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Atharvaveda Bhashya – Set of 9 Books (Sanskrit–Hindi) – by Vishwanath Vidyalankar | Complete Atharvaveda Commentary

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अथर्ववेद भाष्य (9 भागों का समुच्चय) — Atharvaveda Bhashya, विख्यात् वैदिक scholar श्री विश्वनाथ विद्यालंकार द्वारा रचित यह 3100 पृष्ठीय Sanskrit-Hindi द्वि-भाषी महाग्रंथ-समुच्चय, अथर्ववेद के सम्पूर्ण मन्त्र-राशि का एक comprehensive, authoritative एवं scholarly भाष्य प्रस्तुत करता है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह monumental कृति आधुनिक हिन्दी वेद-भाष्य-साहित्य की सर्वाधिक विशाल एवं comprehensive उपलब्धियों में से एक है।

अथर्ववेद — चारों वेदों में से सर्वाधिक practical एवं लोक-प्रिय — इसकी विशेषता है कि यह केवल यज्ञ-कर्मकाण्ड तक सीमित नहीं, अपितु दैनिक जीवन के व्यावहारिक पक्षों — स्वास्थ्य, चिकित्सा, राजनीति, सामाजिक संगठन, पारिवारिक जीवन, तथा आध्यात्मिक उन्नयन — इन सभी विषयों को अपने विशाल मन्त्र-संग्रह में समाहित करता है। लगभग 20 काण्डों में विभक्त, 730 सूक्तों एवं लगभग 6000 मन्त्रों वाला यह वेद अपनी thematic diversity में अद्वितीय है।

श्री विश्वनाथ विद्यालंकार का यह 9-भागों का भाष्य-समुच्चय इस विशाल Vedic corpus का mantra-by-mantra, systematic, scholarly विवेचन प्रस्तुत करता है। प्रत्येक भाग विशिष्ट काण्डों को cover करता है, जिससे पाठक क्रमबद्ध रूप से समस्त अथर्ववेद का गहन अध्ययन कर सकता है।

प्रत्येक मन्त्र के लिए ग्रंथ में provided है: मूल Sanskrit पाठ (देवनागरी में, स्वराङ्कन सहित), पद-च्छेद (word-division), अन्वय (syntactic arrangement), शब्दशः हिन्दी अनुवाद, तथा scholarly व्याख्या जो मन्त्र के गूढ़ अर्थ को उजागर करती है। यह comprehensive पंचविध संरचना ग्रंथ को scholar एवं सामान्य साधक — दोनों के लिए सुलभ बनाती है।

लेखक की interpretive methodology महर्षि दयानन्द सरस्वती की वैदिक-यौगिक-अर्थ-पद्धति पर आधारित है — जहाँ वेद-शब्दों के pौराणिक anthropomorphic अर्थों के बजाय उनके मूल etymological एवं philosophical अर्थों को प्राथमिकता दी गई है। यह methodology अथर्ववेद के अनेक मन्त्रों को — जो सतही रूप से magical अथवा superstitious प्रतीत हो सकते हैं — एक rational, scientific एवं spiritual light में पुनर्व्याख्यायित करती है।

चिकित्सा-सम्बन्धी मन्त्रों (भैषज्य-सूक्त) का scholarly विवेचन विशेष रूप से उल्लेखनीय है — ज्वर, यक्ष्मा, कुष्ठ, विष-प्रभाव, मानसिक व्याधियों से सम्बन्धित मन्त्रों की rational-scientific व्याख्या, जो आयुर्वेद के foundational sources में से एक मानी जाती है।

राजनीति एवं समाज-संगठन से सम्बन्धित मन्त्रों (राष्ट्र-सूक्त, सभा-समिति-सूक्त) का विवेचन भी ग्रंथ का एक मूल्यवान अंश है — यह वैदिक शासन-व्यवस्था एवं civic-organization के principles को उजागर करते हैं।

पृथ्वी-सूक्त (काण्ड 12) का विस्तृत scholarly विवेचन — यह प्रसिद्ध सूक्त, जो पर्यावरणीय चेतना का प्राचीनतम दस्तावेज़ माना जाता है, इसकी गहन आध्यात्मिक-पारिस्थितिक व्याख्या ग्रंथ का एक प्रकाशमान खण्ड है।

विवाह, गृह-निर्माण, संतान-प्राप्ति, तथा अन्य गार्हस्थ्य-जीवन से सम्बन्धित मन्त्रों का भी comprehensive विवेचन है, जो अथर्ववेद की practical-lifecycle-orientation को दर्शाता है।

ब्रह्म-विद्या-सम्बन्धी दार्शनिक सूक्तों (काण्ड 10, 11) का गहन वेदान्तिक विवेचन भी ग्रंथ में है, जो अथर्ववेद की आध्यात्मिक गहराई को उजागर करता है।

3100 पृष्ठीय विशाल आयाम, 9 भागों में विभक्त संरचना — यह महाग्रंथ-समुच्चय एक lifetime scholarly investment है, जो एक comprehensive Vedic library का केन्द्र-बिन्दु बन सकता है।

Vedic literature के advanced researchers, अथर्ववेद specialists, आयुर्वेद के विद्यार्थियों (चिकित्सा-मन्त्रों के लिए), आर्य समाज के साधकों, वैदिक gurukulas के acharyas, Sanskrit-Vedic Universities के faculty, तथा प्रत्येक उस serious जिज्ञासु के लिए जो अथर्ववेद के सम्पूर्ण वैभव का comprehensive scholarly अध्ययन चाहता है — अथर्ववेद भाष्य (9 भाग) एक indispensable ultimate scholarly संसाधन है।

इस भाष्य-समुच्चय की एक विशेष उपलब्धि यह है कि श्री विश्वनाथ विद्यालंकार ने अथर्ववेद के उन मन्त्रों को भी scholarly गंभीरता के साथ explored किया है जिन्हें प्रायः पाश्चात्य Indologists द्वारा ‘magical’ अथवा ‘superstitious’ के रूप में खारिज कर दिया जाता है। उन्होंने evidence-based scholarly तर्क के साथ यह दर्शाया है कि यह मन्त्र वास्तव में rational, psychological, अथवा medicinal principles पर आधारित हैं, जिन्हें उनके ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संदर्भ में सही ढंग से समझने की आवश्यकता है। यह interpretive-defense ग्रंथ को केवल एक translation से आगे एक genuine scholarly advocacy भी बनाती है, जो अथर्ववेद की civilisational गरिमा को पुनःस्थापित करने का प्रयास करती है।

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