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Kanyopanayan Vidhi (Sanskrit–Hindi) – by Maharani Shankar Sharma | Girls Upanayan Sanskar Guide

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कन्योपनयनविधि (Kanyopanayanvidhi), विदुषी महारानी शंकर शर्मा द्वारा रचित यह 58 पृष्ठीय Sanskrit-Hindi द्वि-भाषी ग्रंथ, कन्याओं के उपनयन-संस्कार की shastric विधि का एक scholarly किन्तु अत्यंत व्यावहारिक प्रस्तुतीकरण करता है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति आर्य समाज परम्परा के स्त्री-शिक्षा-आंदोलन का एक concrete एवं ritually-authentic अभिव्यक्ति है।

**उपनयन-संस्कार** — पारम्परिक रूप से केवल पुत्रों के लिए किया जाने वाला संस्कार माना जाता रहा है, जिसमें यज्ञोपवीत-धारण एवं वेदारम्भ सम्मिलित है। किन्तु महर्षि दयानन्द सरस्वती ने अपनी ‘संस्कारविधि’ में यह scholarly स्थापित किया कि वैदिक काल में कन्याओं का भी उपनयन होता था — गार्गी, मैत्रेयी, लोपामुद्रा जैसी विदुषी स्त्रियाँ इसी वैदिक शिक्षा-परम्परा से उत्पन्न हुई थीं।

महारानी शंकर शर्मा ने अपने इस ग्रंथ में महर्षि की इस reformist दृष्टि को एक practical, ready-to-use ritual-manual के रूप में विस्तारित किया है। कन्याओं के लिए उपनयन-संस्कार का प्रामाणिक shastric आधार, इसकी आवश्यकता, इसका dharmic महत्त्व — इन सबका scholarly विवेचन ग्रंथ के प्रथम खण्ड में है।

**Vedic evidence** का scholarly प्रस्तुतीकरण भी ग्रंथ का एक महत्त्वपूर्ण अंश है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, एवं उपनिषदों से उन उद्धरणों का संकलन जो स्त्री-शिक्षा एवं स्त्री-उपनयन के vैदिक authenticity को स्थापित करते हैं। यास्क की निरुक्त एवं अन्य classical sources का भी reference दिया गया है।

**Practical ritual-procedure** का detailed step-by-step exposition ग्रंथ का central content है। संस्कार की उपयुक्त आयु, आवश्यक तैयारी, यज्ञ-वेदी की व्यवस्था, आवश्यक सामग्री, मन्त्र-पाठ का क्रम, यज्ञोपवीत-धारण-विधि, गुरु-आचार्य का चयन, वेदारम्भ की प्रक्रिया — यह सब authentic details।

**Contemporary application** पर विशेष व्यावहारिक बल दिया गया है — कैसे आधुनिक आर्य समाज परिवार अपनी पुत्रियों के लिए यह संस्कार authentically conduct कर सकते हैं, इसकी सरल किन्तु shastric-सत्यनिष्ठ मार्गदर्शिका।

**शैक्षणिक महत्त्व** का भी विवेचन है — कैसे यह संस्कार केवल एक ritual नहीं, अपितु एक symbolic commitment है — बालिका के औपचारिक वैदिक-शिक्षा-यात्रा के आरम्भ का प्रतीक, जो उसे वेदाध्ययन, संस्कृत-भाषा, तथा dharmic जीवन-मूल्यों की ओर प्रेरित करता है।

**सामाजिक निहितार्थ** भी scholarly रूप से explored हैं — कैसे यह संस्कार-पुनरुद्धार स्त्री-पुरुष-समानता के वैदिक सिद्धान्त को concrete रूप में प्रकट करता है, तथा आधुनिक gender-equality-discourse से भी resonate करता है, यद्यपि इसका मूल आधार पूर्णतया shastric है।

लेखिका ने अनेक ऐसे परिवारों के अनुभव भी साझा किए हैं जिन्होंने यह संस्कार सफलतापूर्वक conduct किया है, जो ग्रंथ को केवल theoretical discussion से आगे एक practically-tested guide बनाता है।

Sanskrit-Hindi द्वि-भाषी प्रस्तुति ग्रंथ को शास्त्र-निष्ठ पंडितों एवं सामान्य गृहस्थ-परिवारों — दोनों के लिए सुलभ बनाती है। 58 पृष्ठीय compact आयाम इसे एक practical ready-reference मैनुअल बनाता है।

आर्य समाज के परिवारों, स्त्री-शिक्षा में विश्वास रखने वाले माता-पिताओं, purohitों जो इस संस्कार को conduct करने में सक्षम होना चाहते हैं, gender-equality के dharmic आधार में रुचि रखने वाले researchers, तथा प्रत्येक उस परिवार के लिए जो अपनी पुत्री के लिए एक authentic वैदिक उपनयन-संस्कार आयोजित करना चाहता है — कन्योपनयनविधि एक अनिवार्य एवं trustworthy मार्गदर्शक है।

ग्रंथ के अंत में महारानी शंकर शर्मा ने कुछ frequently-asked-questions का भी scholarly उत्तर प्रस्तुत किया है — जैसे उपयुक्त आयु में variation, आधुनिक शिक्षा-प्रणाली के साथ इसका समन्वय, तथा कैसे इस संस्कार को स्कूली शिक्षा के साथ conflict के बिना conduct किया जाए। यह practical FAQ-section ग्रंथ की व्यावहारिक उपयोगिता को और अधिक बढ़ाता है, विशेष रूप से उन आधुनिक परिवारों के लिए जो पहली बार इस संस्कार को अपनाना चाहते हैं। इस प्रकार यह ग्रंथ theory एवं practice के बीच एक सेतु का कार्य करता है, जो महर्षि दयानन्द के सिद्धान्त को वास्तविक पारिवारिक जीवन में साकार करने में सहायक सिद्ध होता है।

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