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Shikshasutrani (Sanskrit) – by Pt. Yudhishthir Mimansak | Vedanga Phonetics Sutras

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शिक्षासूत्राणि (Shikshasutrani), पंडित युधिष्ठिर मीमांसक द्वारा सम्पादित यह 39 पृष्ठीय Sanskrit scholarly ग्रंथ, विभिन्न classical शिक्षा-वेदाङ्ग-सूत्रों का एक संक्षिप्त किन्तु authentic, systematic संकलन प्रस्तुत करता है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति Sanskrit ध्वनि-विज्ञान के प्रारम्भिक विद्यार्थियों एवं वेद-पाठियों के लिए एक अत्यंत practical, focused संदर्भ-ग्रंथ है।

‘शिक्षा-सूत्र’ — sutra-शैली में रचित शिक्षा-वेदाङ्ग के मूल नियम — Sanskrit ध्वनि-विज्ञान की core principles को अत्यंत संक्षिप्त, memorization-friendly सूत्र-रूप में प्रस्तुत करते हैं। यह genre पारम्परिक गुरुकुलीय शिक्षा-पद्धति का एक अभिन्न अंग रहा है, जहाँ विद्यार्थी इन सूत्रों को कण्ठस्थ कर, गुरु-मार्गदर्शन में उनका practical application सीखते थे।

पंडित युधिष्ठिर मीमांसक ने अपने scholarly सम्पादन में विभिन्न classical शिक्षा-सूत्र-संग्रहों से महत्त्वपूर्ण, representative सूत्रों का चयन कर, उन्हें एक coherent, systematically-organized संकलन के रूप में प्रस्तुत किया है।

**वर्ण-सूत्र** — Sanskrit वर्णों के वर्गीकरण, उनके स्थान-प्रयत्न-निर्धारण से सम्बन्धित मूल सूत्र।

**स्वर-सूत्र** — उदात्त-अनुदात्त-स्वरित के निर्धारण एवं प्रयोग से सम्बन्धित सूत्र, जो वैदिक पाठ की स्वर-शुद्धता के लिए अनिवार्य हैं।

**मात्रा-सूत्र** — ह्रस्व-दीर्घ-प्लुत के काल-निर्धारण से सम्बन्धित सूत्र।

**सन्धि-सम्बन्धी शिक्षा-सूत्र** — कुछ फोनेटिक sandhi-rules जो विशेष रूप से पाठ-उच्चारण से सम्बद्ध हैं, न कि पूर्णतया व्याकरणिक।

प्रत्येक सूत्र मूल Sanskrit रूप में, संक्षिप्त scholarly व्याख्या के साथ प्रस्तुत है, जो इसके practical application को स्पष्ट करती है।

**Practical utility** — यह संक्षिप्त संकलन विशेष रूप से वेद-पाठियों एवं नए Sanskrit-विद्यार्थियों के लिए designed है, जिन्हें शिक्षा-वेदाङ्ग के core principles का एक quick, memorable, तथा authentic परिचय चाहिए, बिना अत्यधिक विस्तृत treatise में उलझे।

**Memorization-friendly संरचना** — सूत्र-शैली की brevity इसे कण्ठस्थ करने के लिए ideal बनाती है, जो पारम्परिक गुरुकुलीय अध्ययन-पद्धति के अनुरूप है।

39 पृष्ठीय अत्यंत संक्षिप्त आयाम इसे एक highly-focused, essential-principles-only reference बनाता है — comprehensiveness की बजाय, यह core, indispensable सूत्रों पर केन्द्रित है।

वेद-पाठियों, नए Sanskrit-विद्यार्थियों, वैदिक gurukulas के students, कर्मकाण्ड-shastri के प्रारम्भिक अभ्यर्थियों, तथा प्रत्येक उस सुधी जिज्ञासु के लिए जो शिक्षा-वेदाङ्ग के core सूत्रों का एक authentic, concise परिचय चाहता है — शिक्षासूत्राणि एक मूल्यवान foundational संदर्भ-ग्रंथ है, जो पारम्परिक गुरुकुलीय अध्ययन-पद्धति की एक जीवन्त निरन्तरता प्रस्तुत करता है।

पंडित मीमांसक ने ग्रंथ के अंत में यह भी स्पष्ट किया है कि इन सूत्रों का सम्यक् अध्ययन केवल theoretical ज्ञान नहीं, अपितु practical vedic-recitation-skill के विकास के लिए अनिवार्य है। बिना इन मूल सूत्रों की समझ के, वेद-पाठ की authentic परम्परा को आगे बढ़ाना कठिन है, तथा यह संक्षिप्त संकलन उसी सहस्राब्दियों पुरानी मौखिक-ज्ञान-परम्परा के संरक्षण में एक छोटा किन्तु महत्त्वपूर्ण योगदान प्रस्तुत करता है, जो नई पीढ़ी को इस प्राचीन विज्ञान से जोड़े रखता है। यह संक्षिप्त संकलन इस प्रकार अपने सीमित आकार में भी असीम व्यावहारिक मूल्य रखता है।

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