Shiv Mahapuran Part 1 & 2 (Hindi–Sanskrit) – Shiv Puran | Gita Press Gorakhpur

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श्री शिवमहापुराण भारतीय पुराण-साहित्य के अष्टादश महापुराणों में शिव-भक्ति और शैव-सिद्धान्त का सर्वोच्च प्रतिनिधि ग्रन्थ माना जाता है। गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित यह संस्करण प्रथम एवं द्वितीय खण्ड के रूप में प्रस्तुत है, जिसमें मूल संस्कृत श्लोकों के साथ सरल एवं प्रांजल हिन्दी अनुवाद दिया गया है, जिससे सामान्य पाठक से लेकर गम्भीर जिज्ञासु तक सभी इस महापुराण के गूढ़ रहस्यों को सहजता से आत्मसात् कर सकें। शिवमहापुराण में भगवान शिव की लीलाओं, उनके विभिन्न अवतारों, पार्वती-विवाह, शिव-सती प्रसंग, दक्ष-यज्ञ, कार्तिकेय तथा गणेश-जन्म की कथाओं के साथ-साथ ज्योतिर्लिंगों की उत्पत्ति और महिमा का विस्तृत वर्णन मिलता है। इसमें विद्येश्वर संहिता, रुद्र संहिता, शतरुद्र संहिता, कोटिरुद्र संहिता, उमा संहिता, कैलास संहिता तथा वायवीय संहिता जैसे सात संहिताओं का समावेश है, जो शैव दर्शन की समग्र व्याख्या प्रस्तुत करती हैं। ग्रन्थ में शिवलिंग-पूजन की महिमा, रुद्राक्ष-धारण का माहात्म्य, शिवरात्रि-व्रत विधि तथा पंचाक्षर मन्त्र “ॐ नमः शिवाय” की साधना-पद्धति का भी सांगोपांग वर्णन है, जो गृहस्थ एवं साधक दोनों के लिए समान रूप से उपयोगी है। शिवमहापुराण केवल कथा-ग्रन्थ नहीं अपितु वेदान्त, सांख्य तथा योग के सिद्धान्तों का भी समन्वयकारी स्रोत है, जिसमें शिव को ब्रह्म-स्वरूप, सृष्टि-स्थिति-संहार के अधिष्ठाता एवं कल्याणकारी परमतत्त्व के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। गीता प्रेस की यह परम्परा शुद्ध पाठ, त्रुटिहीन मुद्रण तथा सुबोध भाषा-शैली के लिए विश्वभर में विश्वसनीय मानी जाती है, और इस संस्करण में भी वही गुणवत्ता परिलक्षित होती है। पुस्तक का आकार एवं पृष्ठ-संख्या इसकी विषय-गहनता को दर्शाते हैं—दो खण्डों में समाहित यह ग्रन्थ शिव-भक्तों, कथावाचकों, पुरोहितों तथा शोधार्थियों के लिए अपरिहार्य संदर्भ-ग्रन्थ है। प्रत्येक अध्याय के अन्त में दी गई कथा-सार तथा फलश्रुति पाठक को ग्रन्थ के भावार्थ को आत्मसात् करने में सहायक होती है। शिवरात्रि, सावन मास तथा अन्य शिव-पर्वों के अवसर पर इस ग्रन्थ का पारायण विशेष पुण्यदायी माना जाता है। परिवार में सुख-शान्ति, रोग-निवृत्ति तथा मनोवांछित फल-प्राप्ति हेतु अनेक गृहस्थ इस पुराण का नित्य पाठ करते हैं। भारतीय संस्कृति, धर्मशास्त्र तथा मूर्तिकला के अध्येताओं के लिए भी यह ग्रन्थ अमूल्य सामग्री प्रस्तुत करता है, क्योंकि इसमें वर्णित शिव-स्वरूप एवं ज्योतिर्लिंग-कथाएँ भारत के मन्दिर-स्थापत्य तथा तीर्थ-परम्परा की आधारशिला हैं। वेदिकआर्ट्स के माध्यम से यह प्रामाणिक गीता प्रेस संस्करण अब श्रद्धालुओं एवं अध्येताओं तक सहजता से पहुँच सकेगा। इस संस्करण में प्रयुक्त मुद्रण-गुणवत्ता तथा पृष्ठ-सज्जा गीता प्रेस की उस दीर्घकालिक परम्परा का परिचायक है जिसने भारतीय धर्मग्रन्थों को शुद्ध एवं सुलभ रूप में घर-घर तक पहुँचाया है। शिवमहापुराण का यह प्रथम एवं द्वितीय खण्ड उन पाठकों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है जो शैव-दर्शन का गहन एवं क्रमबद्ध अध्ययन करना चाहते हैं, क्योंकि इसमें प्रत्येक संहिता का पृथक्-पृथक् वर्णन होने से विषय की स्पष्टता बनी रहती है। गृहस्थ जीवन में सुख-शान्ति, सन्तान-प्राप्ति, रोग-निवृत्ति तथा समृद्धि हेतु अनेक श्रद्धालु इस ग्रन्थ का श्रद्धापूर्वक पाठ करते हैं, तथा सावन-सोमवार एवं महाशिवरात्रि के अवसर पर सामूहिक पारायण का आयोजन भी किया जाता है। यह ग्रन्थ भारतीय परिवारों की धार्मिक पुस्तकालय-श्रेणी में एक आदरणीय स्थान रखता है। भारतीय ज्योतिष, वास्तु तथा कर्मकाण्ड-परम्परा में भी शिवमहापुराण के अनेक प्रसंगों का सन्दर्भ लिया जाता है, विशेष रूप से रुद्राभिषेक तथा महामृत्युंजय-साधना के प्रसंग में इस ग्रन्थ की प्रमाणिकता सर्वमान्य है। दो खण्डों में विभाजित यह विशाल संस्करण पुस्तकालयों, आश्रमों तथा शिव-मन्दिरों के लिए एक सन्दर्भ-ग्रन्थ के रूप में अनिवार्य माना जाता है। वेदिकआर्ट्स सुनिश्चित करता है कि गीता प्रेस का यह मूल एवं अपरिवर्तित संस्करण ग्राहकों तक सुरक्षित पैकेजिंग के साथ पहुँचे, जिससे धर्मग्रन्थ की पवित्रता एवं गुणवत्ता दोनों सुरक्षित रहें। इस ग्रन्थ को उपहार स्वरूप भेंट करने की परम्परा भी भारतीय समाज में प्रचलित है, विशेष रूप से गृह-प्रवेश, विवाह तथा अन्य मंगल अवसरों पर। शिवमहापुराण के अध्ययन से साधक को न केवल शिव-तत्त्व का बौद्धिक ज्ञान प्राप्त होता है अपितु भक्ति-भाव की गहनता भी विकसित होती है, जो आध्यात्मिक उन्नति के लिए अनिवार्य मानी जाती है। गीता प्रेस गोरखपुर के इस संस्करण की प्रामाणिकता को देशभर के शैव-आचार्यों तथा कथावाचकों द्वारा सर्वमान्य स्वीकृति प्राप्त है, जिससे यह ग्रन्थ हर दृष्टि से विश्वसनीय स्रोत बना रहता है।
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