-suffrage-based democracy से भिन्न था (यह प्रायः elite/qualified-citizen-based था), किन्तु इसका मूल सिद्धान्त — कि शासन जन-सहमति पर आधारित होना चाहिए — एक authentic civilisational Indian value है।

आर्य समाज परम्परा के अनुरूप, ग्रंथ में यह भी argument प्रस्तुत किया गया है कि भारत को अपनी लोकतांत्रिक प्रणाली को पाश्चात्य आयात के रूप में देखने की बजाय, अपनी प्राचीन civilisational विरासत के पुनर्जागरण के रूप में देखना चाहिए, जो राष्ट्रीय आत्म-सम्मान एवं सांस्कृतिक निरन्तरता की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।

ग्रंथ की भाषा scholarly किन्तु accessible हिन्दी है, जिसमें वैदिक उद्धरणों का सटीक प्रयोग है। 110 पृष्ठीय आयाम विषय के comparative-scope के अनुरूप है।

राजनीति-विज्ञान के विद्यार्थियों, भारतीय इतिहास के अध्येताओं, आर्य समाज के साधकों, civics के शिक्षकों, संविधान-अध्ययन में रुचि रखने वाले पाठकों, तथा प्रत्येक उस सुधी नागरिक के लिए जो भारतीय प्रजातन्त्र की civilisational जड़ों को समझना चाहता है — प्राचीन भारत में प्रजातन्त्र का स्वरूप व आज का संसद एक विचारोत्तेजक scholarly संसाधन है।

पंडित भगवान् देव ने ग्रंथ के समापन में यह भी scholarly आह्वान किया है कि भारतीय शिक्षा-प्रणाली में civics एवं history के पाठ्यक्रम में इस civilisational दृष्टिकोण को उचित स्थान मिलना चाहिए, ताकि युवा पीढ़ी अपने लोकतांत्रिक मूल्यों को केवल आधुनिक constitutional framework के रूप में नहीं, अपितु एक गहरी civilisational विरासत के रूप में समझ सके। यह educational-policy-recommendation ग्रंथ को केवल historical analysis से आगे एक forward-looking civic-education-advocacy भी बनाता है।

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