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Paniniyah Ashtadhyayi Sutrapatha (Sanskrit) – ed. Pt. Brahmadatta Jigyasu | Panini Sanskrit Grammar

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पाणिनीयः अष्टाध्यायीसूत्रपाठः (Paniniyah Ashtadhyayi Sutrapathah), संपादक पण्डित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु द्वारा सम्पादित यह 88 पृष्ठीय Sanskrit scholarly ग्रंथ, महर्षि पाणिनि के समग्र अष्टाध्यायी-सूत्रों का एक authentic, systematic, तथा pedagogically-optimized संस्करण प्रस्तुत करता है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति Sanskrit व्याकरण-शिक्षा के लिए एक foundational एवं widely-trusted संसाधन है।

पण्डित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु — आर्य समाज परम्परा के एक प्रखर विद्वान् एवं Sanskrit-शिक्षण-methodology के innovator, जिनकी ‘The Tested Easiest Method for Learning and Teaching Sanskrit’ जैसी कृतियाँ भी प्रसिद्ध हैं — का यह सम्पादन-कार्य अष्टाध्यायी-सूत्र-पाठ को systematic, learner-friendly रूप में प्रस्तुत करने का एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है।

अष्टाध्यायी — संस्कृत व्याकरण का foundational text — लगभग 3959 सूत्रों में विभक्त, आठ अध्यायों (प्रत्येक चार पादों में विभक्त) में संगठित है। इसका systematic कण्ठस्थीकरण एवं अध्ययन Sanskrit-अध्ययन की एक अनिवार्य प्रारम्भिक प्रक्रिया रही है।

ग्रंथ की scholarly संरचना अष्टाध्यायी के मूल structure के अनुरूप है — प्रत्येक सूत्र मूल Sanskrit रूप में, देवनागरी में स्पष्ट मुद्रण के साथ, systematically arranged।

**प्रथम अध्याय** — संज्ञा एवं परिभाषा-सूत्रों से आरम्भ, जो पूरे व्याकरण-तंत्र की foundational terminology स्थापित करते हैं — गुण, वृद्धि, संधि, सन्नियोग जैसी categories। **द्वितीय अध्याय** — कारक-प्रकरण एवं समास-सूत्र। **तृतीय अध्याय** — कृत्-प्रत्यय-सूत्र। **चतुर्थ-पञ्चम अध्याय** — तद्धित-प्रत्यय-सूत्र। **षष्ठ-सप्तम अध्याय** — sandhi एवं अन्य phonological rules। **अष्टम अध्याय** — त्रिपादी खण्ड।

पण्डित जिज्ञासु की editorial-pedagogical methodology — उनके innovative teaching-philosophy के अनुरूप — सूत्रों को learner-friendly sequence एवं presentation में organized करती है, जो पारम्परिक गुरुकुलीय अध्ययन-पद्धति के साथ आधुनिक pedagogical sensibilities का समन्वय प्रस्तुत करती है।

**स्मरण-सहायक structural markers** — कहाँ नए अध्याय-पाद प्रारम्भ होते हैं, कहाँ महत्त्वपूर्ण rule-clusters हैं — यह सब visually clear organized है, जो स्मरण एवं systematic अध्ययन में सहायक है।

**Curriculum-relevance** — Sanskrit-shastri एवं आचार्य परीक्षाओं में अष्टाध्यायी-सूत्र-पाठ एक अनिवार्य component है, तथा यह edition उन examinations की तैयारी के लिए एक trusted foundational text है।

88 पृष्ठीय compact आयाम इसे एक portable, दैनिक स्वाध्याय के लिए सुगम संदर्भ-ग्रंथ बनाता है, जिसे विद्यार्थी नियमित रूप से अपने साथ रख सकते हैं।

Sanskrit के विद्यार्थियों, संस्कृत-shastri एवं आचार्य अभ्यर्थियों, वैदिक gurukulas के students एवं teachers, आर्य समाज के Sanskrit-शिक्षार्थियों, तथा प्रत्येक उस सुधी जिज्ञासु के लिए जो अष्टाध्यायी-सूत्रों का authentic, systematically-organized, तथा pedagogically-optimized पाठ चाहता है — पाणिनीयः अष्टाध्यायीसूत्रपाठः एक अनिवार्य foundational scholarly संसाधन है।

पण्डित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु ने ग्रंथ की भूमिका में यह भी scholarly विवेचन प्रस्तुत किया है कि क्यों systematic, error-free सूत्र-पाठ Sanskrit-अध्ययन की नींव है — यदि प्रारम्भिक चरण में ही सूत्रों का गलत पाठ अथवा क्रम सीख लिया जाए, तो आगे के complex grammatical-analysis में significant confusion उत्पन्न हो सकता है। यह foundational-pedagogical-concern ग्रंथ के careful, authentic सम्पादन के पीछे की प्रेरणा को स्पष्ट करता है, जो इसे नए Sanskrit-विद्यार्थियों के लिए एक particularly trustworthy प्रारम्भिक संसाधन बनाता है। यही कारण है कि यह संस्करण दशकों से Sanskrit-गुरुकुलों एवं आधुनिक शिक्षण-संस्थानों — दोनों में समान रूप से विश्वसनीय एवं लोकप्रिय बना हुआ है। नियमित अभ्यास से यह संस्करण संस्कृत-अध्ययन की नींव को अत्यंत सुदृढ़ बनाता है।

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