Ved Vaichitrya (Hindi–Sanskrit) – by Pandit Omkar Mishra Pranav | Vedic Literature Survey

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वेद वैचित्र्य (Ved Vaichitrya), विद्वान् वैदिक scholar पंडित ओंकार मिश्र ‘प्रणव’ द्वारा रचित यह 496 पृष्ठीय हिन्दी-संस्कृत ग्रंथ, वेदों की अनुपम विविधता, गहराई एवं scholarly बहु-आयामिता का एक comprehensive विवेचन है। अमर स्वामी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह कृति ‘वेद वैचित्र्य’ — अर्थात् वेदों का वैचित्र्य अथवा अद्भुत बहुरंगिता — को विभिन्न दृष्टिकोणों से उद्घाटित करती है।
वेद — चारों — ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद — मानव सभ्यता के सर्वाधिक प्राचीन ज्ञान-कोश हैं। इन्हें ‘अपौरुषेय’, ‘सनातन’, ‘श्रुति’ की संज्ञा प्राप्त है। किन्तु वेदों की महत्ता केवल उनकी प्राचीनता में नहीं — उनकी अनुपम विविधता, उनकी सर्व-समावेशी दृष्टि, उनके अनेक-स्तरीय अर्थ-सम्भावनाओं में निहित है। यह ‘वैचित्र्य’ ही ग्रंथ का मूल विषय है।
ग्रंथ का प्रथम खण्ड वेदों के स्वरूप, उनके विभाजन, उनकी संहिता-ब्राह्मण-आरण्यक-उपनिषद् रूपी चतुर्विध संरचना, तथा उनकी विभिन्न शाखाओं का scholarly परिचय प्रस्तुत करता है। ऋग्वेद की दश मण्डलों की संरचना, यजुर्वेद की शुक्ल एवं कृष्ण शाखाएँ, सामवेद का गायन-तत्त्व, अथर्ववेद की लोक-प्रिय एवं व्यावहारिक प्रकृति — इन सब का systematic विवेचन है।
विषय-वैचित्र्य ग्रंथ का एक प्रमुख आयाम है। वेदों में प्राप्त होने वाले विविध विषय — ईश्वर-स्तुति, यज्ञ-कर्म, औषधि एवं चिकित्सा, खगोल-विज्ञान, गणित, भू-विज्ञान, राजनीति, सामाजिक संगठन, परिवार-व्यवस्था, स्त्री-गरिमा, युद्ध-विद्या, संगीत, साहित्य, दर्शन, अध्यात्म, मनोविज्ञान, जीव-सृष्टि का विज्ञान — यह सर्व-समावेशी ज्ञान-राशि वेदों को ‘सर्व-विद्या-मूल’ सिद्ध करती है।
देवता-मीमांसा का अध्याय विशेष रूप से प्रकाशमान है। वेद-मन्त्रों में जो विभिन्न देवता-नाम — इन्द्र, अग्नि, सूर्य, वरुण, मित्र, सोम, सरस्वती, उषा, अदिति, मरुत् — आते हैं, उनका वास्तविक तात्पर्य क्या है? क्या ये pluralistic devatas हैं अथवा एक ही ईश्वर के विविध गुण-कर्म-वाचक नाम? पंडित प्रणव ने वैदिक ‘एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति’ सिद्धान्त के आलोक में इस प्रश्न का गहन विवेचन प्रस्तुत किया है।
मन्त्रों के बहु-स्तरीय अर्थ — आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक — का sophisticated विश्लेषण ग्रंथ की एक विशेष उपलब्धि है। एक ही मन्त्र को विभिन्न परिप्रेक्ष्यों से कैसे समझा जा सकता है, यह दिखाने के लिए लेखक ने प्रसिद्ध वेद-मन्त्रों — गायत्री, पुरुष-सूक्त, नासदीय-सूक्त, हिरण्यगर्भ-सूक्त, पुरुष-मेध-सूक्त — को illustrative उदाहरण के रूप में परीक्षित किया है।
वैज्ञानिक वैचित्र्य पर एक रोचक खण्ड है। आधुनिक विज्ञान के अनेक concepts — atomic theory, gravitational force, light’s properties, planetary motion, embryology — के मूल किस प्रकार वैदिक मन्त्रों एवं उपनिषदों में निहित हैं, यह दिखाने का scholarly प्रयास है। यह दृष्टिकोण न तो jingoistic है, न ही apologetic; अपितु evidence-based तुलना पर अधिष्ठित है।
भाषा-वैचित्र्य भी ग्रंथ का एक उल्लेखनीय आयाम है। वैदिक संस्कृत की विशिष्टताएँ, स्वराङ्कन-प्रणाली, छन्द-शास्त्र (गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप्, जगती), भाषा-विज्ञान के दृष्टिकोण से वैदिक भाषा का स्थान — इन सबका scholarly विवेचन है।
सामाजिक एवं नैतिक वैचित्र्य पर भी विचार प्रस्तुत है। वेदों में दिखाई देने वाली स्त्री-गरिमा, परिवार-संस्था, अतिथि-धर्म, श्रम की प्रतिष्ठा, ज्ञान का सर्वोच्च स्थान, राजनीति की नैतिक भूमि, युद्ध की धर्म-आधारित मर्यादाएँ — यह सब वैदिक civilisation की scholarly महत्ता को रेखांकित करता है।
स्तोत्र-काव्य का सौन्दर्य भी ग्रंथ में प्रकाशित है। ऋग्वेद की गाथाओं की काव्य-गुणवत्ता, सामवेद का गान-तत्त्व, यजुर्वेद की प्रांजल formulaic भाषा, अथर्ववेद के लोक-गीत-स्वरूप मन्त्र — इन सबका साहित्यिक विश्लेषण ग्रंथ को aesthetic richness प्रदान करता है।
लेखक की अपनी interpretative दृष्टि महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा निरूपित आर्य समाज परम्परा से प्रभावित है, किन्तु उन्होंने अन्य भाष्यकारों — सायण, उव्वट, महीधर, श्री अरविन्द — के मतों का भी सम्मानपूर्वक उल्लेख किया है।
ग्रंथ की एक उल्लेखनीय विशेषता है — दैनिक जीवन में वेद की प्रासंगिकता। वेद-मन्त्र केवल कर्मकाण्डीय उपयोग के लिए नहीं — वे आधुनिक जीवन के नैतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए भी जीवन्त स्रोत हैं। यह दृष्टि वेदों को museum-piece नहीं, अपितु living tradition के रूप में प्रस्तुत करती है।
496 पृष्ठीय यह विशाल scope ग्रंथ की comprehensive महत्ता का साक्षी है। भाषा scholarly हिन्दी-संस्कृत है, जिसमें मूल मन्त्रों, उनके पाठ-संस्करण, हिन्दी अनुवाद एवं विवेचन — यह संरचना अध्ययन को व्यवस्थित बनाती है।
संस्कृत के विद्यार्थियों, वेद-शास्त्र के researchers, आर्य समाज के साधकों, comparative religion के scholars, एवं प्रत्येक उस सुधी पाठक के लिए जो वेदों के multi-faceted वैभव को scholarly तरीके से समझना चाहता है — वेद वैचित्र्य एक मूल्यवान ग्रंथ है। यह कृति वेदों के प्रति उस आदर का scholarly अभिव्यक्ति है, जो भारतीय civilisation की सर्वोच्च बौद्धिक विरासत के योग्य है।
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