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Yadukul Ka Itihas (Hindi) – by Ramdev Babu Yadav | Yadav Lineage & Heritage

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यदुकुल का इतिहास (Yadukul Ka Itihas), विद्वान् इतिहासकार श्री रामदेव बाबू यादव द्वारा रचित यह 320 पृष्ठीय हिन्दी ग्रंथ, यदुवंश की वैदिक एवं पौराणिक परम्परा से लेकर आधुनिक काल तक की विस्तृत ऐतिहासिक यात्रा का एक comprehensive विवेचन है। अमर स्वामी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह कृति यादव समुदाय के civilisational, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक योगदान को scholarly तरीके से उद्घाटित करती है।

यदुवंश भारतीय civilisational इतिहास की सर्वाधिक प्राचीन एवं प्रतिष्ठित क्षत्रिय कुल-परम्पराओं में से एक है। यदु — चन्द्रवंशी क्षत्रिय कुल के संस्थापक, राजा ययाति के ज्येष्ठ पुत्र — से प्रारम्भ होकर यह वंश-धारा सहस्राब्दियों तक भारत के सांस्कृतिक एवं राजनीतिक जीवन में एक central भूमिका निभाती रही है। श्री रामदेव बाबू यादव ने इसी विस्तृत वंशानुक्रम का scholarly chronicling प्रस्तुत किया है।

ग्रंथ का प्रथम खण्ड यदुकुल की वैदिक एवं पौराणिक उत्पत्ति का scholarly विवेचन प्रस्तुत करता है। ऋग्वेद में ‘यदु’ के उल्लेख, चन्द्रवंशीय क्षत्रिय परम्परा में यदु का स्थान, राजा ययाति की कथा एवं उनके पाँच पुत्रों — यदु, तुर्वसु, द्रुह्यु, अनु, पुरु — के बीच राज्य-विभाजन, यदु को मातृभूमि में स्थापना — इन सब का प्रामाणिक विवरण प्राथमिक संस्कृत स्रोतों — ऋग्वेद, महाभारत, पुराण-साहित्य — के आधार पर प्रस्तुत है।

ग्रंथ का सर्वाधिक गौरवपूर्ण खण्ड भगवान् श्रीकृष्ण को समर्पित है। श्रीकृष्ण — यदुकुल के सर्वोच्च पुरुष, अवतार-स्वरूप, गीता-वक्ता, द्वारकाधीश — का जीवन एवं उनकी civilisational महत्ता ग्रंथ के केन्द्र-स्थल पर है। उनका जन्म मथुरा में, बाल्य गोकुल-वृन्दावन में, युवावस्था में कंस-वध, यादवों के साथ द्वारका-प्रस्थान, द्वारका-नगरी की स्थापना, महाभारत में पाण्डवों के सहायक एवं मार्गदर्शक, श्रीमद्भगवद्गीता का दिव्य उपदेश, यादव-कुल का अंतिम परिणाम — इस सम्पूर्ण जीवन-यात्रा का scholarly किन्तु भक्ति-संवेदी विवेचन है।

यादव वंश के अन्य प्रमुख व्यक्तित्व — वासुदेव, उग्रसेन, बलराम, सुभद्रा, सात्यकि, उद्धव, अक्रूर — इन सब का परिचय एवं उनकी ऐतिहासिक भूमिका ग्रंथ में दर्ज है। यादव समाज की वैदिक काल में राजनीतिक संगठन-क्षमता, उनकी martial परम्परा, उनकी सांस्कृतिक उपलब्धियाँ — यह सब scholarly तरीके से प्रकाशित है।

मध्यकालीन यादव इतिहास का खण्ड भी मूल्यवान है। 12वीं-14वीं शताब्दी का देवगिरि का यादव साम्राज्य — जो दक्षिण भारत की एक प्रमुख हिन्दू शक्ति था — का historical विवरण विशेष महत्त्वपूर्ण है। राजा भिल्लम, राजा सिंघण, राजा रामचन्द्र — इन यादव राजाओं की उपलब्धियाँ, उनकी प्रशासनिक कुशलता, उनके सांस्कृतिक संरक्षण-कार्य, मराठी-कन्नड़ साहित्य के विकास में उनका योगदान, अल्लाउद्दीन ख़िलजी के विरुद्ध अंतिम संघर्ष — यह सब scholarly तरीके से प्रस्तुत है।

उत्तर भारत के यादव-इतिहास का अध्याय भी समावेशी है। मथुरा, ब्रज-भूमि, हरियाणा, राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में यादव समुदाय का प्रसार, उनकी क्षेत्रीय भूमिकाएँ, स्थानीय शासकों के साथ उनके सम्बन्ध, मुस्लिम काल में हिन्दू समाज की रक्षा में उनका योगदान — इन सब विषयों का historical chronicling है।

मराठा-काल में यादव योगदान का scholarly उल्लेख है। होलकर वंश — मल्हार राव होलकर एवं अहल्याबाई होलकर के नेतृत्व में — एक यादव-धंगर परिवार से आरम्भ होकर भारत की सर्वाधिक प्रतिष्ठित मराठा शक्तियों में से एक बना। अहल्याबाई होलकर का धार्मिक-सांस्कृतिक कार्य — काशी विश्वनाथ मन्दिर का जीर्णोद्धार, सोमनाथ का पुनर्निर्माण, अनेक तीर्थों का संरक्षण — एक civilisational उपलब्धि है, जिसका विशेष विवेचन ग्रंथ में है।

स्वातंत्र्य संग्राम में यादव योगदान भी रेखांकित है। 1857 के विद्रोह में यादव सैनिकों की भूमिका, गांधीयुग में यादव नेताओं का समाज-सुधार-कार्य, स्वतंत्र भारत में यादव कृषक-समाज की भूमिका — इन सबका scholarly उल्लेख है।

समकालीन यादव-समाज का परिचय भी ग्रंथ का एक भाग है। आधुनिक भारत के राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक जीवन में यादवों का स्थान, क्षेत्रीय राजनीति में उनकी भूमिका, शिक्षा-व्यवसाय-व्यवस्था में उनकी प्रगति — यह सब वर्तमान-केन्द्रित अध्यायों में आता है।

गोत्र-व्यवस्था एवं उप-समूह-संरचना का अध्याय भी समाज-शास्त्रीय दृष्टि से मूल्यवान है। यादव समाज के विभिन्न उप-कुल — अहीर, ग्वाला, गोप, घोसी, सदगोप, कोनार, यदुवंशी क्षत्रिय एवं अन्य — इनकी उत्पत्ति, क्षेत्रीय वितरण, सांस्कृतिक विशेषताएँ — इन सबका विवरण है।

लेखक ने अपने अनुसन्धान में संस्कृत प्राथमिक स्रोत — महाभारत, हरिवंश, श्रीमद्भागवत, विष्णु पुराण, गर्ग संहिता; मराठी एवं कन्नड़ historical सूत्र; मुस्लिम-काल के फ़ारसी chronicles; ब्रिटिश-काल की gazetteers; तथा contemporary historical scholarship — इन सब का व्यापक उपयोग किया है।

ग्रंथ की भाषा scholarly हिन्दी है। तर्क-प्रवाह व्यवस्थित एवं प्रमाण-पुष्ट है। 320 पृष्ठीय यह कृति विषय की scope के अनुरूप एक संतुलित आयाम प्रस्तुत करती है।

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