Swasti Path Arthat Shreya Marg (Hindi–Sanskrit) – by Swami Vedanand Saraswati | Vedic Mantras & Dharma Guide

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स्वस्ति पाठ अर्थात् श्रेय मार्ग (Swasti Path Arthat Shreya Marg), विद्वान् स्वामी वेदानन्द सरस्वती द्वारा रचित यह 296 पृष्ठीय हिन्दी-संस्कृत ग्रंथ, वैदिक ‘स्वस्ति’ की civilisational अवधारणा एवं श्रेय-मार्ग — सर्वोत्तम जीवन-पथ — का scholarly विवेचन है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति वैदिक मन्त्रों के माध्यम से प्रकट होने वाली kalyaan-आधारित जीवन-दृष्टि को आधुनिक साधक तक पहुँचाने का एक प्रामाणिक प्रयास है।
‘स्वस्ति’ संस्कृत का एक civilisational शब्द है — जिसका अर्थ है ‘सु + अस्ति’ अर्थात् ‘अच्छी प्रकार से होना’, ‘कल्याण’, ‘मंगल’, ‘शुभ-स्थिति’। यह केवल greeting शब्द नहीं — यह वैदिक संस्कृति का एक mahatva-purna आदर्श है। समस्त वैदिक मन्त्र अन्ततः ‘सर्वस्य कल्याण’ की प्रार्थना करते हैं — ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।’ यही स्वस्ति का मूल अर्थ है — सर्वजन-कल्याण की वैदिक कामना।
ग्रंथ का प्रथम खण्ड वैदिक स्वस्ति-मन्त्रों का scholarly संग्रह प्रस्तुत करता है। ‘स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः’ — ऋग्वेद का प्रसिद्ध मन्त्र; ‘अग्ने नय सुपथा राये’ — ईशावास्य उपनिषद् का चरम मन्त्र; ‘असतो मा सद्गमय’ — बृहदारण्यक उपनिषद् का प्रकाश-मन्त्र; ‘पूर्णमदः पूर्णमिदम्’ — पूर्णता-सूत्र; ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ — सर्व-कल्याण-मन्त्र — यह सब सहित अनेक स्वस्ति-वाचक मन्त्रों का प्रामाणिक प्रस्तुतीकरण है, मूल संस्कृत में, हिन्दी अनुवाद एवं scholarly व्याख्या के साथ।
‘श्रेय एवं प्रेय’ का दार्शनिक भेद ग्रंथ का philosophical केन्द्र है। कठोपनिषद् का प्रसिद्ध सूत्र — ‘श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः’ — यम-नचिकेता-संवाद की मूल भूमि है। ‘श्रेय’ (ultimate good, lasting benefit) एवं ‘प्रेय’ (immediate pleasure, temporary gratification) के बीच का choice ही मानव-जीवन की मूल नैतिक challenge है। श्रेय कठिन-दीर्घ-कालिक होता है, प्रेय सरल-तत्कालिक — किन्तु धर्म एवं विवेक की खण्डनी श्रेय की दिशा में ही proceed करती है। स्वामीजी ने इस सूत्र की scholarly गहराई का विस्तार से विवेचन किया है।
जीवन के four अनिवार्य ध्येय — धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष — का scholarly विवेचन ग्रंथ में मिलता है। यह ‘चतुर्विध पुरुषार्थ’ भारतीय civilisational दृष्टि का foundational framework है। धर्म-संगत अर्थ-अर्जन, धर्म-नियंत्रित काम-सेवन, अंततः मोक्ष की ओर प्रगति — यह integrated जीवन-दर्शन ग्रंथ का scholarly पथ-निर्देश है।
आश्रम-व्यवस्था का scholarly परिचय भी ग्रंथ का अंग है। ब्रह्मचर्य (शिक्षा-काल), गृहस्थ (परिवार-काल), वानप्रस्थ (तपस्या-काल), संन्यास (मुक्ति-काल) — यह चतुर्विध आश्रम-व्यवस्था जीवन की biological एवं psychological rhythm के अनुरूप है। प्रत्येक आश्रम की अपनी विशिष्ट dharmic-responsibilities, कौन-से आश्रम में कौन-सी activities उपयुक्त हैं — यह systematic विवेचन है।
संस्कार-व्यवस्था पर भी विशेष विचार है। षोडश-संस्कार (16 मुख्य संस्कार) — गर्भाधान से अन्त्येष्टि तक — का scholarly परिचय; प्रत्येक संस्कार का civilisational एवं psychological महत्त्व; आधुनिक काल में इन संस्कारों का सरल किन्तु authentic प्रतिपालन कैसे किया जाए — यह practical guidance ग्रंथ की एक उपलब्धि है।
दैनिक नैतिक जीवन के सिद्धान्त भी विवेचित हैं। यम-नियम, सत्य-वचन, अहिंसा-व्रत, अस्तेय-नियम, ब्रह्मचर्य-संयम, अपरिग्रह-वृत्ति, शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान — यह दशविध शिखर वैदिक life-discipline का foundational framework है, जो श्रेय-मार्ग की प्रत्यक्ष सीढ़ी है।
सामाजिक एवं नागरिक धर्म पर भी विचार है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ — समस्त धरा एक परिवार है — का civilisational आदर्श; ‘अहिंसा परमो धर्मः’ — अहिंसा का परम स्थान; ‘सत्यमेव जयते’ — सत्य की अंतिम विजय; ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ — धर्म-रक्षा से ही धर्म की रक्षा होती है — यह सब वैदिक सामाजिक-नैतिक आदर्श ग्रंथ में प्रकाशित हैं।
आध्यात्मिक पक्ष पर scholarly विवेचन ग्रंथ का सर्वोच्च बिन्दु है। ईश्वर-प्रणिधान, उपासना-पद्धति, ध्यान-साधना, यज्ञ-कर्म का अंतःसार, आत्म-साक्षात्कार के मार्ग — यह सब classical वैदिक दृष्टिकोण से विवेचित हैं। आर्य समाज परम्परा का प्रभाव sympathetic एवं scholarly तरीके से उपस्थित है।
लेखक की भाषा प्रांजल हिन्दी है, जिसमें वैदिक मन्त्र, उनका पद-च्छेद, अन्वय, हिन्दी अनुवाद, एवं विस्तृत vivechan — यह pancharang संरचना अध्ययन को systematic एवं फलप्रद बनाती है।
296 पृष्ठीय यह कृति विषय की scope के अनुरूप एक संतुलित आयाम प्रस्तुत करती है। 150 रुपए मूल्य scholarly value एवं spiritual richness के सम्मुख अत्यन्त affordable है।
आर्य समाज के साधकों, वैदिक संस्कृति के अध्येताओं, dharmic गृहस्थों, माता-पिताओं जो अपने बच्चों को संस्कारित करना चाहते हैं, dharmic-गुरुओं, एवं प्रत्येक उस सुधी पाठक के लिए जो वैदिक श्रेय-मार्ग पर systematic रूप से चलना चाहता है — स्वस्ति पाठ अर्थात् श्रेय मार्ग एक trustworthy मार्गदर्शक है। यह कृति इस सत्य का स्मरण है कि सच्चा कल्याण भौतिक प्रगति से नहीं — dharmic-spiritual पथ पर निरन्तर अग्रसर होने से प्राप्त होता है।
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