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Vedartha Kalpdrum (Hindi–Sanskrit, 3 Volumes) – by Acharya Vishuddhanand Mishra Shastri | Ved Bhashya Mahagrantha

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वेदार्थ कल्पद्रुम (3 खण्ड) — Vedartha Kalpdrum (3 Volumes), विख्यात् वेद-भाष्यकार आचार्य विशुद्धानन्द मिश्र शास्त्री द्वारा रचित यह 1950 पृष्ठीय त्रि-खण्डात्मक हिन्दी-संस्कृत महाग्रंथ, वेदार्थ-निर्धारण के क्षेत्र की एक स्मारकीय उपलब्धि है। अमर स्वामी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह कृति ‘कल्पद्रुम’ (कल्पवृक्ष) के नाम से ही अपनी सम्पन्नता एवं अभीष्ट-दात्री प्रकृति को सार्थक करती है — जिस प्रकार पौराणिक कल्पवृक्ष समस्त मनोवांछित फलों को प्रदान करता है, उसी प्रकार यह ग्रंथ वेदार्थ-जिज्ञासु के समस्त विद्या-संदेहों का समाधान प्रदान करता है।

आचार्य विशुद्धानन्द मिश्र शास्त्री — संस्कृत-वेद-शास्त्र के एक प्रखर scholar, जिनकी विद्वत्ता के सम्मुख आधुनिक काल का academic establishment भी श्रद्धानत है — ने अपने जीवन-साधना के सार-तत्त्व को इस त्रि-खण्डात्मक कृति में निहित किया है। 1950 पृष्ठों का यह विशाल आयाम, तीन volumes में विभाजित comprehensive structure, एवं scholarly गहराई — यह सब इस ग्रंथ को आधुनिक हिन्दी वेद-भाष्य-साहित्य की एक landmark कृति बनाते हैं।

प्रथम खण्ड में आचार्यजी ने वेदार्थ-निर्धारण के मूल सिद्धान्तों का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया है। वेद क्या हैं? उनका स्वरूप क्या है? उनकी interpretative methodology कैसी होनी चाहिए? परम्परागत भाष्यकारों — यास्क, शौनक, सायण, उव्वट, महीधर, स्कन्दस्वामी, माधव — की कौन-सी पद्धति किस सन्दर्भ में अधिक उपयुक्त है? वेद-मन्त्रों के विभिन्न अर्थ-स्तरों — पाठगत, व्याकरण-सम्मत, निरुक्त-आधारित, ब्राह्मण-ग्रन्थ-संगत, उपनिषदीय, अध्यात्मिक — का sophisticated विश्लेषण किस प्रकार किया जाए? — इन सब प्रश्नों का scholarly समाधान प्रथम खण्ड में उपलब्ध है।

द्वितीय खण्ड वेद-शब्दार्थ का एक systematic कोश-स्वरूप विवेचन प्रस्तुत करता है। वेदों के प्रमुख शब्दों — जिनके अर्थ में परम्परागत एवं आधुनिक भाष्यकारों के बीच मतभेद रहा है — का comprehensive विवेचन यहाँ है। ‘इन्द्र’, ‘अग्नि’, ‘सोम’, ‘पूषन्’, ‘मरुत्’, ‘अदिति’, ‘पुरुष’, ‘विष्णु’, ‘रुद्र’ — इन प्रमुख देव-वाचक शब्दों के विविध अर्थ-सम्भावनाओं का scholarly परीक्षण; ‘यज्ञ’, ‘देव’, ‘ऋत्’, ‘सत्यम्’, ‘वसु’, ‘धन’, ‘गौ’, ‘अश्व’ — इन सामान्य शब्दों के वैदिक विशेष-अर्थों का विवेचन; ‘अमृत’, ‘अमर’, ‘देवयान’, ‘पितृयाण’ — इन आध्यात्मिक शब्दों की गहन व्याख्या — यह सब द्वितीय खण्ड को एक अनुपम वैदिक शब्दार्थ-कोश बना देती है।

