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Tattvamasi (Hindi–Sanskrit) – by Swami Vidyanand Saraswati | Upanishadic Mahavakya Vedanta Study

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तत्त्वमसि (Tattvamasi), विद्वान् स्वामी विद्यानन्द सरस्वती द्वारा रचित यह 477 पृष्ठीय हिन्दी-संस्कृत ग्रंथ, उपनिषदीय परम्परा के सर्वाधिक प्रतिष्ठित महावाक्य — ‘तत्त्वमसि’ (तू वही है) — का scholarly एवं गहन विवेचन है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति वेदान्त-दर्शन के एक mahatva-purna सूत्र की civilisational गरिमा एवं ब्रह्म-तत्त्व-निरूपण की systematic exposition प्रस्तुत करती है।

‘तत्त्वमसि’ — छान्दोग्य उपनिषद् (6.8.7) के उद्दालक-श्वेतकेतु संवाद में प्रकट यह महावाक्य — चार वैदिक महावाक्यों (‘प्रज्ञानं ब्रह्म’, ‘अहं ब्रह्मास्मि’, ‘तत्त्वमसि’, ‘अयमात्मा ब्रह्म’) में से एक है। ‘तत्’ (वह — ब्रह्म) + ‘त्वम्’ (तू — जीव) + ‘असि’ (है) — इस त्रिपदी सूत्र में जीव एवं ब्रह्म की मूल अभेदता का घोषणा-सूत्र निहित है। यह वेदान्त की सर्वोच्च revelation है — एक ऐसा सत्य जिसका साक्षात्कार ही मोक्ष का स्वरूप है।

ग्रंथ का प्रथम खण्ड महावाक्यों की scholarly भूमि का परिचय प्रस्तुत करता है। ऋग्वेद का ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ (ब्रह्म चेतना है), यजुर्वेद का ‘अहं ब्रह्मास्मि’ (मैं ब्रह्म हूँ), सामवेद का ‘तत्त्वमसि’ (तू वही है), अथर्ववेद का ‘अयमात्मा ब्रह्म’ (यह आत्मा ब्रह्म है) — चारों वेदों की उपनिषदीय परम्परा के यह चरम सूत्र, अपनी अभिव्यक्ति में भिन्न होते हुए भी, एक ही transcendent सत्य की ओर इंगित करते हैं। स्वामीजी ने इस comparative मीमांसा को scholarly तरीके से प्रस्तुत किया है।

‘तत्त्वमसि’ का systematic word-by-word विश्लेषण ग्रंथ का दार्शनिक केन्द्र है। ‘तत्’ से क्या इंगित है? यह सच्चिदानन्द-स्वरूप, निरुपाधिक, निर्गुण-निराकार ब्रह्म है — समस्त सृष्टि का अधिष्ठान। ‘त्वम्’ से क्या? यह व्यष्टि-जीव, चेतन आत्मा, समस्त प्राणि-मात्र का अंतर्यामी। ‘असि’ से क्या? पारमार्थिक एकत्व, अभेद, identity। यह त्रिपदी समीकरण व्यष्टि एवं समष्टि की मूल अभेदता का scholarly assertion है।

जीव एवं ब्रह्म के अभेद-सिद्धान्त का scholarly विवेचन ग्रंथ का प्रमुख विषय है। शंकराचार्य के अद्वैत-वेदान्त की दृष्टि — जीव-ब्रह्म अभेद, माया का व्यवहारिक सत्य, आत्म-साक्षात्कार के माध्यम से मुक्ति; रामानुज के विशिष्टाद्वैत की दृष्टि — जीव-ब्रह्म पारस्परिक संबंध-पूर्ण अभेद; मध्व के द्वैत की दृष्टि — जीव-ब्रह्म पारमार्थिक भेद; आर्य समाज परम्परा के त्रैत-वाद की दृष्टि — ईश्वर, जीव, प्रकृति की अनादि त्रिविधता — यह सब interpretative दृष्टिकोण scholarly तरीके से प्रस्तुत हैं।

