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Vedic Siddhanta Mimansa – Set of 2 Books (Hindi) – by Pt. Yudhishthir Mimansak | Vedic Philosophy Critical Study

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वैदिक सिद्धान्त मीमांसा (2 भागों का समुच्चय) — Vedic Siddhanta Mimansa, पंडित युधिष्ठिर मीमांसक द्वारा रचित यह 800 पृष्ठीय हिन्दी scholarly ग्रंथ-समुच्चय, वैदिक दर्शन के foundational सिद्धान्तों की एक comprehensive, systematic, तथा critical-analytical मीमांसा (examination) प्रस्तुत करता है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति वैदिक दर्शन-शास्त्र के advanced अध्येताओं के लिए एक rigorous scholarly resource है।

‘मीमांसा’ — ‘गहन विचार-विमर्श एवं critical examination’ — इस शीर्षक का central methodology इंगित करती है कि यह ग्रंथ वैदिक सिद्धान्तों को केवल presentation नहीं, अपितु rigorous critical-scholarly परीक्षण के साथ प्रस्तुत करता है, जो evidence, तर्क, तथा comparative analysis पर आधारित है।

ग्रंथ का प्रथम भाग वेद-प्रामाण्य-सिद्धान्त की गहन मीमांसा प्रस्तुत करता है — वेद अपौरुषेय क्यों हैं, उनकी eternal authority का क्या shastric एवं logical आधार है, यह प्रश्न विभिन्न दार्शनिक दृष्टिकोणों (मीमांसा, न्याय, वेदान्त) के परिप्रेक्ष्य से explored है।

**ईश्वर-तत्त्व-मीमांसा** — वैदिक एकेश्वरवाद का rigorous scholarly विवेचन। ईश्वर के सच्चिदानन्द-स्वरूप, निराकारत्व, सर्वव्यापकत्व, न्यायकारित्व — इन गुणों का shastric एवं तार्किक establishment। अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत, तथा आर्य समाज के त्रैत-वाद — इन विभिन्न दार्शनिक positions की comparative critical मीमांसा।

**जीव-तत्त्व-मीमांसा** — आत्मा की अनादिता, उसकी नैतिक स्वतंत्रता, कर्म-फल-सिद्धान्त, पुनर्जन्म — इन विषयों का rigorous दार्शनिक विवेचन।

**प्रकृति-तत्त्व-मीमांसा** — सांख्य-दर्शन के प्रकृति-सिद्धान्त के साथ वैदिक सृष्टि-विज्ञान का समन्वय। पंच-महाभूत, त्रिगुण, महत्तत्त्व, अहंकार — इन सृष्टि-प्रक्रिया के concepts का scholarly विवेचन।

द्वितीय भाग में वैदिक epistemology (प्रमाण-मीमांसा) का विस्तृत विवेचन है — प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द — चारों प्रमाणों का scholarly विवेचन, तथा शब्द-प्रमाण के अंतर्गत वेद की सर्वोच्च authority का establishment।

**कर्म-सिद्धान्त की मीमांसा** — कर्म-फल-व्यवस्था का scholarly विश्लेषण, इसकी justice-theoretical implications, तथा दैव-पुरुषकार के मध्य के सम्बन्ध का rigorous विवेचन।

**मोक्ष-स्वरूप की मीमांसा** — विभिन्न दार्शनिक परम्पराओं में मोक्ष की विभिन्न definitions का comparative critical अध्ययन — क्या यह केवल दुःख-निवृत्ति है, अथवा एक positive आनन्द-अवस्था; क्या यह व्यक्तित्व-विलय है, अथवा व्यक्तित्व-continuation के साथ मुक्ति।

**यज्ञ-सिद्धान्त की मीमांसा** — यज्ञ-कर्म का दार्शनिक rationale, इसकी scientific एवं spiritual significance, तथा इसकी सामाजिक भूमिका का rigorous विवेचन।

पंडित युधिष्ठिर मीमांसक की scholarly शैली — जैसा कि उनका नाम भी indicate करता है — विशेष रूप से rigorous, evidence-based, तथा critically-analytical है। उन्होंने प्रत्येक सिद्धान्त को केवल assert नहीं किया, अपितु उसके पक्ष-विपक्ष तर्कों का systematic परीक्षण किया है।

**अन्य दार्शनिक traditions के साथ comparative विवेचन** भी ग्रंथ का एक मूल्यवान अंश है — बौद्ध, जैन, तथा पाश्चात्य philosophical traditions के साथ वैदिक सिद्धान्तों की तुलना, जो ग्रंथ को व्यापक philosophical scope प्रदान करती है।

800 पृष्ठीय comprehensive आयाम, 2-भागीय संरचना — यह ग्रंथ-समुच्चय वैदिक दर्शन के foundational सिद्धान्तों की एक rigorous, authoritative critical मीमांसा प्रस्तुत करता है।

दर्शनशास्त्र के advanced विद्यार्थियों, आर्य समाज के साधकों, comparative philosophy के researchers, वेदान्त-दर्शन के अध्येताओं, संस्कृत-वेद-शास्त्र के scholars, तथा प्रत्येक उस serious जिज्ञासु के लिए जो वैदिक सिद्धान्तों की rigorous critical scholarly मीमांसा चाहता है — वैदिक सिद्धान्त मीमांसा (2 भाग) एक indispensable संसाधन है।

पंडित मीमांसक ने ग्रंथ के समापन में यह भी स्पष्ट किया है कि उनकी critical-मीमांसा-पद्धति का उद्देश्य किसी परम्परा को खारिज करना नहीं, अपितु प्रत्येक सिद्धान्त को उसकी सम्पूर्ण scholarly rigor के साथ समझना है, ताकि साधक एक blind faith की बजाय एक informed, reasoned विश्वास पर आधारित आध्यात्मिक यात्रा तय कर सके। यह intellectual honesty ग्रंथ की एक विशेष scholarly विशेषता है, जो इसे mere apologetics से distinguished बनाती है। यह दृष्टिकोण आधुनिक शिक्षित पाठक-वर्ग के लिए विशेष रूप से आकर्षक सिद्ध होता है।

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