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Ved Aur Nirukt (Hindi) – by Pt. Brihaddatta Jijnasu | Veda Yaska Nirukta Study

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वेद और निरुक्त (Ved Aur Nirukt), पण्डित बृहद्दत्त जिज्ञासु द्वारा रचित यह हिन्दी scholarly ग्रंथ, वेदों एवं यास्क की निरुक्त के अन्तर्सम्बन्ध की एक focused, accessible scholarly व्याख्या प्रस्तुत करता है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति Vedic-hermeneutics के foundational relationship को हिन्दी-माध्यम पाठकों के लिए सुलभ बनाती है।

**निरुक्त** — यास्क ऋषि द्वारा रचित classical etymological treatise — वेद-शब्दों के अर्थ-निर्धारण की foundational methodology प्रस्तुत करता है। वेदों एवं निरुक्त के बीच का सम्बन्ध अत्यंत गहरा है — बिना निरुक्त की समझ के, वेद-मन्त्रों का authentic अर्थ-निर्धारण कठिन है।

पण्डित बृहद्दत्त जिज्ञासु ने इस ग्रंथ में यह scholarly दर्शाया है कि यास्क की निरुक्त-पद्धति वेद-मन्त्रों के गूढ़ यौगिक-अर्थ को कैसे उजागर करती है — ‘नामान्याख्यातजानि’ (nouns are derived from verbs) का यास्क का foundational thesis, तथा यह Vedic word-interpretation के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण है।

**यास्क की चतुर्विध methodology** — निर्वचन-पद्धति के चार सिद्धान्त — root-analysis के माध्यम से etymology, phonological analysis, contextual meaning-derivation, तथा traditional continuity — का सुगम हिन्दी विवेचन।

**देवता-नामों का यौगिक-अर्थ** — इन्द्र, अग्नि, वरुण, मित्र जैसे वैदिक देवताओं के नामों की यास्क-प्रणीत etymological व्याख्या, जो पौराणिक anthropomorphic अवधारणाओं से भिन्न एक अधिक अमूर्त, गुण-वाचक अर्थ को उजागर करती है।

**महर्षि दयानन्द के साथ सम्बन्ध** — यह ग्रंथ यह भी दर्शाता है कि कैसे महर्षि दयानन्द ने अपनी Vedic-hermeneutics में यास्क की methodology को extensively अपनाया, तथा इसे अपनी ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ के foundational framework का अंग बनाया।

**Practical mantra-interpretation examples** — यास्क की methodology को concrete वेद-मन्त्रों पर apply करने के illustrative उदाहरण, जो पाठक को इस पद्धति की व्यावहारिकता समझने में सहायक हैं।

पण्डित बृहद्दत्त जिज्ञासु — आर्य समाज परम्परा के एक प्रखर scholar एवं Sanskrit-शिक्षण-methodology के innovator — की writing-शैली accessible, engaging, तथा pedagogically-effective है, जो जटिल etymological principles को हिन्दी-माध्यम पाठक के लिए सुगम बनाती है।

यह ग्रंथ विशेष रूप से उन विद्यार्थियों के लिए designed है जो Vedic-hermeneutics के इस foundational aspect को बिना Sanskrit की technical जटिलताओं में उलझे समझना चाहते हैं।

आर्य समाज के साधकों, वेद-अध्ययन के नए विद्यार्थियों, Vedic-hermeneutics में रुचि रखने वाले हिन्दी-माध्यम पाठकों, तथा प्रत्येक उस सुधी जिज्ञासु के लिए जो वेद एवं निरुक्त के foundational सम्बन्ध का एक सुगम, प्रामाणिक हिन्दी परिचय चाहता है — वेद और निरुक्त एक मूल्यवान foundational संसाधन है।

पण्डित बृहद्दत्त जिज्ञासु ने ग्रंथ के अंत में यह भी उल्लेख किया है कि निरुक्त-methodology आधुनिक structural-linguistics के कुछ core principles का प्राचीन forerunner है, जिससे यह ग्रंथ केवल पारम्परिक Vedic-studies से आगे तुलनात्मक भाषा-विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए भी रुचिकर बनता है। यह interdisciplinary-touch ग्रंथ की scholarly value को और अधिक बढ़ाता है, तथा यह दर्शाता है कि प्राचीन भारतीय linguistic-thinking आज भी academic रूप से significant है।

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