Devapi Aur Shantanu Ke Vedik Aakhyan Ka Vastavik Swaroop (Hindi) – by Shri Padmanabh Ji Niyam | Rigveda Reinterpretation

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देवापि और शान्तनु के वैदिक आख्यान का वास्तविक स्वरूप (Devapi Aur Shantanu Ke Vedik Aakhyan Ka Vastavik Swaroop), श्री पद्मनाभ जी नियम द्वारा रचित यह 62 पृष्ठीय हिन्दी ग्रंथ, ऋग्वेद में उल्लिखित देवापि-शान्तनु आख्यान की एक scholarly पुनर्व्याख्या प्रस्तुत करता है, जो pौराणिक interpretations से भिन्न महर्षि दयानन्द की वैदिक-यौगिक-अर्थ-पद्धति के आधार पर आयोजित है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति आर्य समाज परम्परा के Vedic-exegesis-methodology का एक focused case-study प्रस्तुत करती है।
ऋग्वेद के दशम मण्डल में ‘देवापि’ एवं ‘शान्तनु’ नामक दो व्यक्तित्वों से सम्बद्ध एक आख्यान मिलता है, जिसे परवर्ती पौराणिक साहित्य में अत्यंत elaborate mythological कथा के रूप में विस्तारित किया गया — देवापि को शान्तनु का बड़ा भाई बताया गया, जो कुष्ठ-रोग के कारण राज्य त्याग कर तपस्वी बन गया, एवं जब शान्तनु के राज्य में अनावृष्टि हुई, तो देवापि ने विशेष यज्ञ द्वारा वर्षा कराई — यह पौराणिक narrative महाभारत एवं अन्य पुराणों में विस्तार से मिलता है।
श्री पद्मनाभ जी नियम ने अपने scholarly अनुसन्धान में यह प्रश्न उठाया है — क्या यह elaborate mythological कथा मूल ऋग्वेदीय मन्त्रों (10.98) का authentic अर्थ है, अथवा यह परवर्ती काल की काल्पनिक अभिवृद्धि है? यह textual-critical प्रश्न आर्य समाज की Vedic-hermeneutics-tradition का एक central concern है।
ग्रंथ का प्रथम खण्ड मूल ऋग्वेदीय मन्त्रों का प्रामाणिक प्रस्तुतीकरण करता है, उनका शब्दशः पद-च्छेद एवं अन्वय। लेखक ने यह scholarly दर्शाया है कि मूल मन्त्रों में जो शब्द हैं — जैसे ‘देवापि’ एवं ‘शान्तनु’ — वे व्यक्ति-वाचक proper nouns नहीं, अपितु यौगिक (etymological) अर्थ वाले गुण-वाचक शब्द हो सकते हैं, जो प्राकृतिक अथवा आध्यात्मिक phenomena को इंगित करते हैं।
निरुक्त-पद्धति का application इस reinterpretation का scholarly आधार है। ‘देवापि’ — ‘देव’ (divine) + ‘आप्’ (to obtain/pervade) — का अर्थ ‘divine-pervading तत्त्व’ हो सकता है। ‘शान्तनु’ — ‘शम्’ (peace) + ‘तनु’ (body/extending) — शान्ति-प्रदायक तत्त्व। यह etymological analysis परवर्ती anthropomorphic कथा से भिन्न एक अधिक अमूर्त, natural-phenomena-केन्द्रित interpretation प्रस्तुत करती है।
लेखक ने यह scholarly तर्क भी प्रस्तुत किया है कि यह मन्त्र मूलतः वर्षा-प्रक्रिया के प्राकृतिक अथवा आध्यात्मिक aspects को describe कर रहे हैं, न कि किसी historical व्यक्ति-विशेष की कथा। यह interpretation महर्षि दयानन्द की व्यापक Vedic-hermeneutics-methodology के अनुरूप है, जो वेदों को historical narratives के बजाय eternal, universal truths का ग्रंथ मानती है।
पौराणिक elaboration की उत्पत्ति का scholarly विवेचन भी प्रस्तुत है — कैसे समय के साथ मूल अमूर्त वैदिक मन्त्रों को concrete narrative-form दे दी गई, यह Vedic-interpretation-history का एक व्यापक pattern है, जिसका यह ग्रंथ एक focused case-study प्रस्तुत करता है।
62 पृष्ठीय compact आयाम एक focused scholarly monograph के लिए appropriate है, जो एक specific textual-question पर केंद्रित गहन विवेचन प्रस्तुत करता है।
आर्य समाज के साधकों, Vedic-hermeneutics के researchers, comparative mythology के अध्येताओं, ऋग्वेद के विद्यार्थियों, तथा प्रत्येक उस सुधी पाठक के लिए जो वैदिक आख्यानों की महर्षि दयानन्द-प्रणीत scholarly पुनर्व्याख्या को समझना चाहता है — यह ग्रंथ एक मूल्यवान specialized संसाधन है।
लेखक ने ग्रंथ के अन्तिम अध्याय में यह भी scholarly तर्क प्रस्तुत किया है कि इस प्रकार की reinterpretation-methodology न केवल देवापि-शान्तनु आख्यान पर, अपितु ऋग्वेद के अन्य अनेक apparently mythological आख्यानों पर भी systematically लागू की जा सकती है। यह methodological-generalization ग्रंथ को केवल एक isolated case-study से आगे, एक व्यापक Vedic-hermeneutics-framework के प्रतिनिधि उदाहरण के रूप में स्थापित करता है, जो अन्य researchers के लिए भी एक उपयोगी methodological template प्रस्तुत करता है। यह scholarly पद्धति भावी शोधकर्ताओं के लिए एक प्रेरणादायक मॉडल प्रस्तुत करती है, जो वेदों के अन्य रहस्यमय आख्यानों की गहराई में उतरना चाहते हैं।
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