Atharvavedakavyamrit – Set of 3 Books (Sanskrit–Hindi) – by Vijayvir Vedalankar | Atharvaveda Poetry Exposition

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अथर्ववेदकाव्यामृत (3 भागों का समुच्चय) — Atharvavedakavyamrit, विद्वान् श्री विजयवीर वेदालङ्कार द्वारा रचित यह 1563 पृष्ठीय Sanskrit-Hindi द्वि-भाषी ग्रंथ-समुच्चय, अथर्ववेद के मन्त्रों की काव्यात्मक एवं आध्यात्मिक ‘अमृत’-स्वरूप गहराई का एक अनुपम scholarly-cum-poetic exposition प्रस्तुत करता है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति अथर्ववेद-अध्ययन की एक विशिष्ट, aesthetic-sensitivity-युक्त परम्परा का प्रतिनिधित्व करती है।
‘काव्यामृत’ — ‘काव्य’ (poetry) + ‘अमृत’ (nectar/immortal essence) — यह शीर्षक स्वयं ग्रंथ की central methodology को इंगित करता है। श्री विजयवीर वेदालङ्कार ने अथर्ववेद के मन्त्रों को केवल grammatical-etymological exposition तक सीमित न रख कर, उनकी काव्यात्मक सुन्दरता, उनकी literary richness, तथा उनकी rasa-अनुभूति को भी scholarly तरीके से उजागर किया है।
यह approach अथर्ववेद-अध्ययन की एक valuable अतिरिक्त dimension प्रस्तुत करती है — जहाँ अधिकांश classical भाष्य primarily philosophical अथवा ritualistic exposition पर केन्द्रित रहते हैं, वहाँ यह ग्रंथ वैदिक साहित्य के aesthetic-poetic पक्ष को भी scholarly गंभीरता से explore करता है।
ग्रंथ के तीन भागों में अथर्ववेद के विभिन्न काण्डों के चयनित सूक्तों का काव्यात्मक विवेचन प्रस्तुत है। प्रत्येक सूक्त के लिए — मूल Sanskrit पाठ, हिन्दी अनुवाद (जो स्वयं काव्यात्मक शैली में रचा गया है), तथा उसके literary devices — उपमा, रूपक, अनुप्रास, ध्वनि-सौन्दर्य — का scholarly विश्लेषण प्रस्तुत है।
पृथ्वी-सूक्त का काव्यात्मक विवेचन विशेष रूप से उल्लेखनीय है — इसकी प्रकृति-चित्रण की सुन्दरता, इसके भावनात्मक गहराई, इसकी universal appeal — यह सब literary-critical दृष्टि से explored है, जो इस सूक्त की पर्यावरणीय-आध्यात्मिक महत्ता को एक नए आयाम में प्रस्तुत करता है।
विवाह-सूक्तों (काण्ड 14) का काव्यात्मक विवेचन भी ग्रंथ का एक प्रकाशमान अंश है — गार्हस्थ्य-जीवन की मंगल-कामनाओं की काव्यात्मक अभिव्यक्ति, दाम्पत्य-प्रेम एवं पारिवारिक सद्भाव की भावनात्मक गहराई का scholarly-cum-aesthetic विवेचन।
रोग-निवारक मन्त्रों में निहित काव्यात्मक imagery का भी विश्लेषण है — कैसे रोग को metaphorically ‘शत्रु’ के रूप में चित्रित किया गया है, कैसे स्वास्थ्य-प्राप्ति की कामना को poetic language में व्यक्त किया गया है।
श्री विजयवीर वेदालङ्कार की scholarly-poetic sensibility ग्रंथ की एक विशेष उपलब्धि है — उन्होंने classical Sanskrit alankara-shastra (rhetoric) के principles को Vedic mantra-analysis में लागू किया है, जो एक innovative interdisciplinary approach है।
छन्द-सौन्दर्य का विश्लेषण भी ग्रंथ में है — अथर्ववेद के विभिन्न छन्दों (अनुष्टुप्, त्रिष्टुप्, जगती) की rhythmic beauty एवं उनका भाव-अभिव्यक्ति के साथ सम्बन्ध।
आध्यात्मिक-दार्शनिक सूक्तों का काव्यात्मक विवेचन भी comprehensive है — ब्रह्म-विद्या से सम्बन्धित सूक्तों की transcendent poetic quality, जो उनकी philosophical गहराई के साथ-साथ उनकी aesthetic sublimity को भी उजागर करती है।
1563 पृष्ठीय यह 3-भागीय समुच्चय अथर्ववेद-अध्ययन की एक comprehensive, बहु-आयामी यात्रा प्रस्तुत करता है — जहाँ scholarly rigor एवं aesthetic appreciation का सुन्दर संगम है।
Sanskrit काव्य-शास्त्र के विद्यार्थियों, अथर्ववेद के अध्येताओं, comparative literature के researchers, Vedic-poetics में रुचि रखने वाले scholars, आर्य समाज के साधकों, तथा प्रत्येक उस सुधी पाठक के लिए जो अथर्ववेद की काव्यात्मक-आध्यात्मिक गहराई का एक अनुपम scholarly परिचय चाहता है — अथर्ववेदकाव्यामृत एक मूल्यवान एवं अद्वितीय संसाधन है।
ग्रंथ के अंत में लेखक ने यह भी scholarly तुलना प्रस्तुत की है कि अथर्ववेद की काव्यात्मक शैली संस्कृत के परवर्ती classical काव्य-परम्परा (कालिदास, भारवि, माघ) से किस प्रकार भिन्न है, तथा फिर भी किस प्रकार उसने उस परवर्ती परम्परा के बीज तत्त्वों को अपने भीतर समाहित किया हुआ है। यह comparative-literary-history-perspective ग्रंथ को Sanskrit काव्य-शास्त्र के evolutionary अध्ययन के लिए भी एक मूल्यवान contribution बनाता है, जो विशुद्ध धार्मिक अध्ययन से आगे साहित्यिक इतिहास के क्षेत्र में भी प्रासंगिक है। इस प्रकार यह त्रि-भागीय समुच्चय अथर्ववेद-अध्ययन को एक बहु-आयामी, समृद्ध एवं स्थायी रूप से स्मरणीय अनुभव बना देता है।
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