Yajurvediya Maitrayini Samhita (Sanskrit, Rare) – by Shripad Damodar Satvalekar | Krishna Yajurveda Edition

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यजुर्वेदीय मैत्रायणी संहिता (Yajurvediya Maitrayini Samhita), विख्यात् वेदाचार्य श्री पद्म दामोदर सातवलेकर द्वारा सम्पादित यह 568 पृष्ठीय दुर्लभ संस्कृत महाग्रंथ, कृष्ण यजुर्वेद की मैत्रायणी शाखा का एक civilisational रत्न है। अमर स्वामी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह rare book वेदाध्ययन-परम्परा के एक अत्यंत प्राचीन एवं scholarly महत्त्व-पूर्ण text को आधुनिक scholar-साधक तक पहुँचाने का एक मूल्यवान प्रयास है।
यजुर्वेद की दो मुख्य शाखाएँ हैं — शुक्ल यजुर्वेद एवं कृष्ण यजुर्वेद। कृष्ण यजुर्वेद को ‘कृष्ण’ (अर्थात् मिश्रित अथवा अव्यवस्थित) इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें मन्त्र (संहिता-भाग) एवं ब्राह्मण (व्याख्यानात्मक भाग) दोनों एक-साथ संग्रहित हैं — शुक्ल यजुर्वेद के विपरीत, जहाँ ये पृथक् हैं। कृष्ण यजुर्वेद की चार प्रमुख शाखाएँ हैं — तैत्तिरीय, मैत्रायणी, कठ, कपिष्ठल। इनमें मैत्रायणी संहिता की विशेष scholarly प्रतिष्ठा है, क्योंकि यह तैत्तिरीय की भाँति प्रचलित नहीं — और इसी दुर्लभता के कारण यह specially valuable भी है।
मैत्रायणी संहिता का नाम ‘मैत्रेय’ ऋषि से सम्बद्ध है — एक प्राचीन वैदिक ऋषि-परम्परा से जुड़ी यह शाखा, गुजरात-महाराष्ट्र-राजस्थान के क्षेत्रीय वैदिक संरक्षण-परम्परा का एक स्तंभ रही है। आधुनिक संस्कृत scholarship में मैत्रायणी संहिता का अध्ययन ऋग्वेद के पश्चात् सर्वाधिक प्राचीन वैदिक स्तर के text-स्वरूप किया जाता है। इसकी भाषा, शैली, मन्त्र-संरचना — यह सब अत्यंत प्राचीन वैदिक काल का साक्षी है।
संहिता की संरचना चार ‘काण्डों’ में विभाजित है, जिनमें कुल मिला कर 4 अष्टकों एवं 54 अध्यायों में सहस्रों वैदिक मन्त्र संग्रहित हैं। ये मन्त्र विभिन्न यज्ञों — दर्श-पूर्णमास, चातुर्मास्य, अग्निष्टोम, ज्योतिष्टोम, राजसूय, अश्वमेध — के लिए विधि-विधान-स्वरूप हैं। साथ ही, मन्त्रों के अतिरिक्त उनके ‘विनियोग’ (application) एवं उनके अर्थ की संक्षिप्त व्याख्या (जो ब्राह्मण-भाग की प्रकृति की है) — दोनों एक साथ उपलब्ध हैं।
श्री पद्म दामोदर सातवलेकर (1867-1968) — उन्हीं विद्वान् के कार्य का यह एक अमूल्य अंश है, जिन्होंने स्वाध्याय मण्डल (पारडी) के माध्यम से वेदाध्ययन के पुनर्जागरण की एक civilisational परम्परा स्थापित की। उनके सम्पादन की विशेषता है — मूल पाठ की scholarly शुद्धता, स्वराङ्कन का सावधानीपूर्वक संरक्षण, structural संगठन की पारदर्शिता, एवं dharmic gravitas का सम्मान।
इस संस्करण में मूल मैत्रायणी संहिता के संस्कृत मन्त्र देवनागरी लिपि में मुद्रित हैं। प्रत्येक मन्त्र की scholarly प्रामाणिकता बनाए रखी गई है — पाठ-भेद, स्वराङ्कन, structural चिह्न — यह सब authentic vedic recitation-परम्परा के अनुरूप है। यह संस्करण पारम्परिक pandit-गणों एवं आधुनिक scholarly researchers — दोनों के लिए उपयोगी है।
मैत्रायणी संहिता का scholarly महत्त्व बहु-आयामी है। प्रथम — comparative Vedic textual studies के लिए यह primary source है। तैत्तिरीय एवं मैत्रायणी शाखाओं के बीच पाठ-भेद, मन्त्र-क्रम, स्वर-परिवर्तन — यह सब Vedic philology का एक रोचक विषय है। द्वितीय — Indo-European linguistics के दृष्टिकोण से मैत्रायणी की भाषा अत्यंत प्राचीन वैदिक स्तर की है, जिसका अध्ययन भारतीय भाषा-इतिहास के लिए अमूल्य है। तृतीय — कर्मकाण्ड-परम्परा के दृष्टिकोण से यह संहिता प्राचीन यज्ञ-विधियों का प्रामाणिक संरक्षक है।
ऐतिहासिक रूप से मैत्रायणी संहिता की उपलब्धता क्रमशः घटती गई है। आधुनिक काल में बहुत कम ऐसे प्रकाशन हैं जो इस text को authentic स्वरूप में प्रस्तुत करते हैं। ‘rare book’ का चिह्न इसी ऐतिहासिक दुर्लभता को रेखांकित करता है। इस संस्करण की उपलब्धता वेद-विद्या के संरक्षण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण योगदान है।
scholarly readers के लिए मैत्रायणी संहिता एक treasure trove है। प्रसिद्ध मन्त्र — जैसे ‘त्र्यम्बकं यजामहे’ का प्राचीन रूप, ‘पुरुष-सूक्त’ का variant पाठ, ‘गायत्री’ मन्त्र की sister-versions, अनेक अल्प-ज्ञात किन्तु महत्त्वपूर्ण स्तोत्र — यह सब इस संहिता में उपलब्ध हैं।
संस्कृत साहित्य-शास्त्र के दृष्टिकोण से भी मैत्रायणी की भाषिक विशेषताएँ रोचक हैं। प्राचीन छन्द — गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप्, जगती — के natural उदाहरण; स्वर-वैचित्र्य; vedic syntactic structures — यह सब philological अध्ययन के लिए मूल्यवान सामग्री है।
प्रकाशकीय गुणवत्ता विषय की वैदिक गरिमा के अनुरूप है। 568 पृष्ठीय यह scholarly एडीशन durable hardcover में प्रस्तुत है, जो दीर्घकालीन उपयोग एवं संरक्षण के लिए उपयुक्त है। 800 रुपए मूल्य scholarly value के अनुरूप एक उचित investment है।
यह संहिता संस्कृत में है, अतः इसका प्रत्यक्ष अध्ययन उन्हीं scholar-साधकों के लिए सम्भव है जिन्हें संस्कृत भाषा एवं वैदिक स्वराङ्कन की पर्याप्त समझ है। तथापि, मन्त्रों का स्वाध्याय एवं पारायण उन सभी के लिए लाभकारी है जो वैदिक संस्कृति के प्रति आदर रखते हैं।
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Amar Swami Prakashan| Vedickarts
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