तृतीय खण्ड में वेद-मन्त्रों के group-wise विवेचन हैं — सूक्त-समूहों, स्तोत्र-गुच्छों, theme-based चयनों का scholarly विश्लेषण। पुरुष-सूक्त, नासदीय-सूक्त, हिरण्यगर्भ-सूक्त, गायत्री-मन्त्र, महामृत्युञ्जय-मन्त्र, श्री-सूक्त, पुरुष-मेध-सूक्त, अघमर्षण-सूक्त, ब्रह्मणस्पति-सूक्त — इन प्रसिद्ध एवं गहन सूक्तों का mantra-by-mantra गहन विवेचन इस खण्ड का वैभव है। साथ ही, यजुर्वेद के अध्याय-केन्द्रित विवेचन, अथर्ववेद के विशिष्ट सूक्तों का परीक्षण, सामवेद के गायन-केन्द्रित मन्त्रों की प्रस्तुति — यह सब तृतीय खण्ड को encyclopedia-स्वरूप बनाते हैं।

आचार्यजी की interpretative methodology का एक विशेष आयाम है — परम्परा एवं नवोन्मेष का scholarly संतुलन। उन्होंने प्राचीन भाष्यकारों के विवेचन को सम्मानपूर्वक उद्धृत किया है, उनके योगदान को रेखांकित किया है, साथ ही जहाँ-कहीं उनसे विभेद करना आवश्यक प्रतीत हुआ, वहाँ scholarly तर्क एवं प्रामाणिक evidence के साथ अपनी स्वतंत्र दृष्टि प्रस्तुत की है। यह दृष्टिकोण आधुनिक scholarship के standards के अनुरूप है — न तो आँख मूँद कर परम्परा का अनुसरण, न ही पाश्चात्य Indology-style की detached मनोवृत्ति।

ग्रंथ का एक उल्लेखनीय वैशिष्ट्य है — सायण-भाष्य के साथ scholarly संवाद। सायणाचार्य का वेद-भाष्य परम्परागत वैदिक scholarship का सर्वोच्च स्तंभ है, किन्तु आधुनिक काल के कई विद्वानों ने उनकी कुछ व्याख्याओं पर प्रश्न उठाए हैं। आचार्य मिश्र शास्त्री ने इन प्रश्नों पर balanced एवं evidence-based विचार प्रस्तुत किया है — कहाँ सायण की व्याख्या स्वीकार्य है, कहाँ alternative प्रस्तावित किया जा सकता है, और किस आधार पर।

महर्षि दयानन्द सरस्वती के ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ एवं उनकी interpretative principles का सम्मानपूर्वक उल्लेख एवं उनसे scholarly संवाद भी ग्रंथ में दृष्टिगोचर होता है। आचार्यजी ने महर्षि के ‘वेदोऽखिलो धर्ममूलम्’ सिद्धान्त को स्वीकार किया है, उनकी निरुक्त-आधारित यौगिक-व्याख्यान-पद्धति का सम्मान किया है।

व्याकरण-शास्त्र, निरुक्त, छन्द-शास्त्र, ज्योतिष — वेदाङ्गों के scholarly application का इस ग्रंथ में अनुपम उदाहरण मिलता है। पाणिनीय व्याकरण के सूत्रों का वैदिक भाषा-विश्लेषण में प्रयोग, यास्क-निरुक्त की methodological मार्गदर्शिता, पिङ्गल के छन्द-सूत्रों का वैदिक छन्द-शास्त्र में उपयोग — यह सब आचार्यजी की scholarly कुशाग्रता का परिचायक है।

3000 रुपए मूल्य का यह त्रि-खण्डात्मक ग्रंथ-समुच्चय investment के दृष्टिकोण से भी अमूल्य है। 1950 पृष्ठों की scholarship, three volumes की structural संगठनता, hardcover printing की durability, एवं subject-matter की civilisational महत्ता — यह सब इसे एक collector’s item एवं scholar’s lifelong reference बनाते हैं।

ग्रंथ की भाषा scholarly हिन्दी-संस्कृत है। मूल वेद-मन्त्र देवनागरी में, उनका पद-च्छेद, अन्वय, हिन्दी अनुवाद, एवं विस्तृत vivechan — यह पंचविध संरचना अध्ययन को systematic एवं फलप्रद बनाती है।

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