Vedic Books

Hitopadesh (Sanskrit–Hindi) – ed. Udyanacharya | Classical Niti Katha Stories

70.00
29 people are viewing this right now
Estimated Delivery:
21 - 28 Jul, 2026
payment-processing
Guaranteed safe & secure checkout

Product details

हितोपदेश (Hitopadesh), आचार्य नारायण-परम्परा के विद्वान् उद्यनाचार्य द्वारा सम्पादित-व्याख्यात यह 168 पृष्ठीय Sanskrit-Hindi द्वि-भाषी ग्रंथ, भारतीय नीति-साहित्य के सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय क्लासिक ‘हितोपदेश’ का authentic संस्करण प्रस्तुत करता है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति व्यावहारिक जीवन-ज्ञान एवं नीति-शास्त्र की एक कालजयी कृति को नई पीढ़ी तक authentic रूप में पहुँचाने का प्रयास है।

‘हितोपदेश’ — ‘हित’ (कल्याण) + ‘उपदेश’ (शिक्षा) — अर्थात् ‘कल्याणकारी शिक्षा’ — नारायण पण्डित द्वारा रचित यह ग्रंथ पंचतंत्र की परम्परा में निर्मित एक स्वतंत्र किन्तु समान genre की कृति है। पारम्परिक कथा-कथन (storytelling) की पद्धति से नीति-शास्त्रीय wisdom प्रदान करना इसकी central methodology है — पशु-पक्षियों की कथाओं के माध्यम से मानव-स्वभाव, राजनीति, मित्रता, शत्रुता, एवं व्यावहारिक बुद्धिमत्ता की शिक्षा।

ग्रंथ की संरचना चार मुख्य खण्डों में विभक्त है — **मित्रलाभ** (मित्रता प्राप्ति के लाभ), **सुहृद्भेद** (मित्रता में विभाजन के कारण), **विग्रह** (शत्रुता एवं संघर्ष), **सन्धि** (शान्ति एवं समझौता)। यह चतुर्विध संरचना मानव-सामाजिक-जीवन के मूल dynamics को systematically explore करती है।

**मित्रलाभ** खण्ड की प्रसिद्ध कथाएँ — कौआ, चूहा, कछुआ एवं हिरण की मित्रता — दर्शाती हैं कि कैसे विविध स्वभाव एवं क्षमताओं वाले प्राणी परस्पर सहयोग से संकटों का सामना कर सकते हैं। यह teamwork एवं mutual-support का classical उदाहरण है।

**सुहृद्भेद** खण्ड में सिंह एवं बैल की कथा के माध्यम से यह दिखाया गया है कि कैसे दुष्ट सलाहकारों (जैसे सियार) की चालाकी अच्छी मित्रता को भी नष्ट कर सकती है — यह political intrigue एवं manipulation के खतरों की एक कालजयी चेतावनी है।

**विग्रह** एवं **सन्धि** खण्डों में राजनीति-शास्त्रीय wisdom प्रस्तुत की गई है — कब युद्ध करना चाहिए, कब शान्ति-वार्ता करनी चाहिए, कैसे शक्ति-संतुलन का आकलन करें — यह practical statecraft की शिक्षा।

ग्रंथ में embedded अनेक subhashitas (सुभाषित — नीति-वचन) भी हैं, जो संक्षिप्त किन्तु गहन जीवन-सत्य प्रस्तुत करते हैं। ‘उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः’ — प्रयत्न से ही कार्य सिद्ध होते हैं, कामनाओं से नहीं — यह प्रसिद्ध सूत्र भी हितोपदेश से ही है।

उद्यनाचार्य का scholarly सम्पादन मूल Sanskrit पाठ का authentic प्रस्तुतीकरण, प्रत्येक कथा का हिन्दी अनुवाद, तथा नैतिक शिक्षा का संक्षिप्त विवेचन प्रस्तुत करता है। यह त्रिविध संरचना ग्रंथ को बाल-शिक्षा एवं वयस्क scholarly अध्ययन — दोनों के लिए उपयोगी बनाती है।

शैक्षणिक महत्त्व की दृष्टि से हितोपदेश भारतीय शिक्षा-परम्परा का एक foundational text रहा है — यह न केवल नैतिक शिक्षा प्रदान करता है, अपितु संस्कृत भाषा-शिक्षण का भी एक classical माध्यम रहा है।

Sanskrit-Hindi द्वि-भाषी प्रस्तुति ग्रंथ को व्यापक पाठक-वर्ग के लिए सुलभ बनाती है। 168 पृष्ठीय आयाम कहानी-संग्रह की समृद्धता के अनुरूप है।

Sanskrit के विद्यार्थियों, बाल-शिक्षा में रुचि रखने वाले अभिभावकों, नीति-शास्त्र के अध्येताओं, संस्कृत-शिक्षकों, स्कूली पाठ्यक्रम के planners, तथा प्रत्येक उस सुधी पाठक के लिए जो भारतीय नीति-साहित्य की इस कालजयी कृति का authentic परिचय चाहता है — हितोपदेश एक कालातीत मूल्यवान संसाधन है।

ग्रंथ के अंत में उद्यनाचार्य ने कुछ अतिरिक्त प्रसिद्ध सुभाषितों का भी संकलन प्रस्तुत किया है, जो हितोपदेश की मूल कथाओं से बाहर भी, समान नीति-परम्परा से जुड़े हैं। यह supplementary content ग्रंथ की scholarly comprehensiveness को बढ़ाता है, तथा पाठकों को भारतीय नीति-साहित्य की व्यापक richness का एक representative परिचय प्रदान करता है। बच्चों एवं वयस्कों — दोनों के लिए समान रूप से प्रासंगिक यह ग्रंथ पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपनी प्रासंगिकता बनाए रखता आया है। इसी कारण हितोपदेश को भारतीय शिक्षा-परम्परा में एक अनिवार्य आधार-ग्रंथ का स्थान प्राप्त है, जो सदियों से अपरिवर्तित रूप से पीढ़ियों को मार्गदर्शन प्रदान करता आ रहा है। यही कालातीत प्रासंगिकता इसे विश्व-साहित्य की एक अमूल्य निधि बनाती है।

Enable Notifications OK No thanks