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निर्णय के तट पर | Nirnay Ke Tat Par (शास्त्रार्थ ग्रंथ)

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Description

“निर्णय के तट पर” एक ऐतिहासिक शास्त्रार्थ-ग्रंथ है जिसमें सन् 1923 में उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जनपद के कचौरा स्थान पर आयोजित एक महत्वपूर्ण वैचारिक वाद-विवाद का विवरण प्रस्तुत किया गया है। इस शास्त्रार्थ का मुख्य विषय था — “क्या परमेश्वर निराकार है?” यह प्रश्न भारतीय दर्शन, वैदिक परंपरा तथा धर्मशास्त्रीय चिंतन में सदैव महत्वपूर्ण रहा है।

इस ग्रंथ में आर्यसमाज के विद्वान पण्डित बिहारीलाल शास्त्री तथा पौराणिक पक्ष के व्याकरणाचार्य पण्डित चन्द्रशेखर जी के बीच हुए तर्क-वितर्क को विस्तार से प्रस्तुत किया गया है। दोनों पक्षों ने अपने-अपने मत को वेद, दर्शन, भाष्य और धार्मिक ग्रंथों के आधार पर सिद्ध करने का प्रयास किया। यह संवाद केवल धार्मिक मतभेद का उदाहरण नहीं, बल्कि उस काल में चल रहे वैचारिक पुनर्जागरण और दार्शनिक विमर्श का भी प्रतीक है।

आर्यसमाज आंदोलन के संस्थापक महर्षि दयानन्द सरस्वती ने वैदिक सिद्धांतों के आधार पर निराकार, सर्वव्यापक और सर्वज्ञ परमेश्वर की अवधारणा को स्थापित करने का प्रयास किया था। उनके विचारों ने भारतीय समाज में धार्मिक सुधार और वैचारिक पुनर्निर्माण को प्रेरित किया।

इस पुस्तक में शास्त्रार्थ के माध्यम से वेदांत, कर्म सिद्धांत, श्राद्ध परंपरा, उपासना-विधि तथा ईश्वर के स्वरूप जैसे जटिल विषयों पर तार्किक और दार्शनिक चर्चा प्रस्तुत की गई है। यह ग्रंथ पाठकों को यह समझने में सहायता करता है कि भारतीय धार्मिक परंपरा में मतभेद केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि ज्ञान, तर्क और शास्त्रीय प्रमाणों पर आधारित विमर्श का परिणाम भी होते हैं।

शास्त्रार्थ के पश्चात उस क्षेत्र में आर्यसमाज के प्रभाव और वैचारिक जागृति का वर्णन भी इस ग्रंथ में मिलता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि धार्मिक संवाद और बौद्धिक चर्चा समाज के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

यह पुस्तक विशेष रूप से उन पाठकों के लिए उपयोगी है जो आर्यसमाज आंदोलन, वैदिक दर्शन, भारतीय धार्मिक इतिहास और दार्शनिक वाद-विवाद की परंपरा को समझना चाहते हैं। विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और आध्यात्मिक जिज्ञासुओं के लिए यह एक महत्वपूर्ण अध्ययन सामग्री के रूप में उपयोगी सिद्ध हो सकती है।

समग्र रूप से, “निर्णय के तट पर” केवल एक शास्त्रार्थ का विवरण नहीं, बल्कि भारतीय धार्मिक-दार्शनिक चिंतन की जीवंत परंपरा का साक्ष्य प्रस्तुत करने वाला एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। यह पाठकों को तर्कपूर्ण चिंतन, शास्त्रीय अध्ययन और सत्य की खोज के प्रति प्रेरित करता है।

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