Anandmay Path Ki Aur (Hindi) – by Shanno Bhatia | Vedic Path To Bliss

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आनन्दमय पथ की ओर, विदुषी शन्नो भाटिया द्वारा रचित यह 134 पृष्ठीय हिन्दी ग्रंथ, वैदिक आध्यात्मिक परम्परा में निहित आनन्द-प्राप्ति के मार्ग का scholarly किन्तु सहज-सुगम विवेचन प्रस्तुत करता है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति उस civilisational दृष्टि को उजागर करती है कि मानव-जीवन का अंतिम लक्ष्य आनन्द-प्राप्ति है, एवं यह आनन्द बाह्य भोग-विलास में नहीं, अपितु आन्तरिक आध्यात्मिक साधना में निहित है।
‘आनन्द’ — तैत्तिरीय उपनिषद् का प्रसिद्ध सूत्र ‘आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्’ (आनन्द ही ब्रह्म है) — यह ग्रंथ की दार्शनिक भूमि है। शन्नो भाटिया ने इस उपनिषदीय सत्य को आधुनिक गृहस्थ-साधक के जीवन में practical रूप से उतारने का प्रयास किया है।
ग्रंथ के प्रथम खण्ड में ‘सुख’ एवं ‘आनन्द’ का scholarly भेद उद्घाटित किया गया है। सुख temporary, sensory, बाह्य-वस्तु-आधारित अनुभूति है — जो अपने विपरीत दुःख से घिरा हुआ है। आनन्द इसके विपरीत एक स्थायी, आन्तरिक, आत्म-आधारित अनुभूति है — जो द्वंद्वातीत है। यह foundational distinction साधक को सही दिशा में निर्देशित करता है।
पंच-कोश सिद्धान्त — तैत्तिरीय उपनिषद् का यह framework — ग्रंथ का दार्शनिक केन्द्र है। अन्न-मय, प्राण-मय, मनो-मय, विज्ञान-मय, आनन्द-मय — यह पाँच कोश क्रमशः स्थूल से सूक्ष्मतर होते जाते हैं, एवं आनन्द-मय कोश — जो आत्मा के सर्वाधिक निकट है — साधना का ultimate goal है।
व्यावहारिक साधना-मार्ग का scholarly विवेचन ग्रंथ का central content है। नियमित उपासना, प्राणायाम, ध्यान, स्वाध्याय — यह चतुर्विध दैनिक साधना-क्रम का practical मार्गदर्शन। साथ ही, सत्संग का महत्त्व, सद्आचरण के मानदण्ड, संतोष एवं तप की भूमिका — यह सब भी विवेचित है।
लेखिका ने gृहस्थ-जीवन में आनन्द-प्राप्ति की व्यावहारिकता पर विशेष बल दिया है। career, family, social responsibilities — इन सबके बीच कैसे आनन्दमय जीवन-शैली विकसित की जा सकती है, यह sensitive practical guidance ग्रंथ की एक विशेषता है।
तनाव-प्रबंधन एवं मानसिक शान्ति के वैदिक सिद्धान्तों का भी विवेचन है — कैसे प्राचीन वैदिक ज्ञान आधुनिक mental-wellbeing challenges का समाधान प्रस्तुत कर सकता है। भगवद्गीता के समत्व-योग का brief reference भी इस संदर्भ में दिया गया है।
आर्य समाज परम्परा के अनुरूप, ग्रंथ में ईश्वर-प्रणिधान का वैदिक एकेश्वरवादी दृष्टिकोण भी रेखांकित है — कैसे ईश्वर के प्रति सच्ची श्रद्धा एवं समर्पण साधक को आनन्द के निकट ले जाता है।
ग्रंथ में स्त्री-साधिकाओं के लिए विशेष sensitivity है — घरेलू जिम्मेदारियों के बीच साधना का समय कैसे निकालें, मानसिक शान्ति कैसे बनाए रखें — यह practical wisdom शन्नो भाटिया के अपने अनुभव से प्रसूत प्रतीत होती है।
ग्रंथ की भाषा सरल, आत्मीय हिन्दी है। 134 पृष्ठीय compact आयाम इसे दैनिक स्वाध्याय के लिए ideal बनाता है।
आध्यात्मिक जिज्ञासुओं, गृहस्थ-साधकों, विशेष रूप से महिला-पाठकों, तनाव-प्रबंधन में रुचि रखने वाले आधुनिक professionals, आर्य समाज के साधकों, एवं प्रत्येक उस सुधी पाठक के लिए जो जीवन में स्थायी आनन्द की खोज में एक sympathetic एवं शास्त्र-सम्मत मार्गदर्शक चाहता है — आनन्दमय पथ की ओर एक मूल्यवान संसाधन है।
ग्रंथ में शन्नो भाटिया ने यह भी scholarly विवेचन प्रस्तुत किया है कि कैसे आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति सुख-आनन्द के भेद को धुंधला कर देती है, तथा लोग बाह्य वस्तुओं में स्थायी संतोष खोजते रह जाते हैं। इस critique के साथ-साथ, लेखिका सकारात्मक वैकल्पिक जीवन-शैली भी प्रस्तुत करती हैं — संयमित उपभोग, कृतज्ञता-भाव, सेवा-वृत्ति — जो आनन्दमय जीवन के व्यावहारिक स्तंभ हैं। यह contemporary-relevance ग्रंथ को आज के पाठकों के लिए विशेष रूप से meaningful बनाती है। अंततः लेखिका यह स्थापित करती हैं कि आनन्दमय जीवन कोई दूरस्थ लक्ष्य नहीं, अपितु प्रत्येक दिन की छोटी-छोटी सजग choices से निर्मित होने वाली एक जीवन-शैली है, जो प्रत्येक गृहस्थ की पहुँच में है। यह पुस्तक विशेष रूप से उन गृहणियों के लिए एक आत्मीय साथी है जो अपने दैनिक कर्तव्यों के बीच भी आध्यात्मिक उन्नयन की आकांक्षा रखती हैं, और इसे लेखिका ने पूर्ण सहानुभूति के साथ सम्बोधित किया है।
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