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Satyagraha-Nitikavyam (Sanskrit–Hindi) – by Pt. Yudhishthir Mimansak | Satya Ahimsa Niti Kavya

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सत्याग्रह-नीतिकाव्यम् (Satyagraha-Nitikavyam), व्याकरणाचार्य पंडित युधिष्ठिर मीमांसक द्वारा रचित यह 204 पृष्ठीय Sanskrit-Hindi द्वि-भाषी काव्य-ग्रंथ, सत्य एवं अहिंसा पर आधारित ‘सत्याग्रह’ के नैतिक-दार्शनिक सिद्धान्तों का एक अनुपम scholarly-काव्यात्मक विवेचन प्रस्तुत करता है। रामलाल कपूर ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह कृति नीति-काव्य-परम्परा में सत्याग्रह के civilisational सिद्धान्त को Sanskrit श्लोक-रूप में अभिव्यक्त करने का एक अद्वितीय प्रयास है।

‘सत्याग्रह’ — ‘सत्य’ + ‘आग्रह’ (दृढ़ पकड़/आग्रह) — यह concept, जिसे आधुनिक काल में महात्मा गांधी ने भारतीय स्वातंत्र्य-संग्राम में विश्व-प्रसिद्ध किया, वास्तव में एक प्राचीन वैदिक-दार्शनिक सिद्धान्त पर आधारित है — सत्य के प्रति अटूट निष्ठा, तथा अन्याय के विरुद्ध अहिंसक, नैतिक प्रतिरोध।

पंडित युधिष्ठिर मीमांसक ने अपनी इस काव्य-कृति में शास्त्रीय Sanskrit श्लोक-शैली (नीति-काव्य-परम्परा — भर्तृहरि के नीति-शतक, चाणक्य-नीति के समान genre) में इस सिद्धान्त का गहन विवेचन प्रस्तुत किया है, जिसके साथ हिन्दी अनुवाद भी उपलब्ध है।

ग्रंथ का प्रथम खण्ड सत्य के मूल दार्शनिक स्वरूप का काव्यात्मक विवेचन प्रस्तुत करता है — ‘सत्यमेव जयते’ — सत्य की अंतिम विजय का शाश्वत सिद्धान्त, तथा कैसे यह वैदिक मूल्य व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन दोनों में मार्गदर्शक है।

**अहिंसा का दार्शनिक विवेचन** — ‘अहिंसा परमो धर्मः’ — अहिंसा का परम स्थान, तथा कैसे यह सत्य के साथ मिलकर सत्याग्रह की द्विविध आधार-शिला बनाती है।

**प्रतिरोध की नैतिकता** — कैसे अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना एक dharmic कर्तव्य है, किन्तु यह प्रतिरोध हिंसा के बजाय नैतिक दृढ़ता, आत्म-त्याग, तथा सत्य के प्रति अटूट निष्ठा से किया जाना चाहिए — यह sophisticated काव्यात्मक विवेचन।

**Historical examples** — प्राचीन एवं मध्यकालीन भारतीय इतिहास से सत्याग्रह-सदृश उदाहरणों का काव्यात्मक स्मरण, जो दर्शाता है कि यह सिद्धान्त कोई modern invention नहीं, अपितु एक deep civilisational परम्परा का पुनरुत्थान है।

**Individual एवं सामाजिक अनुप्रयोग** — कैसे व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में — पारिवारिक विवादों में, कार्यक्षेत्र में, सामाजिक अन्यायों के विरुद्ध — सत्याग्रह के सिद्धान्तों को अपना सकता है, इसका practical काव्यात्मक मार्गदर्शन।

पंडित मीमांसक की काव्य-रचना classical Sanskrit metres (अनुष्टुप्, इन्द्रवज्रा) में है, जो नीति-काव्य-परम्परा की गरिमा के अनुरूप है, तथा साथ ही स्मरण-सहायक भी है।

Sanskrit-Hindi द्वि-भाषी प्रस्तुति ग्रंथ को व्यापक readership के लिए सुलभ बनाती है — Sanskrit-ज्ञानी विद्वान् मूल काव्य का आनन्द ले सकते हैं, जबकि हिन्दी-माध्यम पाठक अनुवाद के माध्यम से समान गहराई तक पहुँच सकते हैं।

204 पृष्ठीय comprehensive आयाम विषय की depth एवं काव्यात्मक richness के अनुरूप है।

नीति-काव्य के अध्येताओं, सत्याग्रह-दर्शन के researchers, गांधीवादी विचारधारा के अध्येताओं, Sanskrit काव्य-प्रेमियों, आर्य समाज के साधकों, तथा प्रत्येक उस सुधी पाठक के लिए जो सत्य एवं अहिंसा के civilisational सिद्धान्तों को एक अनुपम काव्यात्मक-scholarly रूप में समझना चाहता है — सत्याग्रह-नीतिकाव्यम् एक अद्वितीय एवं मूल्यवान संसाधन है।

पंडित मीमांसक ने ग्रंथ के समापन में यह भी scholarly नोट प्रस्तुत किया है कि सत्याग्रह का सिद्धान्त केवल राजनीतिक संदर्भ तक सीमित नहीं, अपितु यह एक universal, timeless नैतिक framework है जो व्यक्तिगत, पारिवारिक, तथा सामाजिक — सभी स्तरों पर justice एवं harmony की स्थापना में सहायक है। यह व्यापक philosophical-applicability ग्रंथ को केवल एक historical-political-commentary से आगे एक कालातीत नैतिक मार्गदर्शक बनाती है।

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