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Yaskiya Nighantu – Shlokikrit (Sanskrit–Hindi) – by Pt. Yudhishthir Mimansak | Vedic Lexicon Verse Edition

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याष्किय-निघण्टु (श्लोकीकृत) — Yaskiya Nighantu (Shlokikrit), पंडित युधिष्ठिर मीमांसक द्वारा सम्पादित यह Sanskrit-Hindi द्वि-भाषी scholarly ग्रंथ, प्राचीन Vedic lexical work ‘निघण्टु’ का एक अनूठा ‘श्लोकीकृत’ (verse-form में recast किया गया) संस्करण प्रस्तुत करता है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति निघण्टु की प्राचीन शब्द-सूची को स्मरणीय काव्य-रूप में प्रस्तुत करने वाली एक pedagogically-innovative कृति है।

**’निघण्टु’** — Sanskrit lexicographical tradition का सर्वाधिक प्राचीन extant text — Vedic vocabulary का systematic compilation है, जो लगभग 1770 Vedic words को थीमेटिक groups में organize करता है। पारम्परिक रूप से यह prose-सदृश list-form में उपलब्ध है, किन्तु पंडित मीमांसक ने इसे ‘श्लोकीकृत’ — verse-form में recast — किया है।

**’श्लोकीकरण’ की methodology** — prose-लिस्ट को classical Sanskrit metres (अनुष्टुप् प्रमुखतः) में recast करना, जिससे यह material memorization एवं oral transmission के लिए significantly अधिक सुगम बन जाती है। यह genre Sanskrit scholarly tradition की एक प्रसिद्ध pedagogical technique है — जैसे अमरकोश जैसे शब्द-कोश भी श्लोक-रूप में हैं।

ग्रंथ की संरचना निघण्टु के मूल 5 अध्यायों के अनुरूप है — **नैघण्टुक काण्ड** (synonymous word-groups — पृथ्वी, आकाश, वायु, अग्नि, जल के पर्यायवाची), **द्वितीय-तृतीय काण्ड** (अन्य semantic groups, particles), **चतुर्थ काण्ड** (ऐकपदिक शब्द), **दैवत काण्ड** (Vedic देवताओं का catalog)।

**Semantic-richness का काव्यात्मक प्रस्तुतीकरण** — पृथ्वी के 21 पर्यायवाची, जल के लगभग 100 पर्यायवाची — इस प्रकार की rich Vedic vocabulary को अब स्मरणीय श्लोक-रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो वेद-पाठियों एवं Sanskrit-विद्यार्थियों के लिए स्मरण को सुगम बनाता है।

**Pedagogical advantages** — verse-form की rhythmic quality, इसकी metrical structure, तथा इसकी concise nature — यह सब कण्ठस्थ करने की प्रक्रिया को अत्यंत सुगम बनाते हैं, जो पारम्परिक गुरुकुलीय शिक्षा-पद्धति के अनुरूप है।

पंडित मीमांसक की scholarly-cum-poetic कुशलता इस ग्रंथ में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है — उन्होंने मूल निघण्टु की scholarly authenticity को बनाए रखते हुए, इसे एक नए, अधिक accessible format में प्रस्तुत किया है।

Sanskrit-Hindi द्वि-भाषी प्रस्तुति ग्रंथ को व्यापक readership के लिए सुलभ बनाती है।

Sanskrit-shastri एवं आचार्य अभ्यर्थियों, वेद-पाठियों, वैदिक gurukulas के students, निघण्टु-निरुक्त के अध्येताओं, Sanskrit-teacher-trainers, तथा प्रत्येक उस सुधी जिज्ञासु के लिए जो प्राचीन Vedic lexical-tradition को एक स्मरणीय, pedagogically-optimized काव्य-रूप में सीखना चाहता है — याष्किय-निघण्टु (श्लोकीकृत) एक अनूठा एवं मूल्यवान scholarly संसाधन है।

पंडित मीमांसक ने ग्रंथ की भूमिका में यह भी scholarly विवेचन प्रस्तुत किया है कि क्यों verse-form में lexical material को प्रस्तुत करना पारम्परिक गुरुकुलीय शिक्षा-पद्धति के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है — मौखिक-स्मरण-आधारित शिक्षा-प्रणाली में यह तकनीक सहस्राब्दियों से प्रभावी सिद्ध हुई है। यह methodological-justification ग्रंथ को केवल एक isolated textual-experiment से आगे, Sanskrit pedagogical-tradition के व्यापक अध्ययन में एक meaningful contribution बनाती है।

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