Bhartiya Shiksha Ka Darshnik Adhar (Hindi) – by Dr. Keerti Devi Seth | Indian Education Philosophy

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भारतीय शिक्षा का दार्शनिक आधार (Bhartiya Shiksha Ka Darshnik Adhar), विदुषी लेखिका डॉ. कीर्ति देवी सेठ द्वारा रचित यह 280 पृष्ठीय हिन्दी ग्रंथ, भारतीय शिक्षा-दर्शन की दार्शनिक नींव का एक systematic एवं scholarly अन्वेषण है। अमर स्वामी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह कृति इस मूल प्रश्न का गंभीर विवेचन प्रस्तुत करती है — भारतीय शिक्षा का स्वरूप क्या है, उसका लक्ष्य क्या है, तथा वह किन दार्शनिक सिद्धांतों पर प्रतिष्ठित है?
लेखिका ने वेद, उपनिषद्, श्रीमद्भगवद्गीता, स्मृतिग्रंथ तथा षड्दर्शनों — सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा एवं वेदान्त — के समस्त शिक्षा-संबंधी सूत्रों का गहन विश्लेषण किया है। यह वह दार्शनिक भूमि है जिस पर सहस्राब्दियों से भारतीय शैक्षणिक परम्परा अधिष्ठित रही है। पुस्तक का मूल प्रतिपाद्य यह है कि भारतीय शिक्षा केवल जीविकोपार्जन का साधन नहीं — यह ‘सा विद्या या विमुक्तये’ के सूत्र पर आधारित आत्म-साक्षात्कार की प्रक्रिया है।
ग्रंथ में गुरुकुल परम्परा, गुरु-शिष्य संबंध, ब्रह्मचर्याश्रम का स्वरूप, स्वाध्याय की पद्धति, श्रवण-मनन-निदिध्यासन की त्रिविध साधना, तथा विद्या के परा एवं अपरा भेद का विस्तृत विवेचन है। लेखिका ने यह दिखाया है कि किस प्रकार वैदिक शिक्षा-व्यवस्था में ज्ञान-प्राप्ति के साथ-साथ शील, संस्कार, धर्म-बोध एवं सत्य-निष्ठा को समान महत्त्व प्राप्त था। तक्षशिला, नालन्दा, विक्रमशिला, वलभी जैसे महान विश्वविद्यालयों की scholarly परम्परा का भी समीचीन वर्णन प्रस्तुत किया गया है।
षड्दर्शनों के शैक्षिक निहितार्थों का विवेचन इस कृति की एक विशेष उपलब्धि है। न्याय-दर्शन का तर्कशास्त्र, सांख्य का तत्त्व-विवेक, योग का चित्त-शुद्धि एवं संयम-साधना, वेदान्त का आत्म-ज्ञान — ये सभी शैक्षिक प्रक्रिया के विभिन्न आयामों को कैसे आलोकित करते हैं, यह डॉ. सेठ ने प्रामाणिक संस्कृत उद्धरणों के साथ स्पष्ट किया है। मीमांसा का कर्म-सिद्धान्त एवं वैशेषिक का पदार्थ-विवेचन भी शैक्षणिक methodology के सन्दर्भ में परीक्षित है।
लेखिका ने आधुनिक काल के महान चिंतकों — महर्षि दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द, श्री अरविन्द, महात्मा गांधी, रवीन्द्रनाथ टैगोर, मदन मोहन मालवीय — के शैक्षिक दर्शन का भी गंभीर अध्ययन प्रस्तुत किया है। महर्षि दयानन्द की ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में निरूपित शिक्षा-व्यवस्था, स्वामी विवेकानन्द का ‘man-making and character-building education’ का सूत्र, श्री अरविन्द की ‘integral education’ की दृष्टि — इन सबका दार्शनिक analysis ग्रंथ की चिंतन-धारा को समकालीन एवं प्रासंगिक बनाता है।
पुस्तक का एक महत्त्वपूर्ण आयाम है — आयातित शैक्षिक प्रतिमानों की विवेकपूर्ण समीक्षा। लेखिका ने यह रेखांकित किया है कि किस प्रकार 1835 के Macaulay Minute के पश्चात् भारतीय शिक्षा को उसकी मूल दार्शनिक भूमि से विच्छिन्न किया गया, तथा इसके दूरगामी सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक परिणाम क्या हुए। साथ ही, उन्होंने यह तर्क प्रस्तुत किया है कि वर्तमान शिक्षा-नीति को पुनः धर्म-मूलक, संस्कार-केन्द्रित एवं भारतीय ज्ञान-परम्परा से अनुप्राणित करना अत्यावश्यक है।
ग्रंथ की भाषा scholarly किन्तु सहज एवं सुगम्य है। संस्कृत-निष्ठ शब्दावली का प्रयोग विषय की गरिमा के अनुरूप है। प्रत्येक अध्याय में मूल संस्कृत उद्धरण, उनका हिन्दी अनुवाद, तथा दार्शनिक विवेचन — यह त्रिविध संरचना पाठक को विषय की गहराई तक ले जाती है।
शिक्षा-शास्त्र के विद्यार्थियों, शिक्षकों, शिक्षाविदों, नीति-निर्माताओं, शोधार्थियों एवं प्रत्येक उस सुधी पाठक के लिए जो भारतीय शिक्षा को उसकी authentic दार्शनिक नींव पर पुनः प्रतिष्ठित देखना चाहता है — यह ग्रंथ अपरिहार्य है। शिक्षा-दर्शन के विश्वविद्यालयीन पाठ्यक्रमों के लिए भी यह एक उत्तम reference work सिद्ध होगा। यह कृति एक मौन किन्तु दृढ़ स्मरण है — कि भारत की शिक्षा-दृष्टि किसी आयातित framework से अधिक प्राचीन, अधिक गहन एवं अधिक मानवीय है।
ग्रंथ की एक विशेषता यह भी है कि लेखिका ने केवल सिद्धान्त-निरूपण ही नहीं किया, अपितु व्यावहारिक applications पर भी विचार किया है। आज की कक्षा में, आज के शिक्षक की तैयारी में, आज के पाठ्यक्रम के निर्माण में — भारतीय शिक्षा-दर्शन के सिद्धान्त किस प्रकार सजीव रूप ले सकते हैं — इस प्रश्न पर ग्रंथ में सार्थक विमर्श है। योग, ध्यान, स्वाध्याय, मूल्य-शिक्षा, चरित्र-निर्माण — इन सबको आधुनिक शिक्षा-व्यवस्था में कैसे एकीकृत किया जा सकता है, इसकी एक रूपरेखा भी प्रस्तुत है। यह कृति न केवल philosophical inquiry की एक उपलब्धि है, अपितु शैक्षणिक नीति-निर्माण के लिए भी एक उपयोगी मार्गदर्शक है। वर्तमान काल में जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने भारतीय ज्ञान-परम्परा को पुनः केन्द्र में लाने का संकल्प किया है, तब इस प्रकार की scholarly कृतियाँ उस संकल्प को ठोस आधार प्रदान करती हैं। यह ग्रंथ शिक्षा-प्रशासकों, बी.एड. एवं एम.एड. के विद्यार्थियों, शिक्षा-शास्त्र के शोधार्थियों एवं प्रत्येक चिन्तनशील शिक्षक के लिए एक मूल्यवान संसाधन है।
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