Geeta Sandesh (Hindi–Sanskrit) – by Swami Samarpananand Saraswati | Bhagavad Gita Commentary

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गीता सन्देश (Geeta Sandesh), आदरणीय स्वामी समर्पणानन्द सरस्वती द्वारा रचित यह 380 पृष्ठीय कृति, श्रीमद्भगवद्गीता के शाश्वत संदेश का एक प्रकाशमान विवेचन है। अमर स्वामी प्रकाशन द्वारा प्रस्तुत यह volume मूल संस्कृत श्लोकों के साथ प्रांजल हिन्दी अनुवाद एवं मनन-योग्य भाष्य प्रस्तुत करता है — जो गीता के दार्शनिक एवं आध्यात्मिक कोश को साधकों, छात्रों एवं वेदान्त के जिज्ञासुओं के लिए सुलभ बनाता है।
श्रीमद्भगवद्गीता को ‘सर्वोपनिषदो गावो’ कहा गया है — समस्त उपनिषदों का सार-तत्त्व। कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को प्रदत्त यह उपदेश केवल एक ऐतिहासिक संवाद नहीं — यह सनातन धर्म का व्यावहारिक दर्शन है, जो धर्म, कर्म, ज्ञान, भक्ति एवं मोक्ष के परम प्रश्नों का समाधान प्रस्तुत करता है। स्वामी समर्पणानन्द सरस्वती ने वेदान्त परम्परा में अपनी गहन निमज्जन तथा आचार्य-परम्परा से प्राप्त शास्त्र-दृष्टि के आधार पर प्रत्येक अध्याय का अंतर्भाव श्रद्धा एवं स्पष्टता के साथ उद्घाटित किया है।
यह भाष्य न तो शुष्क scholasticism है, न ही भावुक उद्बोधन मात्र; अपितु शास्त्रीय प्रामाण्य एवं ऋषि-दृष्टि पर आधारित गंभीर मनन है। प्रथम अध्याय के ‘विषाद योग’ में अर्जुन की नैतिक संकटावस्था से प्रारम्भ करके, यह विवेचन क्रमशः सांख्य योग, कर्म योग, ज्ञान-कर्म-संन्यास योग, आत्म-संयम योग, ज्ञान-विज्ञान योग, अक्षर-ब्रह्म योग, राज-विद्या-राज-गुह्य योग, विभूति योग, विश्वरूप-दर्शन योग, भक्ति योग, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विभाग योग, गुणत्रय-विभाग योग, पुरुषोत्तम योग, दैवासुर-सम्पद-विभाग योग, श्रद्धात्रय-विभाग योग — होते हुए अंत में ‘मोक्ष-संन्यास योग’ की परम-समन्वयात्मक भूमि तक पाठक को ले जाता है।
स्वामीजी ने गीता के मूल सिद्धान्तों — निष्काम कर्म, स्थितप्रज्ञ का लक्षण, आत्म-ज्ञान, ब्रह्म-निष्ठा, भक्ति का स्वरूप, त्रिगुणात्मिका प्रकृति, यज्ञ-दान-तप का त्रिविध भेद, शरणागति का परम रहस्य — इन सबका विस्तृत विवेचन shastric fidelity एवं contemporary clarity के साथ प्रस्तुत किया है। ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’, ‘सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज’, ‘समत्वं योग उच्यते’ — गीता के ऐसे महावाक्यों का जो विवेचन इस ग्रंथ में मिलता है, वह पारम्परिक भाष्य-परम्परा का सम्यक् सम्मान करते हुए साधक को व्यावहारिक मार्गदर्शन भी प्रदान करता है।
ग्रंथ की एक विशेष उपलब्धि यह है कि लेखक ने आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, ज्ञानेश्वर, तुलसीदास एवं तिलक के गीता-भाष्यों से भी संवाद किया है। साथ ही, स्वामी विवेकानन्द एवं श्री अरविन्द द्वारा प्रस्तुत आधुनिक गीता-दृष्टि के साथ भी सुसंगत समन्वय स्थापित किया गया है। यह comparative approach पाठक को गीता-व्याख्यान की समृद्ध परम्परा का दर्शन कराता है।
व्यावहारिक साधक के दृष्टिकोण से ग्रंथ अत्यंत उपयोगी है। प्रत्येक अध्याय के अंत में दिए गए मनन-बिन्दु, जीवन में गीता-सिद्धान्तों के application हेतु सूत्र, तथा सामान्य जिज्ञासाओं का समाधान — ये सब इसे केवल पठनीय नहीं, अपितु आचरणीय कृति बनाते हैं। गृहस्थ, ब्रह्मचारी, संन्यासी — सभी के लिए इसमें मार्गदर्शन है।
भाषा गरिमामयी हिन्दी-संस्कृत मिश्रित है, जो विषय की पवित्रता के अनुरूप है। मूल श्लोकों का देवनागरी प्रस्तुतीकरण, पद-च्छेद, अन्वय, अर्थ एवं भावार्थ — यह पंचविध संरचना अध्ययन को व्यवस्थित एवं फलप्रद बनाती है।
स्वाध्याय, पारायण, classroom teaching तथा आजीवन reflective study — सभी के लिए यह ग्रंथ उपयुक्त है। प्रातः सन्ध्या के समय गीता-पाठ करने वाले साधकों, गीता-अध्ययन कक्षा संचालित करने वाले आचार्यों, अगली पीढ़ी को गीता-संस्कार देने वाले अभिभावकों, तथा नैतिक संकटों के क्षणों में गीता का आश्रय लेने वाले प्रत्येक धर्मनिष्ठ पाठक के लिए यह ग्रंथ एक विश्वसनीय एवं श्रद्धेय साथी है। यह वेदान्तिक transmission की अखण्ड परम्परा को मौन गरिमा के साथ आगे बढ़ाने वाली एक स्थायी कृति है।
ग्रंथ की एक उल्लेखनीय विशेषता यह भी है कि लेखक ने गीता के व्यावहारिक प्रयोग पर विशेष बल दिया है। गृहस्थ जीवन में संकटों का सामना करते समय, कर्म-क्षेत्र में नैतिक दुविधाओं के क्षणों में, सम्बन्धों में संघर्ष के समय, अथवा आध्यात्मिक अन्वेषण की उच्च भूमि पर — गीता का सन्देश किस प्रकार मार्गदर्शक बन सकता है, इसकी सजीव प्रस्तुति प्रत्येक अध्याय में उपलब्ध है। यह केवल पुरातन ग्रंथ का विवेचन नहीं, अपितु जीवित परम्परा की वर्तमान सम्प्रेषण है। गीता-अध्ययन की एक सहस्राब्दियों पुरानी परम्परा है, जिसमें अनेक महान आचार्यों ने अपना योगदान दिया है — आदि शंकर से लेकर आधुनिक काल तक। स्वामी समर्पणानन्द सरस्वती की यह कृति उसी अखण्ड परम्परा में अपना स्थान बनाती है, उसका सम्मान करते हुए तथा अपनी स्वतंत्र विद्वत्तापूर्ण आवाज़ रखते हुए। प्रत्येक dharmic परिवार के पुस्तकालय में, प्रत्येक ज्ञान-पिपासु साधक की अध्ययन-वेदी पर, तथा प्रत्येक वेदान्त-जिज्ञासु के संग्रह में इस ग्रंथ का स्थान सुरक्षित होना चाहिए।
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