Manusmriti(मनुस्मृति) by Dr. Surendra kumar

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मनु स्मृति आर्यों की मुख्य आचार- संहिता है। ‘मनु स्मृति ‘ नाम सुनते ही प्रत्येक आर्य के मन में इस ग्रन्थ को पढ़ने और समझने की जिज्ञासा उतपन्न होती है । महर्षि मनु ने अपने पुत्र भृगु को और भृगु ने अपने शिष्यो को इसका उपदेश दिया । महर्षि मनु ने सम्यक समाज – सरचना के लिए वर्ण व्यवस्था दी । जीवन की पूर्ण सफलता के लिए आश्रम -व्यवस्था की स्थापना की । ब्रह्मचर्य आश्रम विधाध्ययन के लिए, गृहस्थ आश्रम संतान – वृद्धि के लिए, वानप्रस्थ समाज सेवा के लिए और संन्यास आश्रम ईश्वर चिंतन के लिए है है । प्रत्येक आश्रमी के लिए आचार -विचार के नियम विस्तारपूर्वक निशिचत किये है । गृहस्थ आश्रम वंश और समाज के पालन के लिए है। घर आया हुआ अतिथि भूखा नहीं जाना चाहिए । दान अवश्य दे ; किन्तु पात्र – कुपात्र का निश्चय करके । मनु – स्मृति में यग्यो पर विशेष ध्यान दिया गया है मनु ने सात्विक यज्ञों को ही मान्यता दी है ; किन्तु कालान्तर में मांस – भोजी ब्राह्मणों ने यज्ञ और श्राद्ध में मांस परोसने की व्यववस्था देने वाले प्रक्षेपक जोड़ दिये है । इस कारण गत दो तीन सदियो से मनु के मासाहार होने का विवाद चल रहा है । किन्तु विद्वान् टीकाकार ने अपनी पैनी दृष्टि , सूक्ष्म विवेक और विस्तृत अनुभव के आधार पर उनका खंडन किया है । हमें आशा ही नहीं, अपितु पूर्ण विश्वास है कि हमारे सुधि पाठक प्रस्तुत ग्रन्थ का अध्ययन करके ” मनु स्मृति ” के वास्तविक स्वरूप और सिद्धान्तों का ज्ञान प्राप्त करेगे और तदनुरूप आचरण करते हुए सुखी और दीर्घ जीवन प्राप्त करेगे तथा चतुवर्ग फल प्राप्ति के अधिकारी बनेगे ।
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