स्वामी विद्यानन्द सरस्वती की अपनी interpretative position एक balanced एवं वैदिक vision है। वे आर्य समाज परम्परा से प्रभावित हैं, किन्तु उन्होंने महावाक्य की गहराई को छूते हुए अद्वैत-वेदान्त के contributions का भी सम्मान किया है। उनकी दृष्टि न तो rigid sectarian है, न ही anchorless syncretist; अपितु वैदिक प्रमाणों एवं scholarly evidence पर अधिष्ठित एक authentic दार्शनिक position है।

उद्दालक-श्वेतकेतु संवाद का scholarly विवेचन एक sublime philosophical narrative है। पिता उद्दालक अपने पुत्र श्वेतकेतु को नौ अलग-अलग दृष्टान्तों के माध्यम से तत्त्व-दर्शन कराते हैं — ‘मधु-दृष्टान्त’ (मधुमक्खियों एवं मधु का सम्बन्ध), ‘समुद्र-दृष्टान्त’ (समुद्र एवं नदियों का संबंध), ‘वृक्ष-दृष्टान्त’ (वृक्ष एवं उसके अंगों का सम्बन्ध), ‘न्यग्रोध-फल-दृष्टान्त’ (बीज एवं वृक्ष का संबंध), ‘लवण-दृष्टान्त’ (नमक एवं जल का सम्बन्ध) — यह सब इन्द्रियातीत सत्य की ओर इंगित करते हैं। प्रत्येक दृष्टान्त के अंत में पिता अपने पुत्र से कहते हैं — ‘तत्त्वमसि श्वेतकेतो’ — और यह सूत्र क्रमशः गहराई से अर्थ-सम्पन्न होता जाता है।

ब्रह्म-तत्त्व का व्यापक विवेचन ग्रंथ में है। ब्रह्म का स्वरूप — सच्चिदानन्द (सत् + चित् + आनन्द), निर्गुण-सगुण-भेद, ब्रह्म एवं ईश्वर-संबंध, ब्रह्म एवं माया-संबंध, ब्रह्म एवं जगत्-संबंध — यह सब scholarly तरीके से विवेचित हैं।

आत्म-तत्त्व का अध्याय भी मूल्यवान है। आत्मा क्या है? वह शरीर है, मन है, बुद्धि है, अहंकार है, या इन सबसे परे कुछ अन्य? आत्मा का स्वरूप-निरूपण — साक्षी, द्रष्टा, असंग, नित्य, अमर, सर्व-व्यापी — यह सब scholarly evidence-आधारित विवेचन के साथ प्रस्तुत है।

मोक्ष-स्वरूप पर भी विशेष विचार है। मोक्ष क्या है? वह कोई स्थान है, स्थिति है, अनुभव है, या एक तत्त्व-बोध है? मोक्ष की प्राप्ति का साधन क्या है — कर्म, ज्ञान, भक्ति, ध्यान, या इनका समन्वय? जीवन्मुक्ति एवं विदेहमुक्ति का भेद; मोक्ष-प्राप्ति के बाद जीव की क्या स्थिति है — यह सब scholarly विवेचन में आता है।

आध्यात्मिक साधना के व्यावहारिक सूत्र भी ग्रंथ में हैं। श्रवण-मनन-निदिध्यासन की वेदान्तिक त्रिविध साधना, गुरु-शिष्य-संवाद की पारम्परिक methodology, सत्संग का महत्त्व, स्वाध्याय की भूमिका — यह सब practical guidance ग्रंथ की एक उपलब्धि है।

लेखक की भाषा scholarly हिन्दी है, जिसमें संस्कृत shastric शब्दावली का सटीक प्रयोग है। मूल उपनिषदीय वाक्य, उनका पद-च्छेद, अन्वय, हिन्दी अनुवाद, एवं scholarly व्याख्या — यह त्रिविध संरचना अध्ययन को systematic एवं deep बनाती है।

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